संयुक्त राष्ट्र के मंच पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के भविष्य और नियंत्रण को लेकर एक बड़ा वैचारिक संघर्ष शुरू हो गया है। दुनिया भर के तमाम देशों ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि इस क्रांतिकारी तकनीक का नियंत्रण मुट्ठी भर अमीर राष्ट्रों, उनकी सरकारों या विशाल वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के पास केंद्रित होता जा रहा है। विकासशील और गरीब देशों का मानना है कि यदि इस असंतुलन को समय रहते नहीं सुधारा गया, तो यह दुनिया में एक नए प्रकार के डिजिटल विभाजन और आर्थिक असमानता को जन्म देगा। भारत ने इस मंच से स्पष्ट रूप से प्रत्येक राष्ट्र के अपने संप्रभु AI मॉडल विकसित करने के अधिकार की वकालत की है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस महत्वपूर्ण सत्र में यह बहस केवल तकनीक के विकास तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें संप्रभुता, संसाधनों के दोहन और वैश्विक नीतियों में हिस्सेदारी जैसे गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दे भी खुलकर सामने आए।
भारत की आवाज: संप्रभु AI मॉडल्स का निर्माण और विविधता का संरक्षण
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में अपने संबोधन के दौरान वैश्विक मंच पर भारत का दृष्टिकोण अत्यंत मजबूती से प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि AI प्रौद्योगिकी आज के युग में मानव समाज को सशक्त बनाने और वैश्विक आर्थिक समृद्धि के नए मार्ग खोलने वाली एक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति है। उन्होंने कहा कि यह तकनीक पूरी मानवता की प्रगति में एक बड़ा बदलाव लाने वाली ताकत सिद्ध हो सकती है, बशर्ते इसका लाभ सभी को समान रूप से मिले। हालांकि, इसके साथ ही भारतीय विदेश मंत्री ने इस तकनीक के दुरुपयोग और इसके संभावित खतरों के प्रति वैश्विक समुदाय को आगाह भी किया।
एस. जयशंकर ने आगाह किया कि यदि AI का अनियंत्रित और अनैतिक रूप से उपयोग किया गया, तो यह पूर्वाग्रहों को और अधिक गहरा कर सकता है तथा विभिन्न समाजों और देशों के बीच मौजूद आपसी सम्मान की भावना को कमजोर कर सकता है। भारत का यह स्पष्ट मत है कि प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र को अपनी अनूठी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अपने खुद के AI मॉडल विकसित करने और उन्हें संचालित करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनका यह वक्तव्य उस व्यापक वैश्विक विमर्श की पृष्ठभूमि में आया है, जहां यह सवाल लगातार गहरा रहा है कि इस तकनीक की नियमावली तय करने का एकाधिकार किसके पास रहेगा और क्या विकासशील देशों को इस तकनीकी क्रांति के भविष्य को आकार देने में बराबर की भूमिका दी जाएगी या नहीं।
डेटा सेंटर बनाम बौद्धिक नियंत्रण: ग्लोबल साउथ की चेतावनी
इस बहस में मलेशिया के विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने भी बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने चेतावनी दी कि विकासशील देशों को केवल ऐसे भौतिक केंद्रों में तब्दील नहीं किया जाना चाहिए जहां केवल भारी मात्रा में डेटा एकत्र और संसाधित किया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ग्लोबल साउथ को केवल डेटा सेंटर और अन्य सहायक ढांचागत सुविधाएं स्थापित करने की भूमि के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता, जबकि इस तकनीक से जुड़े मुख्य नीतिगत फैसले और रणनीतिक नियंत्रण पश्चिमी देशों या मुट्ठी भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालयों में बंद रहें।
मलेशियाई विदेश मंत्री मोहम्मद हाजी हसन ने बैठक में कड़े शब्दों में कहा, "ग्लोबल साउथ सिर्फ डेटा सेंटर लगाने की जगह नहीं बन सकता, जबकि एआई से जुड़े फैसले कहीं और लिए जाएं." उन्होंने चिंता व्यक्त की कि विकासशील देशों को केवल उपभोक्ता और बाजार के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने मांग की कि इन देशों को इस नई तकनीक के विकास, डिजाइनिंग और शोध कार्य में भी समान भागीदार बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, मोहम्मद हाजी हसन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि विशाल डेटा केंद्रों के संचालन के लिए अत्यधिक मात्रा में स्वच्छ पानी, भारी बिजली और मूल्यवान भूमि की आवश्यकता होती है। यदि इन संसाधनों के दोहन का पूरा बोझ विकासशील देशों के पर्यावरण और जनता पर डाला जा रहा है, तो इस तकनीक से होने वाला वास्तविक आर्थिक लाभ भी स्थानीय स्तर पर साझा होना चाहिए, न कि इसका अधिकांश हिस्सा विदेशी कंपनियों के खातों में जाना चाहिए। आज कुछ गिने-चुने निजी निगमों के पास वैश्विक आबादी के संवाद, काम, लेन-देन और सूचना प्राप्ति के तरीकों पर अभूतपूर्व नियंत्रण है, जो वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है।
