भारतीय सिनेमा के इतिहास में हॉलीवुड या पश्चिमी सिनेमा की कहानियों से प्रेरणा लेने अथवा उनकी औपचारिक रीमेक बनाने के किस्से आम रहे हैं। दशकों से हिंदी फिल्मों पर विदेशी पटकथाओं को अपनाने के उदाहरण मिलते रहे हैं, लेकिन अमेरिकी फिल्म उद्योग किसी स्थापित बॉलीवुड कहानी को उठाकर अपने दर्शकों के लिए ढाले, यह बेहद दुर्लभ घटना मानी जाती है। ऐसा ही एक अनोखा अध्याय भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के करियर से जुड़ा है। अस्सी के दशक के अंत में जिस क्राइम ड्रामा ने नाना पाटेकर को देश भर में पहचान दिलाई और उनका कद मजबूत किया, उसी कहानी का आगे चलकर एक आधिकारिक हॉलीवुड रूपांतरण भी तैयार किया गया था। मशहूर हॉलीवुड सितारों, शीर्ष तकनीशियनों और बड़े निवेश के साथ तैयार होने के बावजूद यह अमेरिकी प्रयोग सिनेमाघरों में कोई खास कमाल नहीं दिखा सका। नाना पाटेकर 75 वर्ष की उम्र में अब इस दुनिया में नहीं रहे, और ऐसे समय में उनके फिल्मी सफर से जुड़ी इस ऐतिहासिक घटना को याद किया जा रहा है।
क्राइम सिनेमा का नया दौर और नाना पाटेकर का 'अन्ना' अवतार
साल 1989 में निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा 'परिंदा' लेकर आए थे, जिसने भारतीय सिनेमा में अंडरवर्ल्ड की प्रस्तुति की पूरी परिभाषा ही बदल दी। उस दौर में फिल्मों के भीतर अपराध जगत को अक्सर तड़क-भड़क, रूमानी अंदाज और गैर-यथार्थवादी चमक के साथ दिखाया जाता था, लेकिन इस फिल्म ने मुंबई के अंधेरे गलियारों और जुर्म की क्रूर दुनिया को बेहद संजीदा और वास्तविक धरातल पर उतारा। कहानी के केंद्र में दो भाई थे, जिनकी भूमिकाएं अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ ने निभाई थीं, जबकि माधुरी दीक्षित भी इस कथा का एक अहम हिस्सा थीं। वहीं दूसरी ओर पूरी कहानी पर खौफनाक गैंगस्टर अन्ना का साया मंडराता था, जिसे नाना पाटेकर ने अपने बेजोड़ अभिनय से अमर बना दिया। अन्ना के मानसिक असंतुलन, आतंक और संवाद अदायगी ने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया था।
सिनेमाघरों में दर्शकों की तालियों के साथ-साथ इस रचना को समालोचकों की व्यापक सराहना मिली। फिल्म के कथा प्रवाह, कलाकारों की दमदार अदाकारी और 'तुमसे मिलके' जैसे कर्णप्रिय गीतों ने इसे हर वर्ग में लोकप्रिय बना दिया। पुरस्कारों के मंच पर भी इसका दबदबा रहा, जहां इसने दो नेशनल फिल्म अवॉर्ड और पांच फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम दर्ज किए। इतना ही नहीं, 1990 के एकेडमी अवॉर्ड्स में बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म की श्रेणी के लिए भारत ने इसे अपनी आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजा था। इसी यादगार भूमिका के लिए नाना पाटेकर को उनके जीवन का पहला नेशनल अवॉर्ड भी हासिल हुआ था।
तमिल संस्करण से लेकर हॉलीवुड की राह
'परिंदा' की पटकथा का प्रभाव केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहा। साल 1998 में तमिल सिनेमा में इस कहानी को 'आसाई थांबी' के शीर्षक से दोबारा बनाया गया। इसके वर्षों बाद, 2012 में एक अभूतपूर्व घोषणा हुई, जब यह तय हुआ कि इस कहानी को अमेरिकी पृष्ठभूमि में एक हॉलीवुड फिल्म के रूप में पुनर्जीवित किया जाएगा। इस अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट को 'ब्रोकन हॉर्सेज' का नाम दिया गया। विधु विनोद चोपड़ा स्वयं इस फिल्म के साथ जुड़े और इसकी पटकथा अभिजात जोशी द्वारा तैयार की गई।
