देश में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर छिड़ी तीखी चर्चा के बीच पूर्व नौकरशाहों के एक बड़े समूह ने चुनावी तंत्र की विश्वसनीयता के पक्ष में अपनी आवाज उठाई है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) और अन्य केंद्रीय सेवाओं से सेवानिवृत्त 124 पूर्व अधिकारियों ने 10 अक्टूबर 2026 की तिथि वाला एक खुला पत्र जारी किया है। इस संयुक्त वक्तव्य में उन तमाम राजनीतिक बयानों और आरोपों पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं, जिनमें बिना किसी ठोस सबूत के वोट चोरी अथवा धांधली की बातें कही जा रही हैं। पूर्व अधिकारियों का स्पष्ट मत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संस्था अथवा प्रक्रिया पर सवाल उठाना नागरिकों का बुनियादी हक है, किंतु जब कोई पक्ष बड़े पैमाने पर हेरफेर के गंभीर आरोप लगाता है, तो उसे साबित करने का दायित्व भी उसी पक्ष पर आता है।
प्रशासनिक अनुभव और निगरानी के बहुस्तरीय सुरक्षा घेरे
हस्ताक्षरकर्ता पूर्व अधिकारियों ने चुनावी सुरक्षा व्यवस्था का बचाव करते हुए अपने लंबे जमीनी प्रशासनिक अनुभवों को सामने रखा है। पत्र में इस बात को रेखांकित किया गया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए मतदान केंद्रों से लेकर मतगणना स्थलों तक एक अत्यंत पारदर्शी और बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था स्थापित है। इन पूर्व अधिकारियों ने स्वयं अपने सेवाकाल के दौरान मतदाता सूचियों के निर्माण, बीएलओ और मतदान कर्मियों के प्रशिक्षण से लेकर मतदान समाप्ति के बाद ईवीएम मशीनों को सील कर स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखने की पूरी प्रक्रिया को संचालित और पर्यवेक्षित किया है। उनका कहना है कि इस सुदृढ़ व्यवस्था के कारण किसी भी स्तर पर अनधिकृत हस्तक्षेप करना संभव नहीं है।
पत्र में भारतीय चुनावों के उस पुराने दौर को भी याद किया गया है, जब मतपेटियों को लूटना, बूथ कैप्चरिंग करना और कमजोर तबकों के मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचने से जबरन रोकना एक आम समस्या हुआ करती थी। पूर्व नौकरशाहों का कहना है कि दशकों के दौरान तकनीकी और प्रशासनिक सुधारों के जरिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा के कड़े मानक विकसित किए हैं। ऐसे में वर्तमान दौर की आधुनिक और सुदृढ़ चुनावी व्यवस्था पर बिना किसी तथ्यात्मक साक्ष्य के धांधली का ठप्पा लगाना पूर्णतः अनुचित और संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के उदाहरण और रिकॉर्ड मतदान के आंकड़े
अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए पूर्व अधिकारियों ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का विशेष संदर्भ दिया है। पत्र में उल्लिखित दावों के मुताबिक, बिहार में वर्ष 1951 के बाद से अब तक का सर्वाधिक मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया। इस ऐतिहासिक चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि पूरे राज्य में किसी भी विधानसभा क्षेत्र अथवा मतदान केंद्र पर पुनर्मतदान कराने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इसके अतिरिक्त, राज्य भर में महिलाओं ने अभूतपूर्व संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रिकॉर्ड स्थापित किया।
पूर्व नौकरशाहों ने रेखांकित किया कि जिस बिहार में कभी चुनावी हिंसा और मतपेटियों पर अवैध कब्जे की घटनाएं सुर्खियों में रहती थीं, वहां बिना किसी पुनर्मतदान के शांतिपूर्ण और रिकॉर्ड मतदान संपन्न होना व्यवस्था में आए बुनियादी बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हालांकि, पत्र में साझा किए गए ये आंकड़े हस्ताक्षरकर्ता अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए गए दावे हैं, जिनका मूल्यांकन चुनाव आयोग के आधिकारिक डेटा के साथ तुलना करके ही किया जाना चाहिए।
चुनावी नतीजों की निष्पक्षता और राजनीतिक चयनात्मकता पर सवाल
