धार्मिक परंपराओं में महादेव की आराधना के लिए त्रिशूल स्वरूप बेलपत्र को बेहद पावन स्थान दिया गया है, लेकिन पारंपरिक चिकित्सा में इसका महत्व महज पूजा विधान तक सीमित नहीं है। बेल वृक्ष के फल का गूदा, शरबत अथवा मुरब्बा तो सेहत सुधारने के लिए पहले से ही खूब इस्तेमाल होता रहा है, मगर इसकी तीन पत्तियों वाली संरचना भी कई तरह के शारीरिक विकारों में किसी रामबाण औषधि की तरह उपयोगी मानी गई है। विशेष रूप से पेट और पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली जब लंबे समय तक असंतुलित रहती है, तब इस पौधे के घटक शरीर को स्वाभाविक राहत प्रदान करते हैं।
इरिटेबल बाउल सिंड्रोम और आंतों की सूजन में असर
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय नगर बलिया में कार्यरत और पांच साल का व्यावहारिक अनुभव रखने वाली चिकित्साधिकारी डॉ. वंदना तिवारी के अनुसार, बेल का फल और इसकी पत्तियां दोनों ही मानवीय स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी परिणाम देते हैं। बेलपत्र का प्राथमिक औषधीय उपयोग आंतों तथा जठराग्नि से जुड़ी विकृतियों को संतुलित करने में किया जाता है। खासतौर पर जब कोई व्यक्ति IBS यानी इरिटेबल बाउल सिंड्रोम की चपेट में आ जाता है, तब पाचन मार्ग के भीतर अंदरूनी सूजन पनपने लगती है। इस आंतरिक सूजन की वजह से पीड़ित को कभी अचानक पतले दस्त लग जाते हैं, तो कभी गंभीर कब्जियत की परेशानी का सामना करना पड़ता है। आंतों की इस अनियमित कार्यप्रणाली को पटरी पर लाने में बेल एक केंद्रीय और प्रमुख औषधि का दायित्व निभाता है।
सेवन का उपयुक्त तरीका और सही खुराक
डॉ. वंदना तिवारी बताती हैं कि इरिटेबल बाउल सिंड्रोम की जटिलताओं में बेल के फल का गूदा और इसकी सूखी पत्तियों का महीन चूर्ण दोनों ही अपना असर दिखाते हैं। इसके अलावा अतिसार यानी दस्त, भोजन के ठीक से न पचने की समस्या और खट्टी डकारों या एसिडिटी की शिकायत में भी बेलपत्र का चूर्ण बहुत गुणकारी पाया गया है। पत्तियों को छाया में सुखाकर बनाए गए बारीक पाउडर के रूप में इसका इस्तेमाल करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है। सामान्य तौर पर इस चूर्ण की आधी चम्मच मात्रा सुबह और शाम के समय लेना सेहत के लिए मुफीद बताया गया है।
विशेषज्ञ परामर्श के बिना सेवन से बचने की सलाह
औषधीय गुणों से भरपूर होने के बावजूद डॉ. वंदना तिवारी ने स्पष्ट ताकीद की है कि किसी भी प्राकृतिक उपचार का सहारा लेने से पहले योग्य वैद्य या चिकित्सक से मशविरा लेना अनिवार्य है। हर विकार में दवा की प्रकृति अलग ढंग से कार्य करती है। उदाहरण के लिए, सामान्य कब्ज की दशा में बेलपत्र का अत्यधिक प्रयोग उपयुक्त नहीं समझा जाता, जबकि दस्त की स्थिति अथवा इरिटेबल बाउल सिंड्रोम की समस्या में यह असाधारण रूप से प्रभावी होता है। रोग की सटीक अवस्था, शारीरिक प्रकृति और लक्षण भिन्न होने के कारण खुराक में फेरबदल हो सकता है, इसलिए बगैर चिकित्सकीय मार्गदर्शन के इसका नियमित सेवन शुरू नहीं करना चाहिए।



