हॉलीवुड रूपांतरण के लिए किरदारों की रूपरेखा भी पश्चिमी कलाकारों के अनुरूप ढाली गई। मूल फिल्म में अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ द्वारा निभाए गए भाइयों के पात्रों की जगह हॉलीवुड संस्करण में एंटन येल्चिन और क्रिस मार्केट को कास्ट किया गया। वहीं नाना पाटेकर के कालजयी किरदार अन्ना की तर्ज पर एक नया चरित्र गढ़ा गया, जिसे जूलियस हेंच नाम मिला। इस बेहद जटिल और खूंखार खलनायक की भूमिका हॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता विंसेंट डी'ओनोफ्रियो को सौंपी गई।
मायानगरी की गलियों से अमेरिकी वेस्टर्न तक का बदलाव
'ब्रोकन हॉर्सेज' में कहानी की जमीन पूरी तरह बदल दी गई। मुंबई के अंडरवर्ल्ड और समुद्र किनारे बसे महानगर की आपाधापी को हटाकर कथानक को अमेरिकी मिडवेस्ट की पृष्ठभूमि में स्थापित किया गया। पर्दे पर विशालकाय रैंच, काउबॉय हैट, धूल भरे रास्ते, आधुनिक हथियार और क्लासिक वेस्टर्न सिनेमा का माहौल रचा गया। फिल्म को तकनीकी रूप से समृद्ध बनाने के लिए बेहतरीन तकनीशियनों की सेवाएं ली गईं। सिनेमैटोग्राफी का जिम्मा टॉम स्टर्न ने संभाला, जिनका नाम हॉलीवुड के दिग्गज फिल्मकार क्लिंट ईस्टवुड के साथ उनके लंबे और सफल सहयोग के लिए जाना जाता है। वहीं इसके संगीत का निर्माण ऑस्कर नामांकित कंपोजर जॉन डेबनी ने किया था। समय अवधि के मामले में भी दोनों रचनाओं में बड़ा अंतर था। जहां 1989 की मूल 'परिंदा' लगभग ढाई घंटे लंबी थी, वहीं अमेरिकी संस्करण 'ब्रोकन हॉर्सेज' को चुस्त रखते हुए महज एक घंटे 41 मिनट का बनाया गया था।
सितारों की मौजूदगी के बाद भी बॉक्स ऑफिस पर निराशा
कास्टिंग के लिहाज से 'ब्रोकन हॉर्सेज' में बड़े और प्रतिभाशाली नाम मौजूद थे। विंसेंट डी'ओनोफ्रियो उस समय तक 'फुल मेटल जैकेट', 'मेन इन ब्लैक' और 'द सेल' जैसी प्रमुख फिल्मों में अपने शानदार काम के लिए दुनिया भर में जाने जाते थे, और बाद में उन्हें मार्वल की 'डेयरडेविल' सीरीज में किंगपिन की यादगार भूमिका से भी अपार ख्याति मिली। वहीं एंटन येल्चिन भी 'स्टार ट्रेक' रीबूट और 'टर्मिनेटर साल्वेशन' जैसी विशाल फ्रेंचाइजी फिल्मों का हिस्सा रह चुके थे।
हालांकि इतने बड़े नामों, अनुभवी तकनीशियनों और करीब 15 मिलियन डॉलर के बजट के बावजूद फिल्म दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में पूरी तरह नाकाम रही। आलोचकों ने भी इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया, जिसका प्रमाण रॉटन टोमेटोज पर मिली महज 26 प्रतिशत की निराशाजनक अप्रूवल रेटिंग से मिलता है। टिकट खिड़की पर फिल्म का हाल और भी बुरा रहा, जहां दुनिया भर के सिनेमाघरों से इसका कुल कलेक्शन 3 लाख डॉलर का आंकड़ा भी पार नहीं कर सका।
कालजयी रचना की साख पर कोई आंच नहीं
हॉलीवुड रीमेक का व्यावसायिक और आलोचनात्मक पतन मूल भारतीय कृति की गरिमा को तनिक भी कम नहीं कर सका। दशकों बाद भी 'परिंदा' भारतीय सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ मील के पत्थरों में गिनी जाती है और आज भी महत्वपूर्ण फिल्मों की हर सूची में अपनी जगह बनाए हुए है। अनुराग कश्यप, निखिल आडवाणी और दिबाकर बनर्जी जैसे आधुनिक दौर के फिल्म निर्देशकों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि 'परिंदा' के शिल्प और दृष्टिकोण ने उनके काम को गहराई से प्रभावित किया। नाना पाटेकर द्वारा अभिनीत अन्ना का किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे खौफनाक और प्रभावशाली खलनायकों में सर्वोपरि माना जाता है।



















