मनोरंजन का तरीका बीते कुछ सालों में पूरी तरह बदल चुका है। पहले किसी फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हॉल की टिकट खिड़की पर घंटों लंबी कतार में खड़ा होना पड़ता था, हर शुक्रवार नई फिल्म रिलीज़ होने का बेसब्री से इंतजार रहता था। लेकिन अब ओटीटी प्लेटफॉर्म, मल्टीप्लेक्स की ऑनलाइन बुकिंग और घर के प्रोजेक्टर टेलीविजन ने यह पूरा अनुभव ही घर बैठे संभव बना दिया है। इसी बदलाव की मार बिहार के जहानाबाद जिले के पुराने सिनेमा हॉलों पर भी पड़ी है, जहां कभी दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ा करती थी।
डिजिटल दौर में अब लोग एक क्लिक में पुरानी से पुरानी और नई से नई फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर देख लेते हैं, मल्टीप्लेक्स की टिकट भी घर बैठे बुक हो जाती है और प्रोजेक्टर या स्मार्ट टीवी की मदद से बड़े परदे जैसा मजा भी घर के अंदर ही मिल जाता है। इसी सहूलियत ने पुराने सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉलों की जरूरत को काफी हद तक कम कर दिया है। नतीजा यह हुआ कि देश भर के कई शहरों की तरह जहानाबाद के पुराने हॉल भी या तो पूरी तरह बंद हो गए या फिर उन्हें किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
35 साल पुराना शिव शंकर सिनेमा हॉल अब बंद
जहानाबाद शहर के ऊंटा मोड़ के पास स्थित शिव शंकर सिनेमा हॉल करीब 35 साल पुराना है। एक दौर था जब इस हॉल के बाहर हर शुक्रवार नई फिल्म देखने वालों की लंबी कतार लगती थी और एक्शन फिल्मों के गानों का हर शहरवासी को बेसब्री से इंतजार रहता था। लेकिन बदलते वक्त के साथ यह हॉल भी बाकी पुराने सिनेमाघरों की तरह अपनी चमक खो बैठा और करीब 5 साल पहले पूरी तरह बंद हो गया।
प्रभात सिनेमा को टक्कर देकर बना शहर का सबसे बढ़िया हॉल
स्थानीय लोगों के मुताबिक, जहानाबाद में शिव शंकर सिनेमा हॉल शहर का सबसे बढ़िया सिनेमाघर माना जाता था। इसका सीधा मुकाबला अंबेडकर चौक स्थित तिलोत्तमा हॉल से रहता था, और नई फिल्म देखने के लिए दर्शक करीब 30 किलोमीटर दूर से भी यहां पहुंचते थे। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले जिले में प्रभात सिनेमा को सबसे अच्छा हॉल माना जाता था, लेकिन जब शिव शंकर चित्र मंदिर खुला तो उसने धीरे धीरे प्रभात सिनेमा की जगह ले ली और खुद शहर का सबसे पसंदीदा हॉल बन गया। उस दौर में शहर के लोग सिनेमा हॉल की चर्चा से रोमांचित रहते थे और नई फिल्म की रिलीज़ को त्योहार की तरह मनाया जाता था।
अब हॉल में गूंजती है बच्चों की पढ़ाई
आज शिव शंकर सिनेमा हॉल की इमारत में फिल्मों की जगह किताबों की पढ़ाई हो रही है। इस परिसर में कई कोचिंग इंस्टीट्यूट चल रहे हैं, जहां सैकड़ों बच्चे रोजाना पढ़ाई करने पहुंचते हैं। यानी जिस जगह कभी परदे पर हीरो हीरोइन की एंट्री पर सीटियां बजती थीं, वहां अब बच्चे किताबें खोलकर बैठे नजर आते हैं। बदलते दौर में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता ने भी इस बदलाव को बढ़ावा दिया है, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों की मांग लगातार बढ़ रही है।
सिनेमा के शौकीनों को अब पटना और गया का रुख
शिव शंकर चित्र मंदिर बंद होने के बाद जहानाबाद के लोगों को फिल्म देखने के लिए पटना या गयाजी जाना पड़ रहा है। दरअसल, शहर में एक भी मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल नहीं बचा है, इसलिए डॉल्बी साउंड में मूवी देखने का शौक रखने वाले लोग पटना तक का सफर तय करते हैं। यह बदलाव सिर्फ जहानाबाद तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों में पुराने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के बंद होने और उनकी जगह कोचिंग सेंटर, दुकानों या अन्य कारोबार के खुलने का यह एक बड़ा उदाहरण है, जो बदलते दौर की तस्वीर साफ दिखाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सिनेमा हॉल के दिनों की यादें आज भी उनके जेहन में ताजा हैं, लेकिन वक्त के साथ आया यह बदलाव अब जहानाबाद की पहचान का हिस्सा बन चुका है।