खुली चिट्ठी में राजनीतिक दलों के उस दृष्टिकोण पर तीखा प्रहार किया गया है, जिसके तहत जीत मिलने पर व्यवस्था को दुरुस्त और हार का सामना करने पर उसी व्यवस्था को पक्षपाती बता दिया जाता है। अधिकारियों ने तर्क दिया कि किसी भी संस्था की साख को राजनीतिक परिणामों की सुविधा के अनुसार नहीं आंका जा सकता। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव का सीधा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए याद दिलाया कि मौजूदा चुनाव आयोग की देखरेख में ही केंद्र की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी ने संसद के निचले सदन में अपना पूर्ण बहुमत खो दिया था।
इसके अलावा, पत्र में हाल के वर्षों में हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में आयोजित हुए विधानसभा चुनावों का भी उल्लेख किया गया है, जहां विभिन्न विपक्षी दलों ने पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकारें बनाईं। पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जब अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों को विजय मिलती है, तो यह स्पष्ट करता है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह परिणाम-निरपेक्ष है। केवल राजनीतिक निराशा अथवा निराधार शंकाओं के आधार पर चुनावी अखंडता को कटघरे में खड़ा करना लोकतंत्र के लिए घातक है।
बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण और त्रुटि सुधार
पत्र का एक बड़ा हिस्सा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की आवश्यकता और उससे जुड़े तकनीकी पहलुओं पर केंद्रित है। पूर्व अधिकारियों के अनुसार, बिहार में वर्ष 2003 के पश्चात ऐसा कोई व्यापक और गहन पुनरीक्षण अभियान नहीं चलाया गया था। दो दशकों से अधिक समय बीत जाने के कारण मतदाता सूची में भारी विसंगतियां एकत्र हो गई थीं। इस एसआईआर प्रक्रिया के दौरान लगभग 22 लाख मृत मतदाताओं और करीब 7 लाख दोहरी यानी डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान की गई। इसके साथ ही ऐसे अनेक मतदाताओं के नाम भी सामने आए, जो संबंधित पते को छोड़कर स्थायी रूप से अन्य स्थानों पर बस चुके थे।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यदि मतदाता सूची में अपात्र, मृत अथवा फर्जी प्रविष्टियां वर्षों तक बनी रहें, तो यह स्थिति वास्तविक चुनाव के दिन फर्जी मतदान की गंभीर आशंकाओं को जन्म देती है। इसलिए समय-समय पर सूची को शुद्ध करना एक अनिवार्य प्रशासनिक कदम है। पूर्व नौकरशाहों ने यह सकारात्मक तथ्य भी उजागर किया कि इस सघन अभियान के दौरान न केवल अमान्य नाम चिह्नित किए गए, बल्कि करीब 21.5 लाख नए और पात्र मतदाताओं को विधिवत सूची में जोड़ा भी गया। अधिकारियों ने कहा कि एसआईआर को मतदाताओं के नाम काटने का अभियान मानने के बजाय सूची को शत-प्रतिशत त्रुटिहीन बनाने की दिशा में एक जरूरी प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। किसी नाम की पहचान होना, मसौदा सूची से अलग होना और अंततः अंतिम सूची से हटना पूरी तरह पृथक और औपचारिक चरण हैं।
मतदाताओं के कानूनी अधिकार, अपील प्रक्रिया और दलों के प्रतिनिधियों की भूमिका
चिट्ठी में इस भ्रांति का भी निवारण किया गया है कि मसौदा सूची से नाम हटने का अर्थ किसी नागरिक का मताधिकार स्थायी रूप से छीन लिया जाना है। पूर्व अधिकारियों ने बताया कि एसआईआर की तय कानूनी रूपरेखा के तहत किसी भी नाम को हटाने से पूर्व संबंधित व्यक्ति को बाकायदा कानूनी नोटिस जारी किया जाता है और उसकी बात सुनने के लिए सुनवाई का अवसर दिया जाता है। इसके पश्चात भी यदि कोई व्यक्ति संतुष्ट नहीं होता, तो उसके लिए अपील के दो अलग-अलग स्तर उपलब्ध कराए गए हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों ने राजनीतिक दलों की जवाबदेही पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि सभी मान्यता प्राप्त दलों को अधिकार है कि वे बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) के साथ अपने अधिकृत बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) तैनात करें। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जमीनी स्तर पर रहकर गलत नामों को हटवाने और किसी पात्र नागरिक का नाम छूट जाने की स्थिति में तत्काल आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। पत्र में दोहराया गया कि पारदर्शी नियमों, न्यायिक सुरक्षा उपायों और राजनीतिक निगरानी के बावजूद चुनाव आयोग पर बिना सुबूत बेबुनियाद आक्षेप लगाना किसी भी सूरत में उचित नहीं है।





















