भारतीय बॉक्स ऑफिस पर जब भी किसी फिल्म की भव्य कमाई की बात होती है, तो आमतौर पर किसी बड़े बैनर, भारी भरकम बजट या किसी स्थापित सुपरस्टार का चेहरा दिमाग में उभरता है। हालांकि, संत नीम करोली बाबा के जीवन प्रसंगों पर केंद्रित एक आध्यात्मिक गाथा ने पारंपरिक उद्योग समीकरणों को पूरी तरह पलट दिया है। फिल्म हनुमान अंश ने दर्शकों के बीच ऐसा अप्रत्याशित जुड़ाव स्थापित किया कि बिना किसी आक्रामक स्टार पावर के इस प्रोजेक्ट ने वैश्विक स्तर पर 280 करोड़ रुपये से अधिक का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन दर्ज कर लिया। ढाई घंटे की इस पेशकश को सिनेमाघरों में 1 करोड़ से अधिक दर्शकों का प्यार हासिल हुआ, जिसने स्वतंत्र सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित कर दिया है।
चार लोगों का अटूट भरोसा और जोखिम भरा सफर
इस अप्रत्याशित उपलब्धि की बुनियाद किसी बहुराष्ट्रीय मनोरंजन कॉर्पोरेशन के बोर्डरूम में नहीं, बल्कि चार समर्पित व्यक्तियों के अटूट विश्वास से तैयार हुई थी। इस परियोजना को साकार करने का जिम्मा डॉ. विशाल चतुर्वेदी, अनुप्रिया नागर, नम्रता जी सिंह और रागिनी सोना ने संयुक्त रूप से उठाया। निर्माण से जुड़े घटनाक्रम बताते हैं कि रागिनी सोना और नम्रता जी सिंह इस यात्रा की शुरुआती निर्माता थीं, जिन्होंने प्रोजेक्ट की रूपरेखा को ठोस आकार दिया। बाद में निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी और युवा निवेशक अनुप्रिया नागर के जुड़ने से यह समूह पूरा हुआ। चारों सहयोगियों ने न केवल वित्तीय चुनौतियां झेलीं, बल्कि सीमित संसाधनों के बीच निर्माण स्तर पर किसी भी प्रकार का समझौता न करने का संकल्प लिया।
21 वर्ष की उम्र में ब्रिटेन की जमा पूंजी दांव पर लगाई
फिल्म निर्माण की इस रोमांचक यात्रा में सबसे प्रेरक पहलू 21 साल की अनुप्रिया नागर का साहसिक फैसला रहा। जब फिल्म की मुख्य फोटोग्राफी और शूटिंग का चरण समाप्त हो चुका था, तब संपादन और तकनीकी फिनिशिंग यानी पोस्ट-प्रोडक्शन के स्तर पर टीम को गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। काम रुकने की कगार पर था और अतिरिक्त पूंजी की तत्काल जरूरत थी। ऐसे नाजुक मोड़ पर अनुप्रिया नागर ने आगे बढ़कर अपनी ब्रिटेन में अर्जित गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इस प्रोजेक्ट में झोंक दिया।
नीम करोली बाबा के प्रति गहरी आध्यात्मिक निष्ठा रखने वाली अनुप्रिया के लिए यह कोई सामान्य निवेश निर्णय नहीं था। उनके मुताबिक, विषय वस्तु की पवित्रता और कथा के मानवीय पहलुओं ने उनके मन को भीतर तक छुआ था। इसी भावनात्मक लगाव के चलते उन्होंने अपनी युवावस्था की मेहनत से बनाई गई बचत को एक अनिश्चित भविष्य वाली स्वतंत्र फिल्म के संवारने में लगा दिया। इस समय पर मिली वित्तीय संजीवनी ने फिल्म को तकनीकी रूप से समृद्ध बनाकर बड़े पर्दे तक पहुंचाने का रास्ता साफ किया।
अनुभवी रणनीतिकार नम्रता जी सिंह का योगदान
एक तरफ जहां युवा ऊर्जा और आस्था का संबल था, वहीं दूसरी तरफ मनोरंजन बाजार के व्यावहारिक गणित को साधने के लिए नम्रता जी सिंह की पेशेवर समझ मौजूद थी। नम्रता फिल्म और मीडिया प्रचार की दुनिया में वर्ष 2009 से लगातार सक्रिय रही हैं। वह एवरीमीडिया की संस्थापक होने के साथ-साथ स्वंभू मीडिया नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक और निवेशक की भूमिका निभा रही हैं। हिंदी सिनेमा के कई शीर्ष बैनरों के प्रचार अभियानों को संचालित करने का व्यापक अनुभव उनके पास रहा है।
अपने लंबे पेशेवर सफर के दौरान उन्होंने धर्मा, वाईआरएफ, रेड चिलीज, पीवीआर, फॉक्स स्टार, बालाजी, सोनी, फ्राइडे फिल्म वर्क्स और प्रीतीश नंदी जैसे दिग्गज प्रोडक्शन घरानों के साथ विपणन अभियानों का समन्वय किया है। अक्षय कुमार जैसे अग्रणी अभिनेताओं की डिजिटल पहचान स्थापित करने में उनकी उल्लेखनीय भूमिका रही है। इसके अतिरिक्त, जब अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म रा-वन रिलीज हो रही थी, तब भारत के शुरुआती यूट्यूब लाइवस्ट्रीम अभियानों में भी उन्होंने अहम रणनीतिक जिम्मेदारी निभाई थी।
संगीत और ब्रांड निर्माण की दुनिया से पहली बार निर्माण में कदम
मार्केटिंग के अलावा संगीत के क्षेत्र में भी नम्रता की गहरी पैठ रही है। वह प्रतिष्ठित संगीत मंच द सूफी रूट की सह-मालकिन हैं, जिसे वह सुप्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान के साथ मिलकर संचालित करती हैं। संगीत, डिजिटल तकनीक और प्रचार तंत्र के त्रिकोण पर उनकी इस पकड़ ने फिल्म के प्रचार में भारी लाभ पहुंचाया। हालांकि, इतने व्यापक अनुभव के बावजूद पूर्णकालिक फिल्म निर्माता के रूप में यह उनका बिल्कुल पहला अनुभव था, जिसमें उन्होंने बिना किसी स्थापित स्टार कास्ट के विषय वस्तु पर पूरा भरोसा जताया।
रागिनी सोना और निर्देशक विशाल चतुर्वेदी का समर्पण
प्रोजेक्ट के आधार स्तंभ के रूप में रागिनी सोना ने शुरुआती चरण से ही निर्माण प्रबंधन को संभाले रखा। वहीं निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने निर्देशन के साथ-साथ निर्माण की दोहरी जिम्मेदारी निभाई। नीम करोली बाबा के विचारों और उनकी सादगी को रूपहले पर्दे पर उतारते समय उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि व्यावसायिकता के चक्कर में मूल आध्यात्मिक रस कमजोर न पड़े। फिल्म की पटकथा से लेकर उसके भक्ति गीतों तक, हर पहलू में गहरी निष्ठा पिरोई गई।
सीमित बजट में बनी इस रचना ने यह प्रमाणित कर दिया कि यदि भावना सच्ची हो और कथ्य प्रभावशाली हो, तो दर्शक खुद ब खुद सिनेमाघरों तक खिंचे चले आते हैं। एक अनुभवी मीडिया रणनीतिकार, दो निष्ठावान प्रारंभिक निर्माता और 21 वर्ष की एक साहसी निवेशक के संगम ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया है, जिसकी मिसाल आने वाले लंबे समय तक दी जाएगी।
















