सिनेमा जगत में अपनी अनूठी पटकथाओं और भावुक किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले फिल्मकार नितेश तिवारी के जीवन का निजी अध्याय भी उतना ही मनमोहक और प्रेरणादायक है। दंगल और छिछोरे जैसी यादगार सिनेमाई रचनाओं के बाद अब जब वे रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश के अभिनय से सजी अपनी भव्य फिल्म रामायण को 5 नवंबर को बड़े पर्दे पर पेश करने की तैयारी में जुटे हैं, तब उनकी अपनी वास्तविक जिंदगी का प्रेम सफर भी लोगों का ध्यान खींच रहा है। उनकी जीवनसंगिनी अश्विनी अय्यर तिवारी खुद निल बटे सन्नाटा और बरेली की बर्फी जैसी संवेदनशील कृतियों का निर्देशन कर चुकी हैं। रचनात्मक दुनिया के इस नामचीन जोड़े का यह सफर किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम रोचक नहीं है, जिसकी नींव फिल्मों के चकाचौंध भरे सेटों पर नहीं, बल्कि विज्ञापनों के दफ्तरों और साझा बैठकों में रखी गई थी।
विज्ञापन की दुनिया और मुंबई के पब में पहली मुलाकात
इस रिश्ते की शुरुआत साल 2002 के दौरान हुई थी, जब दोनों विज्ञापन क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहे थे। उस दौर में नितेश लोवे लिंटस में अपनी सेवाएं दे रहे थे, जबकि अश्विनी लियो बर्नेट एजेंसी से जुड़ी हुई थीं। दोनों के कुछ साझा परिचित थे, जिनमें अश्विनी की सहेली कैनाज करमारकर भी शामिल थीं। कैनाज ने ही अश्विनी के सामने नितेश के बेहतरीन व्यक्तित्व और रेडियो विज्ञापनों में उनके उत्कृष्ट काम की दिल खोलकर तारीफ की थी। इस परिचय से अश्विनी के जेहन में नितेश को लेकर एक खास छवि पहले से ही उभर आई थी।
अश्विनी ने मन ही मन सोच रखा था कि नितेश बिल्कुल एक गंभीर लेखक जैसे दिखाई देंगे, जो नीली जींस पहने, चश्मा लगाए और हर वक्त अपनी ही दुनिया व विचारों में मग्न रहते हों। ताज्जुब की बात यह रही कि जब दोनों मुंबई के एक पब में पहली बार आमने-सामने आए, तो नितेश का पहनावा और उनका अंदाज बिल्कुल वैसा ही था जैसा अश्विनी ने कल्पना की थी। यह पहली मुलाकात दोनों के लिए बातचीत के सिलसिले का दरवाजा खोल गई।
तीन मुलाकातों का पक्का निश्चय और अलग रफ्तार
पहली भेंट के ठीक अगले रोज दोनों उसी पब में दोबारा मिले, जहां अश्विनी ने नितेश के सामने अपना पेशेवर पोर्टफोलियो रखा। नितेश ने उनके काम को काफी सराहा और उनकी रचनात्मक दृष्टि से वे खासे प्रभावित हुए। हालांकि निजी रिश्ते के स्तर पर दोनों की सोच और गति में बड़ा फर्क था। जहां नितेश बेहद संभलकर, ठहराव के साथ और धीरे-धीरे इस नए रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहे थे, वहीं अश्विनी के दिल में सब कुछ एकदम स्पष्ट हो चुका था। अश्विनी ने महज तीन मुलाकातों के भीतर यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वे नितेश को ही अपना जीवनसाथी बनाएंगी।
अश्विनी ने इस बारे में अपने घर पर अपनी मां से भी खुलकर चर्चा की। शुरुआत में उनकी मां के मन में थोड़ी हिचकिचाहट और चिंता थी, क्योंकि यह शादी उत्तर प्रदेश के एक परिवार में होने जा रही थी। मगर जैसे ही उन्हें यह जानकारी मिली कि नितेश ने प्रतिष्ठित आईआईटी से उच्च शिक्षा हासिल की है, उनकी अधिकांश आशंकाएं पल भर में शांत हो गईं। इस प्रसंग को याद करते हुए नितेश आज भी चुटकी लेते हैं कि उनकी इंजीनियरिंग की डिग्री का सबसे सार्थक उपयोग शायद उसी दिन हुआ था।
रिश्ते को प्राथमिकता और बैंकॉक का अवसर छोड़ना
