सिनेमा जगत में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका देहावसान गोवा स्थित उनके आवास पर हुआ। कई दशकों तक फिल्मी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने के बावजूद वे हमेशा आडंबर और चमक-दमक से कोसों दूर रहे। बेहद सादा जीवन जीने के कायल नाना पाटेकर का दिल असल में गांवों, मिट्टी और खेती-किसानी में बसता था। वे अक्सर पुणे के समीप स्थित अपने विशाल फार्महाउस पर समय बिताना पसंद करते थे, जहाँ वे पूरी तरह से एक ग्रामीण दिनचर्या में ढल जाते थे।
किसानों के संघर्ष और नाम फाउंडेशन से गहरा जुड़ाव
किसानों की समस्याओं और उनके जीवन संघर्षों को लेकर नाना पाटेकर हमेशा बेहद संवेदनशील रहे। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे सूखा प्रभावित इलाकों में किसानों की दुर्दशा, कर्ज के भारी संकट और आत्महत्या के गंभीर मुद्दों पर वे न केवल मुखर रहे, बल्कि उन्होंने जमीनी स्तर पर ठोस कदम भी उठाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' की नींव रखी, जिसने संकटग्रस्त ग्रामीण परिवारों को आर्थिक और सामाजिक संबल देने का बीड़ा उठाया। वे हमेशा यह स्पष्ट मानते थे कि रंगमंच अथवा कैमरे के सामने वे एक कलाकार हैं, लेकिन खेत की मेड़ों पर वे सिर्फ एक किसान हैं।
खड़कवासला में 27 एकड़ का प्राकृतिक ठिकाना
पुणे के पास खड़कवासला में फैला 27 एकड़ का उनका फार्महाउस किसी भी तरह के मॉडर्न विला या लक्जरी रिसॉर्ट जैसा बिल्कुल नहीं दिखता। इस फार्महाउस को पूरी तरह से प्राकृतिक स्वरूप में संजोकर रखा गया है। परिसर में मिट्टी की खुशबू, हरियाली, लकड़ी का सामान्य फर्नीचर और पारंपारिक लकड़ी की बीम वाली छतें मौजूद हैं। इस फार्महाउस में 7 कमरे और एक बड़ा हॉल बनाया गया है, जहाँ किसी भी तरह की दिखावटी सजावट या आलीशान तामझाम नहीं है। यहाँ केवल कुदरती नजारे, पेड़-पौधों की शीतल छाया, फसलें और पालतू पशु ही दिखाई देते हैं।
खेतों की उपज, देसी रसोई और मवेशी
इस फार्महाउस पर नाना पाटेकर खुद खेती-बाड़ी की निगरानी करते थे। यहाँ चावल, गेहूं, लहसुन, प्याज और बाजरा जैसी फसलें उगाई जाती थीं। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार की ताजी सब्जियां और फूल भी फार्म पर पैदा किए जाते थे। नाना पाटेकर को खुद देसी अंदाज में खाना पकाने का गहरा शौक था। वे अक्सर साक्षात्कारों में केले के फूल की सब्जी का विशेष रूप से उल्लेख करते थे और भावुक होकर बताते थे कि उनकी मां इस सब्जी को बेहद स्वादिष्ट बनाती थीं। जानवरों के प्रति उनका स्नेह भी जगजाहिर था। लॉकडाउन के दौर में उन्होंने एक बातचीत में साझा किया था कि उनके फार्म पर 12 गायें, 2 बैल और 5 कुत्ते रहते हैं, जिनकी वे पूरी आत्मीयता से देखभाल करते थे।
एक बीएचके फ्लैट और पुश्तैनी जड़ें
करोड़ों की शोहरत कमाने के बाद भी मुंबई में उनके पास अंधेरी के लोखंडवाला स्थित समर्थ नगर में महज एक बीएचके का साधारण फ्लैट था। शहर में रहने और पेशेवर कामकाज निपटाने के लिए वे इसी छोटे से फ्लैट का उपयोग करते थे। उन्हें कभी भी किसी बड़े बंगले या बहुमंजिला पेंटहाउस की चाहत नहीं रही। उनके पारिवारिक इतिहास की बात करें तो उनका पुश्तैनी मकान महाराष्ट्र के रत्नागिरी में स्थित था। वे सात भाई-बहनों में से अकेले जीवित बचे थे, और 8 अक्टूबर को उन्होंने भी इस दुनिया से विदा ले ली।



















