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अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर याद आया संसद का वह ऐतिहासिक भाषण, जिसने पाकिस्तान और वैश्विक शक्तियों को दिया था कड़ा संदेशबिहार
16 अग॰ 2026, 10:41 am (1 दिन पहले)· 2

अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर याद आया संसद का वह ऐतिहासिक भाषण, जिसने पाकिस्तान और वैश्विक शक्तियों को दिया था कड़ा संदेश

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर उनके राजनीतिक जीवन, पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल विजय और संसद में दिए गए उस ऐतिहासिक भाषण को याद किया जा रहा है जिसने वैश्विक कूटनीति की दिशा बदल दी थी।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि के अवसर पर देश उनके महान राष्ट्र निर्माण योगदान, दूरदर्शी नेतृत्व और ओजस्वी विचारों को नमन कर रहा है। 16 अगस्त 2018 को उनका निधन हुआ था। वे भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में शामिल थे, जिन्हें पक्ष और विपक्ष दोनों से समान सम्मान प्राप्त था। एक प्रखर राजनेता होने के साथ-साथ वे कुशल वक्ता, पत्रकार और कवि भी थे। संसद के भीतर और बाहर उनके भाषणों ने न केवल देश की जनभावनाओं को दिशा दी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के स्वाभिमान और संप्रभुता को मजबूती से रेखांकित किया। कारगिल संघर्ष और सीमा पार से जारी तनाव के दौर में संसद में दिया गया उनका एक ऐतिहासिक संबोधन आज भी भारतीय कूटनीति के एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक तक का सफर

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में हुआ था। अपने छात्र जीवन के दौरान ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ गए थे। स्वतंत्रता के पश्चात उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ, तब उन्हें पार्टी का संस्थापक अध्यक्ष चुना गया। इससे पूर्व वर्ष 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में वे विदेश मंत्री बने थे। विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी भाषा में अपना भाषण देकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव को स्थापित किया था।

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तीन बार संभाली प्रधानमंत्री की कमान और बनाया ऐतिहासिक रिकॉर्ड

संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका पहला कार्यकाल वर्ष 1996 में मात्र 13 दिनों का रहा। इसके बाद वर्ष 1998 में वे पुनः प्रधानमंत्री बने और 13 महीनों तक सरकार चलाई। वर्ष 1999 के आम चुनावों के बाद उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली और वर्ष 2004 तक अपना 5 साल का कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा किया। इस उपलब्धि के साथ वे देश के ऐसे पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने अपनी सरकार के 5 वर्षों का पूर्ण कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा करने का कीर्तिमान स्थापित किया।

पोखरण परमाणु परीक्षण और कड़े वैश्विक फैसले

प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने देश की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए। मई 1998 में अमेरिका सहित कई शक्तिशाली देशों के भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों की धमकियों की परवाह न करते हुए उन्होंने राजस्थान के पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण कराने का साहसिक निर्णय लिया। इन परीक्षणों के जरिए भारत ने स्वयं को एक अधिकृत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में उन्होंने देश के चारों महानगरों और प्रमुख कोनों को आधुनिक राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की नींव रखी। इसके साथ ही प्राथमिक शिक्षा को हर बच्चे तक पहुंचाने के उद्देश्य से उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत की।

कारगिल युद्ध और शांति प्रयासों का संतुलन

अटल बिहारी वाजपेयी ने पड़ोसी देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए। पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से उन्होंने सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर के बीच बस सेवा की शुरुआत की थी। हालांकि, जब पाकिस्तान ने इस शांति पहल का जवाब कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में दिया, तो उन्होंने सैन्य स्तर पर कड़ा कदम उठाया। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन विजय चलाकर घुसपैठियों को खदेड़ दिया और सीमा पर निर्णायक जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने कूटनीतिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान को पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया।

संसद में पाकिस्तान को स्पष्ट चेतावनी और तीसरे पक्ष का विरोध

कारगिल युद्ध और सीमा पार से जारी आतंकवाद के बेहद तनावपूर्ण माहौल के बीच संसद में बोलते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान और वैश्विक शक्तियों को स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत के मन में यह धारणा बिल्कुल नहीं है कि वह पाकिस्तान को नष्ट करना चाहता है। भारत चाहता है कि पाकिस्तान एक सुखी और समृद्ध देश के रूप में फले-फूले, क्योंकि दोनों देश समान सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत नेपाल सहित अपने सभी पड़ोसियों के साथ नदी जल और अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत के जरिए समाधान निकालने के लिए सदैव तैयार है।

कड़ा कूटनीतिक रुख और संप्रभुता का संकल्प

संसदीय संबोधन के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने सैन्य शक्ति के बल पर प्रादेशिक बदलाव की कोशिशों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा,

“जम्मू-कश्मीर को हथियारों के बल पर हथियाने की बात अपने मन से निकाल दें।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत द्विपक्षीय चर्चा के लिए हमेशा उपलब्ध है, और यदि कुछ जटिल मुद्दे तुरंत हल नहीं हो सकते तो उन्हें स्थगित करके सहयोग योग्य विषयों पर प्रगति की जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका और चीन जैसी अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की ओर अप्रत्यक्ष इशारा करते हुए स्पष्ट कर दिया कि भारत और पाकिस्तान के मामलों में किसी भी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा और न ही किसी तीसरे पक्ष को इस क्षेत्र में मध्यस्थता की अनुमति दी जाएगी।

सवाल-जवाब

अटल बिहारी वाजपेयी का निधन कब हुआ था?
अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को हुआ था।
अटल बिहारी वाजपेयी कितनी बार भारत के प्रधानमंत्री बने?
वे तीन बार प्रधानमंत्री बने: पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए, दूसरी बार 1998-1999 में 13 महीनों के लिए, और तीसरी बार 1999 से 2004 तक पूरे 5 साल के कार्यकाल के लिए।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण कब दिया गया था?
वर्ष 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी में भाषण दिया था।
पोखरण परमाणु परीक्षण किस वर्ष हुआ था?
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में मई 1998 में पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किए गए थे।
कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के अभियान का क्या नाम था?
वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना द्वारा 'ऑपरेशन विजय' चलाया गया था।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान पोखरण-2 परमाणु परीक्षण और कारगिल संघर्ष जैसे मोड़ यह दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में रणनीतिक दृढ़ता कूटनीतिक दबाव पर भारी पड़ती है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में जब क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, तब इस तरह के कड़े और स्वतंत्र सुरक्षा निर्णय देश की संप्रभुता बनाए रखने के लिए एक मजबूत मार्गदर्शिका का काम करते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

अटल जी के कार्यकाल की यह रणनीतिक दूरदर्शिता केवल सुरक्षा नीति तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में बुनियादी ढांचे के विकास—जैसे स्वर्णिम चतुर्भुज योजना—को भी एक नई गति दी थी। आज जब देश आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब उनकी राजनैतिक परिपक्वता और संवाद की कला से सीखना प्रासंगिक बना हुआ है। क्षेत्रीय स्तर पर भी उनकी नीतियों ने शासन और विकास के एक नए युग की आधारशिला रखी थी।

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