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ट्रूकॉलर ने कॉलर आईडी से आगे बढ़कर ओपन वेब पर शुरू की स्कैम चेकर सेवाऐप्स
28 सित॰ 2026, 3:31 pm (31 दिन पहले)· 0

ट्रूकॉलर ने कॉलर आईडी से आगे बढ़कर ओपन वेब पर शुरू की स्कैम चेकर सेवा

ट्रूकॉलर ने कॉलर आईडी ऐप की सीमाओं से बाहर निकलते हुए एक नया वेब और एंड्रॉइड आधारित स्कैम चेकर लॉन्च किया है, जिसकी शुरुआत भारत से हो रही है। इस मुफ्त टूल की मदद से यूजर किसी भी संदिग्ध नंबर, लिंक या मैसेज की धोखाधड़ी के रूप में आसानी से जांच कर सकते हैं।

दशकों तक मुख्य रूप से कॉलर आईडी सेवाएं प्रदान करने और दुनिया भर में 500 मिलियन से अधिक उपयोगकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा करने के बाद, स्वीडिश कंपनी ट्रूकॉलर अब अपनी स्कैम इंटेलिजेंस तकनीक को ओपन वेब तक लेकर आ रही है। इस नई पहल के तहत उपयोगकर्ताओं को किसी भी तरह का ऐप डाउनलोड करने या साइन-इन करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी, जिससे लोग सीधे ब्राउज़र के जरिए धोखाधड़ी की जांच कर सकेंगे।

कंपनी ने रविवार को स्कैम चेकर नाम से इस नई वेब और एंड्रॉइड सेवा की आधिकारिक शुरुआत की है। इस सुविधा के माध्यम से कोई भी व्यक्ति किसी संदिग्ध फोन नंबर, इंटरनेट लिंक या टेक्स्ट मैसेज को कॉपी करके पेस्ट कर सकता है, जिससे तुरंत यह पता चल जाता है कि वह फ्रॉड है या नहीं। इस सिस्टम के काम करने के पीछे ट्रूकॉलर के कम्युनिटी प्लेटफॉर्म स्कैमफीड की रिपोर्टें काम करती हैं। हालांकि, किसी नंबर से जुड़ा हुआ असली नाम या अन्य विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को अभी भी ट्रूकॉलर के पुराने ऐप और साइन-इन प्रक्रिया का ही सहारा लेना होगा।

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यह बिल्कुल मुफ्त और सुलभ टूल अपनी शुरुआत के चरण में विशेष रूप से भारत के उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराया गया है। कंपनी की भविष्य की योजनाओं के अनुसार इसे जल्द ही लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों में भी विस्तारित किया जाएगा, ताकि वैश्विक स्तर पर ऑनलाइन धोखाधड़ी से निपटा जा सके।

इस टूल के जरिए कंपनी न केवल अपने मुख्य ऐप के लिए नए यूजर्स जुटाने का काम कर रही है, बल्कि कम्युनिटी रिपोर्ट्स के माध्यम से उसे उन स्कैम पैटर्न्स की बेहतर समझ भी मिल रही है जो किसी खास समय पर सक्रिय रहते हैं। ट्रूकॉलर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऋषित झुनझुनवाला के अनुसार, यह डेटा कंपनी के उन फ्रॉड और रिस्क प्रोडक्ट्स को भी मजबूत कर सकता है जिन्हें ट्रूकॉलर फॉर बिजनेस के तहत उद्यमों को बेचा जाता है, हालांकि स्कैम चेकर का मुख्य उद्देश्य आम उपभोक्ताओं की सीधी मदद करना है।

तकनीकी रूप से काम करते हुए ट्रूकॉलर का यह नया चेकर यूजर द्वारा सबमिट किए गए लिंक को स्कैन करता है, छोटे किए गए यूआरएल यानी शॉर्टन लिंक्स को फैलाकर उनके अंतिम गंतव्य तक पहुंचता है और रीडायरेक्ट्स की जांच करता है। इसके बाद यह डेटा कंपनी के अपने मालिकाना हक वाले रिस्क डेटाबेस और अन्य फ्रॉड सिग्नल्स के साथ मिलाया जाता है। इसके अलावा, यूजर किसी संदिग्ध मैसेज को भी सीधे पेस्ट कर सकते हैं, जिससे सिस्टम खुद-ब-खुद उसमें से फोन नंबर या लिंक को अलग करके ट्रूकॉलर कम्युनिटी से जुड़ी रिपोर्टों को सामने ले आता है।

