अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गहराते भू-राजनीतिक खिंचाव और सामरिक होड़ के बीच कूटनीतिक सहयोग को नए सिरे से परिभाषित करने की मांग तेज हो गई है। न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के अवसर पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि टकराव और अविश्वास के वर्तमान दौर में बहुपक्षीय व्यवस्था को केवल पुरानी परिपाटी पर नहीं छोड़ा जा सकता। ‘पार्टनर्स फॉर मल्टीलैटरलिज्म’ सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक वैश्विक संस्थान अधिक समावेशी, पारदर्शी और नियमबद्ध नहीं बनते, तब तक दुनिया की साझा चुनौतियों का मुकाबला करना मुमकिन नहीं होगा।
शक्ति संतुलन में बदलाव और गंभीर होता भू-राजनीतिक टकराव
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत दुनिया में आ रहे बुनियादी ढांचागत बदलावों के विश्लेषण से की। उनका मानना था कि बीते दशकों के दौरान दुनिया के शक्ति समीकरणों में जो क्रमिक परिवर्तन देखा जा रहा था, वह एक स्वाभाविक और प्रतीक्षित प्रक्रिया थी। हालांकि, हाल के वर्षों में अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा, तीखी कूटनीतिक रार और सीधे युद्धों ने इस संतुलन को अप्रत्याशित रूप से अस्थिर बना दिया है। यदि इन बिगड़ते हालातों को समय रहते संभाला नहीं गया, तो वैश्विक स्तर पर साझीदारी और एकजुटता की बुनियाद ही चरमरा जाएगी। ऐसे संकटपूर्ण दौर में बहुपक्षीय मंचों को निष्क्रिय दर्शक बने रहने के बजाय अपनी निर्णायक भूमिका निभानी होगी।
कूटनीतिक विचार-विमर्श से आगे बढ़कर विदेश मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न देशों के आपसी तालमेल का असर सीधे तौर पर जनसामान्य के जीवन, सुरक्षा और खुशहाली से जुड़ा होता है। उन्होंने कई ऐसे ज्वलंत विषयों की सूची सामने रखी जहां केवल सामूहिक इच्छाशक्ति से ही समाधान निकल सकता है। इनमें टिकाऊ अंतरराष्ट्रीय शांति, पर्यावरण संरक्षण के लिए न्यायसंगत नीतियां, नवीन प्रौद्योगिकियों का विनियमन, विकास कार्यों के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना, सीमा पार आतंकवाद की रोकथाम, आपदा प्रबंधन और भावी स्वास्थ्य महामारियों से बचाव के पुख्ता इंतजाम शामिल हैं। उन्होंने याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने आज तक जो भी प्रगति हासिल की है, वह एकजुट कोशिशों की देन है, इसलिए उन उपलब्धियों को सहेजते हुए भविष्य के लिए एक सशक्त ढांचा खड़ा करना अनिवार्य है।
खाद्य, ईंधन और उर्वरक संकट पर केंद्रित कदम उठाने की दरकार
वर्तमान में जारी सैन्य तनावों और क्षेत्रीय विवादों पर बात करते हुए विदेश मंत्री ने एक व्यावहारिक नजरिया अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भले ही किसी संघर्ष का अंतिम और संपूर्ण शांति समाधान तलाशने में लंबा वक्त लगे, लेकिन उसके चलते आम लोगों पर पड़ने वाले विशिष्ट दुष्प्रभावों को फौरी तौर पर दूर किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर उन्होंने दैनिक जीवन से जुड़ी चार बुनियादी आवश्यकताओं खाद्य आपूर्ति, ईंधन, उर्वरक और विकासशील देशों के लिए वित्त की गंभीर किल्लत का उल्लेख किया। इन समस्याओं को किसी व्यापक समझौते के इंतजार में उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। दुनिया को बिना किसी देरी के ऐसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में साझा कदम उठाने होंगे जहां तुरंत राहत पहुंचाना संभव हो।
उभरती तकनीक के नियम और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा
तेजी से विकसित हो रहे तकनीकी परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विदेश मंत्री ने नई क्षमताओं से जुड़े खतरों की ओर आगाह किया। आधुनिक तकनीक की अपार संभावनाओं के साथ साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और नैतिक चिंताओं के नए पहलू सामने आए हैं, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियम और स्पष्ट सुरक्षा घेरा यानी ‘गार्डरेल’ तैयार करना वक्त की मांग है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक स्तर पर विनिर्माण और व्यापारिक निर्भरता का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने सप्लाई चेन को विविधतापूर्ण बनाने पर बल दिया। किसी एक ही देश या एकल भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता किसी भी अप्रत्याशित संकट के समय पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को पंगु बना सकती है। ऐसे में जोखिमों को न्यूनतम करने के लिए समान दृष्टिकोण रखने वाले देशों को वैकल्पिक आपूर्ति नेटवर्क स्थापित करने हेतु सक्रिय साझेदारी करनी होगी।
अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान और संस्थागत सुधार
बहुपक्षवाद की प्रभावशीलता को लेकर विदेश मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोई भी वैश्विक व्यवस्था तब तक प्रभावी नहीं हो सकती जब तक कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों, मान्य संधियों और विधिक मानकों का सभी पक्ष पूरी ईमानदारी से पालन न करें। केवल सम्मेलनों में सहयोग की बातें करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे जमीनी आचरण में उतारना होगा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं की निर्णय प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता दोहराई। उन्होंने मांग रखी कि निर्णय लेने वाली शीर्ष मेज पर अधिक से अधिक देशों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और निर्णय प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि वैश्विक संस्थाएं वास्तविक अर्थों में प्रासंगिक बनी रहें।
स्विट्जरलैंड और नाउरू के नेताओं के साथ द्विपक्षीय संवाद
संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस महत्वपूर्ण सत्र के दौरान विदेश मंत्री ने समानांतर रूप से कई द्विपक्षीय बैठकों में भी भाग लिया। उन्होंने स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री इग्नाजियो कैसिस के साथ एक अहम कूटनीतिक चर्चा की। इस मुलाकात में भारत और स्विट्जरलैंड के मध्य बढ़ते व्यापारिक और वाणिज्यिक रिश्तों की व्यापक समीक्षा की गई। विशेष रूप से भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के मध्य हुए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते के लागू होने के उपरांत उत्पन्न नए आर्थिक अवसरों और बहुपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करने पर दोनों नेताओं ने सहमति जताई।
इसके साथ ही, विदेश मंत्री ने प्रशांत महासागरीय देश नाउरू के राष्ट्रपति डेविड अडियांग से भी गर्मजोशी भरी भेंट की। इस दौरान उन्होंने भारत और नाउरू के ऐतिहासिक द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर परस्पर सहयोग की सराहना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि नाउरू के सामाजिक और आर्थिक विकास के प्रयासों में भारत एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में अपनी मजबूत प्रतिबद्धता निरंतर निभाता रहेगा।



