खुद नितेश इस बात को खुले दिल से स्वीकार करते हैं कि यदि अश्विनी ने अपने फैसले को लेकर इतना अटूट विश्वास और दृढ़ता न दिखाई होती, तो शायद यह वैवाहिक बंधन संभव ही न हो पाता। अश्विनी ने अपने प्यार को बनाए रखने के लिए अपने करियर के एक बहुत बड़े अवसर की कुर्बानी दे दी थी। उन्हें बैंकॉक में काम करने का बेहतरीन ऑफर मिला था, लेकिन वे भौगोलिक दूरी को अपने पनपते रिश्ते के बीच बाधा नहीं बनने देना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने वह अंतरराष्ट्रीय अवसर ठुकरा दिया और अपने रिश्ते को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
अश्विनी के इस गहरे समर्पण और प्रतिबद्धता ने नितेश को भी इस रिश्ते की गंभीरता और गहराई का पूरा अहसास करा दिया। दोनों ने विवाह से पूर्व खुद का आशियाना तैयार करने के लिए मिलकर होम लोन भी लिया। बाद में हंसी-मजाक भरे अंदाज में नितेश ने घर की बालकनी को पूरी तरह से अश्विनी के अधिकार में सौंप दिया, जो उनके आपसी सहज प्यार और समझ को दर्शाता है।
दो संस्कृतियों का मेल और पेशेवर तालमेल
नितेश उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हैं, जबकि अश्विनी तमिलनाडु के तमिल परिवार से आती हैं। दो अलग-अलग राज्यों, भाषाओं और पारिवारिक पृष्ठभूमियों के कारण शुरुआत में सांस्कृतिक भिन्नता का अहसास जरूर था। लेकिन जब दोनों परिवार आपस में मिले, तो उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि भाषा भले अलग हो, परंतु जीवन मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों और शिक्षा के प्रति दोनों का नजरिया पूरी तरह एक जैसा है।
शादी के बाद भी विज्ञापन की दुनिया में दोनों का पेशेवर सहयोग लंबा चला। अश्विनी ने करीब सात वर्षों तक उसी एजेंसी में काम करते हुए नितेश को रिपोर्ट किया। हालांकि पति और पत्नी के तौर पर एक ही कार्यस्थल पर काम करना आसान नहीं था। टीम के भीतर किसी भी तरह के पक्षपात का संदेश न जाए, इसके लिए नितेश जानबूझकर अश्विनी के काम और समीक्षाओं के प्रति जरूरत से ज्यादा सख्त रुख अपनाते थे। वहीं दूसरी तरफ, अश्विनी को भी अपने बलबूते यह स्थापित करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी कि उनकी अपनी स्वतंत्र रचनात्मक पहचान है और वे केवल अपने पति की परछाई भर नहीं हैं।
एक-दूसरे का मजबूत सहारा और सबसे बड़ा इम्तिहान
वक्त के साथ दोनों का यह सहयोग विज्ञापन से निकलकर मुख्यधारा के सिनेमा तक पहुंच गया। आज वे एक-दूसरे की रचनात्मक ताकत बने हुए हैं। नितेश अपनी पत्नी की फिल्मों के लेखन और पटकथा को निखारने में सक्रिय मदद करते हैं, जबकि अश्विनी भी नितेश की विशाल परियोजनाओं में एक शांत लेकिन बेहद मजबूत स्तंभ की तरह हमेशा उनके साथ खड़ी रहती हैं।
5 नवंबर को प्रदर्शित होने वाली फिल्म रामायण नितेश तिवारी के सिनेमाई जीवन की अब तक की सबसे विशाल और महत्वाकांक्षी कृति मानी जा रही है। भगवान राम के रूप में रणबीर कपूर, माता सीता के रूप में साई पल्लवी और लंकापति रावण के अवतार में यश को लेकर बनाई गई यह फिल्म केवल एक बॉक्स ऑफिस प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत की सबसे पूज्य गाथा को पर्दे पर जीवंत करने का बहुत बड़ा दायित्व है। इस विशाल दायित्व और परीक्षा की घड़ी में दोनों की अपनी वास्तविक प्रेम कहानी का यह भरोसा और दशकों का साथ इस क्षण को और भी अनूठा बना देता है।


















