कोलंबो: श्रीलंका की राजनीति में उस वक्त एक बड़ा मोड़ आ गया जब देश के एक प्रमुख विपक्षी नेता को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। श्रीलंका पोडुजाना पेरामुना के महासचिव सागर करियावासम को सेंट्रल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो द्वारा पूछताछ के लिए बुलाया गया था, जहां बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया। अधिकारियों के अनुसार उनके खिलाफ यह कार्रवाई देश के पुलिस प्रमुख प्रियंथा वीरासुरिया को कथित तौर पर धमकाने और उनके खिलाफ सार्वजनिक मंच से आपत्तिजनक बयान देने के मामले में की गई है।
पूछताछ के बहाने थाने बुलाकर की गई कार्रवाई
प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर करियावासम को केंद्रीय अपराध जांच ब्यूरो की ओर से एक नोटिस भेजकर थाने में उपस्थित होने को कहा गया था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह पूरा मामला प्रियंथा वीरासुरिया के संबंध में की गई तीखी टिप्पणियों से जुड़ा हुआ है। जब वे अपना बयान दर्ज कराने पहुंचे, तो जांच अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार करने का फैसला किया। पुलिस का आरोप है कि सागर करियावासम ने पुलिस प्रमुख को डराने-धमकाने का प्रयास किया था, जिसके बाद यह सख्त कदम उठाया गया है।
विवाद की जड़ और राजनीतिक प्रतिक्रिया
यह पूरा विवाद तब भड़का जब सागर करियावासम ने हाल ही में पार्टी मुख्यालय में एक मीडिया ब्रीफिंग का आयोजन किया था। उस दौरान उन्होंने पुलिस महानिरीक्षक पर खुलकर निशाना साधा था और उन पर सरकार के इशारे पर काम करने का गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने पुलिस प्रमुख से आग्रह किया था कि वे सरकार के राजनीतिक गुर्गे के रूप में कार्य करने के बजाय देश और वहां की आम जनता की निष्पक्ष सेवा करें। इस गिरफ्तारी को लेकर विपक्षी दलों में खासा रोष है और एसएलपीपी ने वर्तमान सरकार पर राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से ग्रसित होकर विपक्षी नेताओं के खिलाफ विच हंट चलाने का सीधा आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि पिछले दो वर्षों के दौरान कई विपक्षी कार्यकर्ताओं और नेताओं को टारगेट किया गया है और उन्हें विभिन्न मामलों में सजा दिलाई गई है या कानूनी पचड़े में फंसाया गया है।
पूर्व शीर्ष अधिकारियों को मिल चुकी है मौत की सजा
श्रीलंका में न्यायपालिका द्वारा हाल ही में कुछ अन्य हाई-प्रोफाइल मामलों में भी बेहद कड़े फैसले सुनाए गए हैं। इससे पहले श्रीलंका पुलिस के पूर्व प्रमुख पुजित जयसुंदरा और रक्षा मंत्रालय के शीर्ष पद पर रह चुके नौकरशाह हेमासिरी फर्नांडो को बहुचर्चित 2019 के ईस्टर संडे आतंकी हमले के मामले में अदालत ने शुक्रवार को मौत की सजा सुनाई थी। उस भयावह आतंकवादी घटना में 270 से अधिक मासूम लोगों की जान चली गई थी। उच्च न्यायालय की बेंच ने दोनों पूर्व उच्चाधिकारियों को इस बात का दोषी पाया कि उनके पास पहले से ही संभावित खतरों को लेकर खुफिया चेतावनियां पहुंच चुकी थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने समय रहते कोई ठोस कदम या कार्रवाई नहीं की। अदालत ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की थी कि यदि प्रशासन वक्त रहते सतर्क हो जाता और जरूरी एहतियात बरतता, तो उन भीषण हमलों को आसानी से टाला जा सकता था। पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 21 अप्रैल 2019 को देश के विभिन्न गिरजाघरों और महंगे होटलों को निशाना बनाकर सिलसिलेवार आत्मघाती धमाके किए गए थे, जिनमें कुल 279 लोगों की मौत हुई थी और मारे गए लोगों में 45 विदेशी नागरिक भी शामिल थे। इन दोनों अधिकारियों पुजित जयसुंदरा और हेमासिरी फर्नांडो को पहली बार 2019 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था और तब से यह मामला अदालत में चल रहा था।



















