गोंडा जिले में पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद के तहत कई ऐसे औषधीय पौधों की पहचान की गई है, जो विभिन्न शारीरिक विकारों के निवारण में सदियों से उपयोग में लाए जा रहे हैं। इन्हीं औषधीय वनस्पतियों में वच का पौधा भी शामिल है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से एकोरस कैलामस नाम दिया गया है। साधारण रूप से दिखने वाले इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत इसकी भूमिगत संरचना में समाई होती है। जमीन की सतह के नीचे उगने वाली इसकी मोटी गांठ अथवा राइजोम को ही मुख्य रूप से पारंपरिक नुस्खों और आयुर्वेदिक दवाइयों के निर्माण में प्रयोग किया जाता है।
वानस्पतिक विशेषताओं के संदर्भ में वच विशेष रूप से नमी और दलदली स्वभाव वाली मिट्टी में पनपता है। इसकी पत्तियां तलवार की तरह लंबी, पतली और खड़ी होती हैं, परंतु चिकित्सा पद्धति में पत्तियों के बजाय जमीन के भीतर मौजूद प्रकंद यानी राइजोम को ही प्रमुख घटक माना जाता है। गोंडा के स्थानीय वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति ने इस औषधीय वनस्पति के पारंपरिक उपयोगों, इसकी शारीरिक क्रियाशीलता तथा इसके सेवन से जुड़ी जरूरी सावधानियों पर विस्तृत प्रकाश डाला है।
पेट की सेहत और पाचन क्रिया में वच की भूमिका
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के तहत वच का सबसे प्रमुख उल्लेख पेट तथा पाचन तंत्र से संबंधित विकारों को दूर करने के संदर्भ में पाया जाता है। पेट में बनने वाली अत्यधिक गैस, अपच, पेट फूलने और अफारे जैसी जटिलताओं से राहत दिलाने में इसकी जड़ का प्रयोग पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। जब पाचन अग्नि कमजोर पड़ जाती है या भोजन ठीक प्रकार से पच नहीं पाता, तब इसकी सीमित मात्रा को पाचक चूर्ण के रूप में शामिल किया जाता है।
हालांकि पाचन समस्याओं के उपचार में इसकी खुराक और सेवन की विधि हर रोगी की शारीरिक बनावट, आयु और समस्या की गंभीरता पर पूरी तरह निर्भर करती है। वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति का कहना है कि किसी भी आयुर्वेदिक औषधि को सामान्य घरेलू उपाय मानकर स्वतः लेना उचित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की शारीरिक स्थिति के आकलन के बाद ही इसका प्रयोग तय किया जाता है।
अनिद्रा और बच्चों के हकलाने में पारंपरिक प्रयोग
मानसिक तनाव, अनिद्रा और वाणी संबंधी विकारों में भी वच का पारंपरिक रूप से बड़ा योगदान रहा है। जिन लोगों को रात में सामान्य रूप से नींद नहीं आने अथवा बार-बार जागने की परेशानी रहती है, उनके उपचार के लिए भी इस जड़ी-बूटी के उपयोग का वर्णन पारंपरिक साहित्यों में मिलता है। यह मानसिक संतुलन और शांति को बढ़ावा देने वाले पारंपरिक योगों का हिस्सा बनती रही है।
इसके अलावा, बचपन में वाणी विकास के दौरान आने वाली बाधाओं, विशेषकर बच्चों में हकलाने की समस्या के निवारण में भी वच की जड़ का इस्तेमाल करने का पारंपरिक उल्लेख पाया जाता है। वाणी को स्पष्ट करने और गले तथा तंत्रिका तंत्र को संबल देने के लिए प्राचीन समय से वैद्य इसका उपयोग पारंपरिक विधियों के जरिए करवाते आए हैं।
रक्तचाप संबंधी दिक्कतें और चिकित्सीय सावधानी
पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में वच का प्रयोग रक्तचाप यानी ब्लड प्रेशर से जुड़े असंतुलन को नियंत्रित करने में भी देखा जाता रहा है। परंतु वैद्य प्रजापति स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि ब्लड प्रेशर एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील शारीरिक समस्या है, जिसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही जानलेवा सिद्ध हो सकती है। यदि किसी मरीज का पूर्व से चिकित्सकीय इलाज चल रहा है, तो डॉक्टर की सुझाई गई दवाइयों को बंद करके अकेले वच पर निर्भर होना बेहद खतरनाक हो सकता है।
रक्तचाप के प्रबंधन में पारंपरिक उपायों को मुख्य एलोपैथिक या प्रमाणित उपचार के स्थान पर नहीं रखा जा सकता। इसलिए इस जड़ी-बूटी का किसी भी प्रकार से सेवन करने से पहले योग्य चिकित्सक से मशविरा लेना अनिवार्य है, ताकि किसी प्रतिकूल शारीरिक प्रभाव से बचा जा सके।
खुराक का पैमाना और सेवन में जरूरी सावधानियां
पारंपरिक नुस्खों के अनुसार वच की मात्रा सामान्य तौर पर 3 से 5 ग्राम तक ही इस्तेमाल किए जाने का उल्लेख मिलता है। वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति के मुताबिक, यह 3 से 5 ग्राम की खुराक कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है जिसे प्रत्येक व्यक्ति बिना सोचे-समझे अपना ले। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की तासीर, रोग का स्तर और वजन अलग-अलग होता है, जिसके आधार पर ही मात्रा तय की जाती है।
औषधीय गुणों से भरपूर होने के बावजूद वच का अनियंत्रित या मनमाना सेवन नुकसानदेह साबित हो सकता है। विशेष रूप से छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और पहले से किसी गंभीर बीमारी की नियमित दवा ले रहे व्यक्तियों को अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के समाधान हेतु योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ या पंजीकृत चिकित्सक की सलाह के बिना इसका सेवन कतई नहीं करना चाहिए।



















