भारतीय जनमानस में प्रभु श्री राम की भक्ति की बात चलते ही एक अलौकिक धुन बरबस जुबान पर आ जाती है, 'राम सिया राम, सिया राम जय जय राम'। यह धुन न केवल धार्मिक उत्सवों और दैनिक पूजा-अर्चना का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है, बल्कि आधुनिक सिनेमाई प्रस्तुतियों तक में इसकी गूंज निरंतर सुनाई देती है। हाल ही में रणबीर कपूर अभिनीत रामायण के जय जय राम गीत में भी इस सुप्रसिद्ध धुन की झलक स्पष्ट तौर पर महसूस की गई। इसके अलावा आज के दौर में हनुमान अंश के नेत्रहीन गायक भी खासे लोकप्रिय हो रहे हैं, जिससे एक बार फिर उस महान फनकार की स्मृति ताजा हो गई है, जिन्होंने आंखों की रोशनी न होने के बावजूद संगीत जगत को यह कालजयी रचना सौंपी थी।
साल 1975 में हुआ था इस अमर रचना का सृजन
इस अद्भुत भक्तिमय गीत की रचना के पीछे भारतीय सिनेमा के महान संगीतकार, गीतकार और गायक रविंद्र जैन की विलक्षण प्रतिभा थी। उन्होंने वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म 'गीत गाता चल' के लिए इस धुन को संगीतबद्ध किया था। इस भजन को अपनी रूहानी आवाज में ढालने वाले गायक जसपाल सिंह थे। रविंद्र जैन का कर्णप्रिय संगीत और जसपाल सिंह की ओजस्वी आवाज का ऐसा बेजोड़ संगम बना कि यह गीत मात्र एक फिल्मी नंबर न रहकर हमेशा-हमेशा के लिए भारतीय संगीत इतिहास में अमर हो गया। बीते पांच दशकों से अधिक समय में आज तक कोई अन्य राम भजन इसकी लोकप्रियता और आत्मीयता की बराबरी नहीं कर सका है।
गीत गाता चल में सचिन पिलगांवकर और सारिका की जोड़ी
फिल्म 'गीत गाता चल' में मुख्य भूमिकाएं सचिन पिलगांवकर और सारिका ने निभाई थीं। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और इसके गानों ने संगीत प्रेमियों के बीच अपार सफलता अर्जित की। इसी फिल्म के भीतर रविंद्र जैन ने गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई 'मंगल भवन अमंगल हारी' को अपने अनूठे और भावपूर्ण अंदाज में ढाला था। इसी चौपाई के साथ उन्होंने 'राम सिया राम, सिया राम जय जय राम' की पंक्तियों को समाहित किया। यह पंक्ति इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि बाद के दशकों में असंख्य भजनों और फिल्मी प्रस्तुतियों में इसे बार-बार विभिन्न शैलियों में शामिल किया गया।
रबींद्रनाथ टैगोर की कहानी अतिथि पर आधारित थी फिल्म
सिनेमाई परिप्रेक्ष्य से देखें तो 'गीत गाता चल' का निर्देशन हीरेन नाग ने किया था, जबकि इसके समस्त गीतों की रचना और संगीत संयोजन रविंद्र जैन के जिम्मे था। यह फिल्म विश्वकवि रबींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध लघु कहानी 'अतिथि' पर आधारित थी। इस फिल्म के एल्बम में कुल 9 गीत शामिल थे, जिन्हें उस दौर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायकों ने अपनी आवाज दी थी। इनमें किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, आशा भोसले और जसपाल सिंह के स्वर शामिल थे। एल्बम के अन्य लोकप्रिय गीतों में 'गीत गाता चल ओ साथी', 'श्याम तेरी बंसी पुकारे' और 'मंगल भवन अमंगल हारी' जैसे कालजयी गीत सम्मिलित थे, जो आज भी चाव से सुने जाते हैं।
रामानंद सागर की रामायण और घर-घर पहुंची धुन
वर्ष 1987 में जब निर्देशक रामानंद सागर ने ऐतिहासिक धारावाहिक 'रामायण' का निर्माण शुरू किया, तब उन्होंने इसके संगीत निर्देशन की कमान रविंद्र जैन को सौंपी। इस पौराणिक धारावाहिक के माध्यम से रविंद्र जैन ने इस दिव्य धुन को दूरदर्शन के जरिए देश के कोने-कोने और हर घर के आंगन तक पहुंचा दिया। धारावाहिक की अपार लोकप्रियता के चलते यह धुन सीधे आम जनता की धार्मिक आस्था का हिस्सा बन गई। यही कारण है कि आज भी किसी भी घर में पूजा, आरती या कोई पावन धार्मिक अवसर हो, जसपाल सिंह की गाई और रविंद्र जैन की रची यह धुन अनिवार्य रूप से सुनाई देती है।
नेत्रहीनता को मात देकर रचा संगीत का स्वर्णिम इतिहास
रविंद्र जैन जन्म से ही नेत्रहीन थे और दोनों आंखों से देख नहीं सकते थे। मगर दृष्टि का यह अभाव कभी भी उनकी असाधारण रचनात्मकता और संगीत साधना के आड़े नहीं आया। वे अंतर्मन और हृदय की गहराई से संगीत का ताना-बाना बुनते थे। उनकी बनाई धुनों की सहजता, मधुरता और रूहानियत ऐसी थी कि बड़े-बड़े संगीत साधक भी उनकी प्रतिभा का लोहा मानते थे। 28 फरवरी 1944 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्मे रविंद्र जैन ने अपने करियर में सौदागर, पहेली, राम भरोसे, पति पत्नी और वो, राम तेरी गंगा मैली और विवाह जैसी अनेक यादगार फिल्मों में अविस्मरणीय संगीत दिया। कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया था। 71 वर्ष की आयु में 9 अक्टूबर 2015 को इस महान संगीत साधक का निधन हुआ, लेकिन उनकी रची धुनें आज भी अमर हैं।















