अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तेहरान के कूटनीतिक प्रस्ताव को सीधे तौर पर ठुकराने और कड़ा रुख अपनाने के बाद फारस की खाड़ी में सैन्य तनाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है। टकराव समाप्त करने और जहाजों के सुरक्षित आवागमन को लेकर रखी गई शर्तों को वाशिंगटन द्वारा खारिज किए जाने के तुरंत बाद, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी सैन्य ताकत का आक्रामक प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी निगरानी और सुरक्षा घेरे में आगे बढ़ रहे जहाजों को निशाना बनाया गया, जिससे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अचानक भारी रुकावट पैदा हो गई है।
टैंकरों पर सटीक हमले और सैन्य कार्रवाई
जलडमरूमध्य के संकरे जलक्षेत्र में ईरानी बलों ने बड़े पैमाने पर मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक गतिविधियों को अंजाम दिया है। इस दौरान वाणिज्यिक और सुरक्षा घेरे में चल रहे जहाजों पर कम से कम 4 बार अलग-अलग हथियारों से वार किए गए। समुद्री क्षेत्र में मौजूद जहाजों के दल और सिरिक के तटीय इलाकों से कई तेज धमाकों की आवाजें सुनी गई हैं। ताजा सैन्य कार्रवाई में एक ईरानी क्रूज मिसाइल ने जलडमरूमध्य के भीतर तय लक्ष्य पर प्रहार किया, जबकि कुछ ही समय पहले एक अन्य जहाज पर मानवरहित ड्रोन से सीधा हमला दर्ज हुआ। इन कार्रवाइयों के चलते कम से कम एक वाणिज्यिक पोत बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
लारक द्वीप के पास रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की मौजूदगी
रणनीतिक रूप से अहम लारक द्वीप के समुद्री इलाके में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की तेज हमलावर नावें लगातार गश्त करती देखी गई हैं। ये फुर्तीली नौकाएं अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर गुजरने वाले जहाजों की निगरानी और उन पर अचानक धावा बोलने की क्षमता रखती हैं। यद्यपि इन हमलों और नुकसान के दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन समुद्री सीमा में ईरानी नौसेना के इस जमावड़े ने जहाजों के आवागमन को अत्यधिक जोखिम भरा बना दिया है।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराता संकट
दुनियाभर के तेल और गैस व्यापार के लिए होर्मुज स्ट्रेट सबसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियारा माना जाता है, जिसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा भी कहा जाता है। इस जलडमरूमध्य में पैदा हुए गतिरोध ने एशिया से लेकर यूरोप तक तेल शोधन और ऊर्जा वितरण तंत्र को हिलाकर रख दिया है। यदि सैन्य तनातनी आगे भी जारी रहती है और जहाजों की आवाजाही ठप होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और कई देशों को गंभीर ईंधन किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।



















