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शारदीय नवरात्रि का आगाज: कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त और पहले दिन मां शैलपुत्री की संपूर्ण पूजा विधिधर्म
10 अक्तू॰ 2026, 6:38 pm (1 घंटे पहले)· 1

शारदीय नवरात्रि का आगाज: कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त और पहले दिन मां शैलपुत्री की संपूर्ण पूजा विधि

शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ पहले दिन कलश स्थापना और मां शैलपुत्री की उपासना का विधान है। शुभ मुहूर्त, दिशा, पूजा विधि और मंत्रों का पूरा विवरण यहां जानिए।

आश्विन मास के साथ ही शरद ऋतु का आगमन होता है और इसी पावन काल में शारदीय नवरात्रि का महापर्व शुरू होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार एक वर्ष में कुल चार बार नवरात्रि का उत्सव आता है, जिसमें पौष, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन महीने शामिल हैं। चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि को प्रमुख और प्रकट नवरात्रि माना जाता है, जबकि पौष और आषाढ़ में पड़ने वाली नवरात्रि गुप्त नवरात्रि के रूप में पूजी जाती हैं। आश्विन माह की यह पावन नवरात्रि पूरे नौ दिनों तक चलती है, जिसमें 11 अक्टूबर 2026, रविवार से जगतजननी मां दुर्गा के नौ अलग-अलग शक्ति स्वरूपों की विधिवत आराधना की जाएगी। यह नौ दिवसीय अनुष्ठान 19 अक्टूबर तक चलेगा और इसके अगले दिन 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा तथा नवरात्रि का पारण संपन्न होगा।

नवरात्रि के प्रथम दिन का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इसी दिन घरों और पूजा पंडालों में कलश स्थापना की जाती है और विधिवत जौ बोने की प्राचीन परंपरा निभाई जाती है। पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना का विधान है। धार्मिक ग्रंथों में पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण देवी के इस पावन स्वरूप को शैलपुत्री नाम दिया गया है।

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घटस्थापना की शुभ दिशा और समय

नवरात्रि के अनुष्ठान में घटस्थापना की दिशा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उत्तर-पूर्व दिशा, जिसे ईशान कोण कहा जाता है, देवी-देवताओं का निवास स्थान होती है। इसी वजह से कलश स्थापना के लिए उत्तर-पूर्व दिशा को ही सर्वश्रेष्ठ और शुभ माना जाता है।

शारदीय नवरात्रि 2026 के पहले दिन घटस्थापना के लिए विशेष मुहूर्त निर्धारित हैं। सुबह का सामान्य घटस्थापना मुहूर्त प्रातः 06:31 बजे से आरंभ होकर 10:27 बजे तक रहेगा। इसके अतिरिक्त जो श्रद्धालु सुबह तय समय में स्थापना न कर पाएं, उनके लिए दोपहर में घटस्थापना अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:01 बजे से दोपहर 12:49 बजे तक उपलब्ध रहेगा। इन दोनों ही मुहूर्तों में कलश की स्थापना करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

मां शैलपुत्री का दिव्य स्वरूप और धार्मिक महत्व

शास्त्रों में वर्णित विवरण के अनुसार मां शैलपुत्री का रूप अत्यंत मनमोहक और अलौकिक है। मां की सवारी वृषभ यानी बैल है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल सुशोभित रहता है, जबकि बाएं हाथ में पवित्र कमल का पुष्प विराजमान है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री की विधिवत उपासना करने से कुंडली में स्थित चंद्रमा के अशुभ प्रभाव पूरी तरह शांत हो जाते हैं।

प्रथम दिन मां शैलपुत्री की सच्चे मन से पूजा करने से भक्त को धन-धान्य, वैभव, सौभाग्य और उत्तम आरोग्य का वरदान मिलता है। जिन युवक-युवतियों के विवाह में बाधाएं या अड़चनें आ रही हों, उनके लिए मां शैलपुत्री की साधना अत्यंत लाभकारी बताई गई है। मां की कृपा से वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

साधना का विशेष मंत्र और दुर्गा सप्तशती का पाठ

मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालुओं को उनके बीज मंत्र का जप करना चाहिए। इस दिन का प्रमुख मंत्र 'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम' है। साधक अपनी इच्छानुसार संख्या तय करके इस मंत्र का ध्यानपूर्वक जप कर सकते हैं।

इसके साथ ही नवरात्रि की समूची अवधि में दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत कल्याणकारी और फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु नियमित रूप से दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है, उसे सभी प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय, संकट, मानसिक चिंता और शत्रुओं की पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है। इसके निरंतर पाठ से साधक को जीवन में सभी भौतिक सुख-साधनों और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।

चरणबद्ध पूजा विधि और भोग की परंपरा

मां शैलपुत्री की आराधना करने के लिए भक्तों को प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए और शुद्ध व स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल और घर के मंदिर की अच्छी तरह सफाई करके पूरे परिसर को गंगाजल का छिड़काव कर पवित्र बना लें।

शुद्ध किए गए स्थान पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर नया लाल कपड़ा बिछाएं। इसके ऊपर मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र की प्रतिष्ठा करें। इसके उपरांत मां के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का ध्यान लगाते हुए उन्हें धूप, दीप, सिंदूर, अक्षत, सफेद फूल और फल अर्पित करें। देवी शैलपुत्री को श्वेत रंग अत्यंत प्रिय माना गया है, इसलिए भोग के रूप में सफेद बर्फी या गाय के शुद्ध दूध से तैयार की गई मिठाई अर्पित की जानी चाहिए।

नैवेद्य अर्पण के पश्चात दुर्गा सप्तशती के अध्यायों का सस्वर पाठ करें और फिर मां शैलपुत्री के ध्यान मंत्रों का उच्चारण करें। अंत में पूरी श्रद्धा के साथ कपूर जलाकर मां अंबे की पावन आरती करें और उपस्थित परिजनों में प्रसाद वितरण कर पूजा संपन्न करें।

सवाल-जवाब

शारदीय नवरात्रि 2026 कब से शुरू होकर कब तक चलेगी?
शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026, रविवार से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक चलेगी। 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा और व्रत का पारण होगा।
घटस्थापना के लिए कौन से दो शुभ मुहूर्त हैं?
घटस्थापना का सुबह का मुहूर्त 06:31 बजे से 10:27 बजे तक है, जबकि दोपहर का अभिजित मुहूर्त 12:01 बजे से 12:49 बजे तक उपलब्ध है।
कलश स्थापना किस दिशा में करनी चाहिए?
कलश स्थापना घर के उत्तर-पूर्व कोने यानी ईशान कोण में करनी चाहिए, क्योंकि यह देवताओं की दिशा मानी जाती है।
नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के किस स्वरूप की पूजा होती है?
नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है।
मां शैलपुत्री का वाहन और अस्त्र-शस्त्र क्या हैं?
मां शैलपुत्री की सवारी बैल है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल सुशोभित रहता है।
मां शैलपुत्री को किस चीज का भोग लगाना चाहिए?
मां शैलपुत्री को सफेद रंग की बर्फी या शुद्ध दूध से बनी सफेद मिठाई का भोग लगाना चाहिए।
मां शैलपुत्री की पूजा के लिए कौन सा मंत्र जपना चाहिए?
मां शैलपुत्री की उपासना के लिए 'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम' मंत्र का जप करना चाहिए।
वर्ष में चार बार कौन-कौन सी नवरात्रि आती हैं?
वर्ष में पौष, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन माह में नवरात्रि आती हैं, जिनमें चैत्र और आश्विन की नवरात्रि प्रमुख होती हैं और बाकी दो गुप्त नवरात्रि होती हैं।
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