यह नया लॉन्च ऐसे समय में सामने आया है जब धोखाधड़ी और स्कैम्स केवल फोन कॉल्स तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि टेक्स्ट मैसेज, विभिन्न मैसेजिंग ऐप्स और वेब लिंक्स के जरिए बड़े पैमाने पर फैल रहे हैं। भारतीय वयस्क आबादी के बीच साल 2025 में किए गए एक जीएसएमए सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, जिन लोगों ने खुद के साथ स्कैम होने की बात कही उनमें से 46 फीसदी को मैसेजिंग ऐप्स के माध्यम से, 37 फीसदी को एसएमएस के जरिए और 32 फीसदी को वॉयस कॉल्स के जरिए निशाना बनाया गया था।

ट्रूकॉलर के आंतरिक विश्लेषण और मौजूदा वेरिफिकेशन सेवाओं पर आने वाले ट्रैफिक के आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि लोग संदिग्ध लिंक्स और फोन नंबरों की सत्यता जांचने के लिए हर महीने लगभग 14 मिलियन यानी 1.4 करोड़ वेब सर्च करते हैं। इसी उपयोगकर्ता व्यवहार को ध्यान में रखते हुए स्कैम चेकर के आइडिया को आकार दिया गया, जैसा कि सीईओ ऋषित झुनझुनवाला ने टेकक्रंच को दिए एक इंटरव्यू में बताया था।

ऋषित झुनझुनवाला ने इस बात पर प्रकाश डाला कि जब आपको वास्तव में ऐसी किसी मदद की जरूरत होती है, तो आप आमतौर पर किसी दूसरी जगह पर होते हैं। उदाहरण के लिए, व्हाट्सएप पर अचानक कोई अनजान लिंक आ जाता है, आपकी मां को ट्रैफिक चालान के नाम पर कोई मैसेज मिल जाता है या फिर कोई दोस्त स्क्रीनशॉट भेजकर पूछता है कि क्या यह सच है। ऐसे महत्वपूर्ण क्षणों में लोग सबसे पहले इंटरनेट पर सर्च करना ही पसंद करते हैं, और यही वह जरूरत है जिसे यह नया टूल पूरा करता है।

कंपनी के स्कैम-डिटेक्शन प्रयासों में ट्रूकॉलर की कम्युनिटी एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है। कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, भारत में उसके क्राउडसोर्स किए गए फीड यानी स्कैमफीड पर लगभग 20,000 सक्रिय स्कैम रिपोर्टें लाइव हैं, जहां उपयोगकर्ता खुद आकर घोटालों के बारे में पोस्ट और चर्चा करते हैं। इस फीड में हर हफ्ते लगभग 1,300 नई रिपोर्टें जोड़ी जाती हैं। इसके अलावा, कंपनी ने यह भी साझा किया कि उसने 14 सितंबर से 20 सितंबर के बीच वैश्विक स्तर पर कुल 12.9 बिलियन यानी 1,290 करोड़ संदेशों का मूल्यांकन किया और उनमें से 20.3 मिलियन यानी 2 करोड़ से अधिक को fraudulent यानी धोखाधड़ी के रूप में चिन्हित किया।

आने वाले निकट भविष्य में ट्रूकॉलर की योजना इस बात की है कि स्कैम चेकर के दायरे को और बढ़ाया जाए ताकि वह अधिक प्रकार के स्कैम्स का पता लगा सके। इसके साथ ही, कंपनी इसमें स्क्रीनशॉट अपलोड करने की सुविधा भी जोड़ने की तैयारी कर रही है ताकि गहन विश्लेषण किया जा सके।

कॉलर आईडी के दायरे से बाहर निकलने का यह कदम ऐसे दौर में उठाया जा रहा है जब कंपनी का मुख्य व्यवसाय इसके सबसे बड़े बाजार यानी भारत में नयी चुनौतियों का सामना कर रहा है। देश में टेलीकॉम ऑपरेटरों द्वारा केंद्र सरकार समर्थित कॉलिंग नेम प्रेजेंटेशन सेवा शुरू की जा रही है, जबकि एप्पल और गूगल ने अपने खुद के कॉलर आइडेंटिफ़िकेशन और स्पैम-प्रोटेक्शन फीचर्स पेश कर दिए हैं। इसके अलावा, पिछले हफ्ते ही भारत के दूरसंचार नियामक ने कॉलर-आईडी ऐप्स को यह निर्देश दिया था कि वे उपयोगकर्ताओं द्वारा सबमिट की गई स्पैम रिपोर्टों को सीधे टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ साझा करें, जिस पर ट्रूकॉलर ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे एकतरफा आदान-प्रदान करार दिया था।

