भारत और चीन के बीच कूटनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 1962 के सीमा युद्ध के बाद से लेकर वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य टकराव तक, दोनों पड़ोसी देशों के संबंधों में तनाव बना रहा है। हालांकि, सीमा पर बने गतिरोध को दूर करने और लंबे समय से पेंडिंग पड़े मुद्दों का स्थायी हल निकालने के लिए दोनों पक्ष लगातार कूटनीतिक रास्ते तलाश रहे हैं। इसी कड़ी में नई दिल्ली में भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए बने कार्यकारी तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) की 36वीं महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस उच्चस्तरीय वार्ता में भारत ने स्पष्ट और दोटूक शब्दों में कहा कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता कायम रखना सबसे पहली आवश्यकता है। इसके साथ ही भारत ने तिब्बत क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल जलविद्युत बांध को लेकर अपनी गंभीर चिंताओं को दोहराया और उससे जुड़ी तकनीकी जानकारी तुरंत साझा करने की मांग की।
नई दिल्ली में आयोजित 36वीं डब्ल्यूएमसीसी बैठक और कूटनीतिक दल
सीमा विवादों पर चर्चा के लिए आयोजित डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय में पूर्वी एशिया मामलों के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी दल की अगुवाई वहां के विदेश मंत्रालय में सीमा एवं समुद्री मामलों के विभाग की महानिदेशक होउ यांकी ने की। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने एलएसी पर जमीनी हालात की व्यापक और गहन समीक्षा की। वार्ता के दौरान सीमा प्रबंधन, सीमा निर्धारण के प्रयासों, संस्थागत तंत्रों को मजबूत बनाने और सीमा पार सहयोग से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शी बातचीत हुई। यह बैठक विशेष प्रतिनिधियों के बीच हुई 24वें दौर की वार्ता में तय हुए दिशा-निर्देशों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बुलाई गई थी, ताकि सीमावर्ती इलाकों में किसी भी तरह के भ्रम या अप्रत्याशित तनाव से बचा जा सके।
137 अरब डॉलर की ब्रह्मपुत्र जलविद्युत परियोजना और भारत की चिंताएं
वार्ता के दौरान सीमा पार से बहने वाली नदियों का मुद्दा बेहद अहम रहा। चीन तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा, जिसे वहां यार्लुंग सांगपो कहा जाता है, पर एक विशाल जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रहा है। लगभग 137 अरब डॉलर की अनुमानित लागत से तैयार होने वाली यह परियोजना दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शुमार होगी। दावा किया जा रहा है कि इस बांध से चीन के प्रसिद्ध थ्री गॉर्जेज बांध की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा। भारत ने इस परियोजना के संभावित प्रभावों पर चिंता जताते हुए चीन से मांग की कि वह इस बांध के निर्माण, डिजाइन और जल भंडारण से जुड़े तकनीकी आंकड़े जल्द से जल्द साझा करे। इसके साथ ही भारत ने सीमा-पार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तर के तंत्र (ईएलएम) की अगली बैठक शीघ्र आयोजित करने का आग्रह किया, जिसकी मांग मई में बीजिंग में हुई 35वीं डब्ल्यूएमसीसी बैठक में भी उठाई गई थी।
निचले इलाकों की पारिस्थितिकी और मानव आबादी पर संभावित खतरा
भारत की मुख्य चिंता तिब्बती पठार के संवेदनशील और नाजुक पर्यावरण को लेकर है। इस विशाल निर्माण कार्य से उस क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। भौगोलिक रूप से यार्लुंग सांगपो नदी तिब्बत से बहते हुए भारत के अरुणाचल प्रदेश राज्य में प्रवेश करती है, जहां इसे सियांग नदी के नाम से जाना जाता है। इसके बाद यह असम राज्य में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र का रूप लेती है और अंततः बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है। यदि ऊपरी धारा में नदी के स्वाभाविक बहाव को रोका जाता है या उसमें कृत्रिम बदलाव किया जाता है, तो पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश में रहने वाली एक बहुत बड़ी आबादी के लिए पेयजल, सिंचाई और बाढ़ जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसी वजह से भारत लगातार मांग कर रहा है कि चीन इस परियोजना में पूरी पारदर्शिता बरते और निचले प्रवाह वाले पड़ोसी देशों के साथ निरंतर परामर्श करे।
सीमा पर शांति ही द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने का आधार
वर्ष 2020 में हुए सैन्य गतिरोध के बाद से दोनों देश अपने रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस वार्ता में भारत ने पुनः दोहराया कि जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बहाल नहीं होती, तब तक द्विपक्षीय संबंधों का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। किसी भी तरह के गलत आकलन या गलतफहमी को रोकने के लिए स्थापित संवाद तंत्रों के प्रभावी इस्तेमाल पर सहमति जताई गई। इसमें डब्ल्यूएमसीसी के अलावा स्थानीय सैन्य कमांडर स्तर की बैठकें और अन्य कूटनीतिक चैनल शामिल हैं। दोनों पक्षों ने माना कि नियमित संवाद बनाए रखने से ही सीमा पर स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हासिल की जा सकती है।



















