सिनेमाई गलियारों में हर शख्स की कहानी जुदा होती है। कुछ लोग बड़े पर्दे पर चमकने का ख्वाब लेकर मायानगरी का रुख करते हैं, मगर उनकी राहें अलग मोड़ ले लेती हैं। कुछ कलाकारों को अपनी जमीन तलाशने के लिए लंबी लड़ाइयां लड़नी पड़ती हैं, तो कुछ बहुत जल्द अपनी जगह बना लेते हैं। जाने-माने निर्देशक सुभाष घई का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा है। हालांकि उन्होंने कभी परदे पर हीरो बनने की ख्वाहिश पाल रखी थी, लेकिन एक कामयाब अभिनेता न बन पाने की कसक उन्हें आज भी नहीं सताती।
अपने लंबे सफर में इस दिग्गज निर्देशक ने कई ऐसी सिनेमैटिक प्रस्तुतियां दी हैं जो आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। खास बात यह है कि अपने साथ सफर शुरू करने वाले कई साथियों को बुलंदियों पर पहुंचते देखने के बावजूद उन्हें इस बात का कभी मलाल नहीं हुआ कि वे खुद अभिनय के शिखर पर नहीं पहुंच सके। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपने शुरुआती दौर के संघर्षों और मेगास्टार अमिताभ बच्चन के साथ अपने रिश्तों पर खुलकर चर्चा की।
साल 1987 में क्यों रुक गई थी देवा फिल्म?
सुभाष घई ने उस दौर को याद किया जब उन्होंने अमिताभ बच्चन को लेकर एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू किया था। वर्ष 1987 में उन्होंने देवा नाम की फिल्म पर काम शुरू किया था और कुछ हिस्सों की शूटिंग भी पूरी हो चुकी थी, लेकिन बाद में इस फिल्म को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। इसकी मुख्य वजह उस समय के महानायक का बेहद व्यस्त शेड्यूल था। उन दिनों अमिताभ बच्चन अभिनय के साथ-साथ राजनीति की दुनिया में भी सक्रिय हो चुके थे, जिसके चलते वे लगातार समय नहीं दे पा रहे थे।
निर्देशक अपनी फिल्मों को एक तयशुदा अनुशासन और लगातार तारीखों के साथ शूट करने में विश्वास रखते हैं। जब उन्हें लगा कि अमिताभ बच्चन की व्यस्तताओं के कारण शूटिंग लगातार नहीं हो पा रही है और तारीखों का भारी संकट है, तो उन्होंने इस प्रोजेक्ट को बंद करने का फैसला किया। उनका मानना था कि किसी फिल्म को टुकड़ों में खींचने से बेहतर है कि उसे बीच में ही रोक दिया जाए।
इस बड़े प्रोजेक्ट के बंद होने के बावजूद दोनों के बीच मनमुटाव की कोई बात सामने नहीं आई। निर्देशक ने स्पष्ट किया कि इस वाकये की वजह से उनके और अमिताभ बच्चन के रिश्तों में कभी खटास नहीं आई। आज भी दोनों के बीच गहरा आदर और स्नेह बना हुआ है। उन्होंने महानायक की तारीफ करते हुए कहा कि वे आज भी अपने अभिनय के दम पर दर्शकों के दिलों पर राज कर रहे हैं और इंडस्ट्री में उनका मुकाम बहुत ऊंचा है।
अभिनय से निर्देशन तक का सफर
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए फिल्मकार ने बताया कि कॉलेज के दिनों में वे अभिनय के साथ-साथ निर्देशन में भी हाथ आजमाया करते थे। हालांकि उनका अभिनय करियर परवान नहीं चढ़ सका, लेकिन वे इसे अपनी हार बिल्कुल नहीं मानते। उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं है कि वे एक सफल अभिनेता नहीं बन सके। उनके अनुसार, अगर वे अभिनय में कामयाब हो जाते, तो शायद उनका ध्यान निर्देशन और लेखन की तरफ नहीं जाता।
एक समय किसी अन्य निर्देशक ने उन्हें सलाह दी थी कि उनकी लेखन शैली बहुत उम्दा है। यही सलाह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई और उन्होंने पूरी तरह से कहानी कहने और निर्देशन की दुनिया को अपना लिया। आज यही पहचान उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है, जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा के शीर्ष फिल्मकारों की फेहरिस्त में ला खड़ा किया है।
डिजिटल माध्यमों के बदलते दौर पर बात करते हुए उन्होंने सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की तुलना की। उनका कहना है कि सिनेमाघरों में टिकटों की ऊंची कीमतें दर्शकों के लिए एक बड़ा पहलू होती हैं, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोग कम खर्च में या मासिक सब्सक्रिप्शन के जरिए आसानी से फिल्में देख लेते हैं। हालांकि उनका साफ मानना है कि माध्यम कोई भी हो, सबसे अहम चीज एक मजबूत कहानी है। यदि कथ्य में दम है और वह दर्शकों को बांधने में कामयाब होती है, तो फिल्म छोटी स्क्रीन पर भी अपनी छाप छोड़ने में सफल हो जाती है।



