अधिकारों का केंद्रीकरण और नियमों की कमी: जर्मनी और बेलीज के सरोकार
यूरोप की ओर से जर्मनी ने भी AI के मालिकाना हक के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने रेखांकित किया कि वैश्विक स्तर पर AI से जुड़े अधिकांश बौद्धिक संपदा अधिकार और पेटेंट केवल दो बड़े देशों की कंपनियों के पास ही सिमटे हुए हैं। उन्होंने वैश्विक बिरादरी से अपील की कि जब किसी तकनीक की ताकत वैश्विक स्तर पर प्रभावी हो जाती है, तो उसके नियमन की जिम्मेदारी भी वैश्विक और साझा होनी चाहिए। जोहान वाडेफुल ने सबसे शक्तिशाली और उन्नत AI मॉडलों के सुरक्षित उपयोग के लिए एक साझा अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सचेत किया कि तकनीक की विकास दर वैश्विक नीति-निर्माताओं की गति से कहीं अधिक तेज है।
जोहान वाडेफुल ने चेतावनी देते हुए कहा, "एआई हमारे संस्थानों के साथ तालमेल बिठाने का इंतज़ार नहीं कर रहा है." उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों को अपनी कार्यप्रणाली में तेजी लानी होगी ताकि वे इस बदलती तकनीकी वास्तविकता के साथ कदम से कदम मिला सकें। दूसरी ओर, बेलीज के प्रधानमंत्री जॉन ब्रिसेन्यो ने इस बात पर जोर दिया कि यदि AI के संचालन के लिए संतुलित नियम बनाए जाते हैं, तो इससे लोक कल्याणकारी सेवाओं को अत्यधिक प्रभावी बनाया जा सकता है और शिक्षा तथा सूचना तक आम लोगों की पहुंच को सुगम बनाया जा सकता है। लेकिन इसके विपरीत, नियमों के अभाव में यह तकनीक वैश्विक असमानता को और अधिक बढ़ा देगी, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को सुरक्षा जोखिमों में डाल देगी, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर छीन लेगी और गरीब देशों को पूरी तरह से उन विदेशी तकनीकों और कानूनों पर निर्भर बना देगी जिन्हें उनकी सहमति या भागीदारी के बिना तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सीमाएं पार करने वाली इस तकनीक को केवल किसी एक देश के स्थानीय कानूनों के माध्यम से नियंत्रित करना असंभव है।
इंसानी नियंत्रण और वित्तीय समानता: सिंगापुर, सऊदी अरब और कैमरून
सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने इस ऐतिहासिक तकनीकी बदलाव को समकालीन युग की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण चुनौती करार दिया। उन्होंने दुनिया भर की सरकारों से विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान, डिजिटल बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण और मानव कौशल के विकास में भारी निवेश करने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे पुख्ता सुरक्षा मानक और प्रोटोकॉल विकसित करने पर बल दिया जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि इस तकनीक का अंतिम नियंत्रण हमेशा इंसानों के हाथ में ही रहे।
इसी क्रम में, सऊदी अरब ने AI क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्रों का एक नेटवर्क स्थापित करने के अपने प्रयासों का विवरण साझा किया। उन्होंने रियाद में एआई रिसर्च और एथिक्स सेंटर की स्थापना का उल्लेख करते हुए नैतिक मानकों के विकास पर जोर दिया। वहीं, अफ्रीकी देश कैमरून ने इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया कि तकनीकी विकास का लाभ किसी वर्ग विशेष तक सीमित न रहकर पूरी मानव जाति को मिलना चाहिए। कैमरून ने तकनीक तक पहुंच के इस मुद्दे को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सुधार की मांगों के साथ जोड़ा, ताकि विकासशील देशों को आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर आगे बढ़ने के लिए एक समान धरातल प्राप्त हो सके।
ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट: व्यावहारिक क्रियान्वयन की डगर
इस पूरे वैश्विक मंथन के केंद्र में संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2024 में अपनाया गया ऐतिहासिक 'ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट' (वैश्विक डिजिटल समझौता) रहा। इस समझौते का मूल उद्देश्य डिजिटल अंतर को कम करना, वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना और एक ऐसे सुरक्षित तथा मानव-केंद्रित डिजिटल भविष्य का निर्माण करना है जो मानवाधिकारों का सम्मान करता हो। हालांकि, इस समझौते के बावजूद वैश्विक नेताओं के बीच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। चुनौती यह है कि इन घोषित वैश्विक सिद्धांतों और नैतिक दिशानिर्देशों को ऐसे व्यावहारिक और कानूनी रूप से बाध्यकारी नियमों में कैसे बदला जाए, जिन्हें वास्तव में धरातल पर लागू कराया जा सके। अमीर और गरीब देशों के बीच की यह खाई केवल तकनीक की नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था के संचालन की है, जिसे सुलझाने के लिए अभी एक लंबी कूटनीतिक यात्रा तय करनी होगी।



















