हिंदी सिनेमा पर दशकों से राज करने वाले कपूर परिवार ने भारतीय फिल्म उद्योग को कई लोकप्रिय अभिनेता दिए हैं। पृथ्वीराज कपूर और शशि कपूर के दौर से लेकर ऋषि कपूर और रणबीर कपूर तक, इस प्रतिष्ठित घराने के अधिकांश कलाकारों ने अपनी मुख्य नायक और नायिका की भूमिकाओं के साथ फैंस के दिलों में खास जगह बनाई है। हालांकि, इसी सिनेमाई परिवार से एक ऐसे दिग्गज कलाकार भी निकले जिन्होंने मुख्य अभिनेता के रूप में शुरुआत करने के बावजूद अपनी असली पहचान पर्दे पर खौफ और दबदबा पैदा करने वाले नकारात्मक किरदारों के जरिए बनाई। वह बहुमुखी अभिनेता और निर्माता कमल कपूर थे, जिन्होंने भारतीय फिल्मों में विलेन की भूमिकाओं को एक नया आयाम दिया।
शुरुआती जीवन, शिक्षा और अभिनय करियर की शुरुआत
कमल कपूर का जन्म 22 फरवरी 1920 को पेशावर, पाकिस्तान में हुआ था। वह प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के चचेरे भाई थे। अपनी शुरुआती शिक्षा और लाहौर स्थित डीएवी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया। साल 1946 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘दूर चले’ के जरिए उन्होंने बतौर मुख्य हीरो अपने सिनेमाई सफर की शुरुआत की। हालांकि, शुरुआती दौर में मुख्य अभिनेता के रूप में उन्हें दर्शकों से वह अपेक्षित सफलता और लोकप्रियता नहीं मिल सकी जिसकी उन्हें उम्मीद थी। असफलता से निराश होने के बजाय, उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता को एक नई दिशा देने का निर्णय लिया।
हीरो से खौफनाक विलेन बनने का सफर और 600 फिल्मों का कीर्तिमान
मुख्य अभिनेता की भूमिकाओं में मनमुताबिक परिणाम न मिलने के बाद कमल कपूर ने नकारात्मक और खलनायक के किरदारों की ओर रुख किया। पर्दे पर उनके इस नए अवतार को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और उनकी दमदार संवाद अदायगी तथा प्रभावशाली अभिनय को काफी सराहा गया। पांच दशकों से अधिक लंबे अपने शानदार करियर में उन्होंने लगभग 600 फिल्मों में काम कर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित न रहकर उन्होंने पंजाबी और गुजराती भाषा की कई यादगार फिल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा बिखेरा।
दर्शकों के बीच उनके विलेन वाले किरदारों को जबरदस्त लोकप्रियता हासिल हुई। उनके व्यापक करियर में ‘डॉन’, ‘नारंग’, ‘मर्द’, ‘आग’, ‘दीवाना’, ‘कालीचरण’, ‘खेल खेल में’ और ‘नमक हलाल’ जैसी कई ब्लॉकबस्टर फिल्में शामिल हैं, जहां उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं। इसके अलावा, वह भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों जैसे ‘पाकीजा’, ‘दीवार’, ‘सीती और गीता’ और ‘जब तक फूल खिले’ का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहे, जिससे उनकी अभिनय क्षमता और बहुमुखी प्रतिभा का पता चलता है।
पारिवारिक जीवन, सिनेमाई रिश्ते और अंतिम समय
कमल कपूर के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उन्होंने साल 1945 में सुमन देवी कपूर से विवाह किया था। इस दंपत्ति के पांच बच्चे हुए, जिनमें तीन बेटे और दो बेटियां शामिल हैं। उनके परिवार के तार फिल्म उद्योग के अन्य प्रसिद्ध घरानों से भी जुड़े हुए हैं। उनकी छोटी बेटी का विवाह जाने-माने फिल्म निर्माता रमेश बहल से हुआ था। इस नाते वह वर्तमान दौर के लोकप्रिय निर्देशक और निर्माता गोल्डी बहल की मां हैं, जिससे कमल कपूर गोल्डी बहल के नाना लगते हैं।
अपने दीर्घकालिक सिनेमाई योगदान के बाद, 2 अगस्त 2010 को 90 वर्ष की आयु में मुंबई में कमल कपूर का निधन हो गया। यद्यपि वह शारीरिक रूप से दुनिया में नहीं हैं, लेकिन भारतीय सिनेमा की करीब 600 फिल्मों में निभाए गए उनके यादगार खलनायक किरदारों के माध्यम से वह आज भी करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में जीवित हैं।



















