लगे रहो मुन्ना भाई रिव्यू (2006): जब निर्देशक राजकुमार हिरानी और निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी साल 2003 की बेहद लोकप्रिय फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस का अगला भाग बनाने का निर्णय लिया, तब शायद ही किसी ने यह अनुमान लगाया होगा कि यह सीक्वल अपने से पहली फिल्म की सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा। मात्र 19 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुई इस फिल्म का मुकाबला उस समय कई बड़े बजट और भारी-भरकम स्टार कास्ट वाली फिल्मों से था। लेकिन जैसे ही यह फिल्म 1 सितंबर 2006 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई, इसने अपनी दमदार पटकथा और दर्शकों के बीच फैली माउथ पब्लिसिटी के दम पर टिकट खिड़की पर तहलका मचा दिया। सिनेमाघरों के बाहर दर्शकों की लंबी कतारें इस बात की गवाही दे रही थीं कि यह कोई साधारण फिल्म नहीं है, बल्कि एक ऐसा सामाजिक अनुभव है जो हर वर्ग के दर्शक को सिनेमाघरों की ओर खींच रहा है।
इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी बेहद अनूठी और आज के समय में भी प्रासंगिक पटकथा थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मूल सिद्धांतों और विचारों को आधुनिक और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच जिस सहज, हास्यप्रद और सरल अंदाज में पिरोया गया, उसने हर उम्र के दर्शक के दिल को गहराई से छू लिया। फिल्म के मुख्य और आइकॉनिक किरदारों मुन्ना यानी संजय दत्त और सर्किट यानी अरशद वारसी की शानदार केमिस्ट्री ने एक बार फिर दर्शकों को हंसाते-हंसाते सत्य और अहिंसा का बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया। फिल्म के जरिए जन्मा गांधीगिरी शब्द रातोंरात देश के युवाओं की जुबान पर चढ़ गया और लोग गुस्से या हिंसा की जगह प्यार, लाल गुलाब के फूलों और मुस्कुराहट से अपनी समस्याओं का समाधान निकालने की सीख लेने लगे। इस तरह के सामाजिक प्रभाव और बदलाव ने फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर रफ्तार को और अधिक तेज कर दिया।
रिलीज के पहले ही दिन से फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी और ट्रेड एनालिस्ट्स तथा बॉलीवुड के तमाम पंडित 19 करोड़ रुपये के बजट वाली इस फिल्म की सुनामी को देखकर हैरान रह गए थे। अगर आंकड़ों की बात करें तो इस फिल्म ने अकेले भारत के भीतर ही 70 करोड़ रुपये से ज्यादा का शानदार नेट कलेक्शन किया, जबकि दुनिया भर के बाजारों को मिलाकर इसकी कुल कमाई 120 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई। उस दौर के हिसाब से अपनी मूल लागत के मुकाबले कई गुना अधिक मुनाफा कमाने के बाद इस फिल्म को ब्लॉकबस्टर घोषित किया गया। साल 2006 की वार्षिक बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट पर नजर डालें तो यह फिल्म धूम 2 और क्रिश जैसी बड़ी फिल्मों के बाद उस साल की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनकर उभरी, जिसने यह साबित कर दिया कि स्टार पावर से ज्यादा मजबूत कहानी बोलती है।
संजय दत्त ने मुन्ना के किरदार में एक बार फिर जान फूंकते हुए अपनी टफ इमेज को पूरी तरह से एक संवेदनशील, मददगार और मसीहा जैसे किरदार में ढाल लिया, जो हर जरूरतमंद की मदद के लिए तैयार रहता है। दूसरी ओर अरशद वारसी ने सर्किट के अपने बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग और एक वफादार पक्के दोस्त के रूप में यह साबित कर दिया कि वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे प्रतिभाशाली और भरोसेमंद अभिनेताओं में गिने जाते हैं। इसके अलावा विद्या बालन का गुड मॉर्निंग मुंबई कहने वाला रेडियो जॉकी का किरदार और बोमन ईरानी द्वारा निभाया गया लालची लकी सिंह का रोल फिल्म के कैनवास को और अधिक रंगीन और मजबूत बनाता है। फिल्म में मौजूद हर एक छोटे-बड़े किरदार की अपनी एक निश्चित और महत्वपूर्ण जगह थी, जिसने पूरी अवधि के दौरान स्क्रीनप्ले को कहीं भी कमजोर या ढीला नहीं पड़ने दिया और दर्शकों बांधे रखा।
लगे रहो मुन्ना भाई केवल बॉक्स ऑफिस पर आर्थिक रूप से सफल होने वाली फिल्म भर नहीं थी, बल्कि इसे देश के प्रतिष्ठित समारोहों में ऐतिहासिक सम्मान और पुरस्कार भी मिले। इस बेहतरीन फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म, सर्वश्रेष्ठ पटकथा, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में अरशद वारसी और सर्वश्रेष्ठ गीत सहित कुल 4 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किए। आज जब रिलीज के दो दशक बीत चुके हैं, तब भी यह फिल्म जब कभी टेलीविजन के किसी चैनल या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित की जाती है, तो दर्शकों को उतनी ही ताजगी, ऊर्जा और खुशी देती है जितनी पहली बार देखने पर मिली थी। महज 19 करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी यह साधारण सी फिल्म आज भी पूरी फिल्म इंडस्ट्री और नए निर्माताओं के लिए इस बात की एक बड़ी मिसाल है कि जब कोई फिल्म मजबूत कहानी और सच्ची नीयत के साथ बनाई जाती है, तो वह हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर हो जाती है।



