इन तमाम बदलावों के परिणामस्वरूप ट्रूकॉलर का ध्यान अब केवल कॉलर आईडी तक सीमित न रहकर उससे आगे विकसित हो रहा है।

ऋषित झुनझुनवाला ने कहा कि कॉलर आईडी वह पहली समस्या थी जिसका समाधान कंपनी ने निकाला था, और आज भी इसी के जरिए अधिकांश लोग ट्रूकॉलर तक पहुंचते हैं। हालांकि, स्कैमर्स ने अब लिंक्स और मैसेज के जरिए अधिक बहु-채널 यानी मल्टी-चैनल तरीका अपना लिया है, और तेजी से यह वॉयस तथा वीडियो की ओर भी बढ़ रहा है। इसलिए ट्रूकॉलर की सुरक्षा प्रणाली को भी स्कैमर्स के पीछे-पीछे चलना होगा और खुद को अपग्रेड करना होगा।

सवाल-जवाब

ट्रूकॉलर का स्कैम चेकर क्या है?
यह एक नया वेब और एंड्रॉइड आधारित टूल है जो उपयोगकर्ताओं को बिना किसी ऐप या साइन-इन के संदिग्ध फोन नंबर, लिंक या मैसेज की जांच करने की अनुमति देता है।
क्या स्कैम चेकर का उपयोग करने के लिए पैसे देने होंगे?
नहीं, यह एक बिल्कुल मुफ्त-टू-एक्सेस (free-to-access) टूल है जिसे सबसे पहले भारत में लॉन्च किया गया है।
यह टूल कैसे काम करता है?
यह सबमिट किए गए लिंक को स्कैन करता है, छोटे यूआरएल को फैलाता है और ट्रूकॉलर कम्युनिटी के स्कैमफीड से जुड़ी रिपोर्टों से उनका मिलान करता है।
क्या इस टूल से किसी नंबर का असली नाम पता चल सकता है?
नहीं, किसी फोन नंबर से जुड़े विस्तृत नाम और जानकारी के लिए अभी भी ट्रूकॉलर के पुराने साइन-इन वाले ऐप की आवश्यकता होती है।
स्कैम चेकर सबसे पहले किस देश में लॉन्च किया गया है?
यह टूल अपनी शुरुआती पेशकश के तहत सबसे पहले भारत में उपलब्ध कराया गया है।
कंपनी किन अन्य क्षेत्रों में इस सेवा का विस्तार करेगी?
ट्रूकॉलर ने इस सेवा को लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व और अफ्रीका तथा दक्षिण पूर्व एशिया में विस्तारित करने की योजना बनाई है।
लोग हर महीने संदिग्ध नंबरों की जांच के लिए कितनी वेब सर्च करते हैं?
ट्रूकॉलर के अनुमान के मुताबिक लोग हर महीने लगभग 14 मिलियन वेब सर्च करते हैं।
ट्रूकॉलर के स्कैमफीड में वर्तमान में कितनी सक्रिय रिपोर्टें हैं?
भारत में ट्रूकॉलर के स्कैमफीड पर लगभग 20,000 सक्रिय स्कैम रिपोर्टें लाइव हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Arjun Mehta@arjun-mehta·30 दिन पहले

बिना ऐप डाउनलोड किए सीधे वेब पर स्कैम चेक करना अच्छा है, पर डेटा प्राइवेसी को लेकर थोड़ा शक होता है।

Ravikash Gupta@ravikash·30 दिन पहले

बिना ऐप डाउनलोड किए सीधे ब्राउज़र से संदिग्ध नंबर और लिंक चेक करने की सुविधा बहुत काम की है। आजकल जिस तरह से मैसेज और वेब लिंक्स के जरिए फ्रॉड बढ़ रहे हैं, आम आदमी के लिए ऐसा मुफ्त टूल होना बेहद जरूरी हो गया है।

Tanvi Desai@tanvi-desai·30 दिन पहले

रविकेश जी, ऐप डाउनलोड किए बिना सीधे ब्राउज़र से चेक करने वाला ये फीचर वाकई कमाल का है, आजकल जिस तरह से लिंक और मैसेज से स्कैम हो रहे हैं, ये राहत की बात है।

Michael Anderson@michael-anderson·30 दिन पहले

अमेरिका में भी स्पैम कॉल्स से लोग परेशान हैं, अगर बिना ऐप डाउनलोड किए सीधे वेब पर स्कैम पता चल जाए तो बहुत राहत मिलेगी।

Rohan Gupta@rohan-gupta·30 दिन पहले

माइकल, सही कह रहे हो। पिछले महीने मेरे एक दोस्त को फर्जी लिंक से मैसेज आया था, अगर ऐसा वेब टूल तब होता तो वो बच जाता।

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