भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी बहुत कम अदाकाराएं हुई हैं जिन्होंने पर्दे पर दर्द और संवेदनाओं को उस गहराई से जिया हो, जैसा मीना कुमारी ने किया। सिनेमाई दुनिया में उन्हें ट्रेजेडी क्वीन का खिताब मिला और उन्होंने अपने सशक्त अभिनय से हर किरदार को यादगार बना दिया। फिल्म पाकीजा में उनकी असीम खूबसूरती और लाजवाब अदायगी आज भी दर्शकों के जेहन में जिंदा है। हालांकि, पर्दे पर अपार सफलता और शोहरत हासिल करने वाली इस महान अभिनेत्री की निजी जिंदगी दुखों और संघर्षों से भरी रही। जीवन के अंतिम पलों में आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि उनके निधन के समय परिवार के पास अस्पताल का बकाया बिल चुकाने के लिए 3,500 रुपये तक मौजूद नहीं थे।
बचपन से ही कंधों पर आ गया था परिवार का बोझ
बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि मीना कुमारी का असली नाम महजबीन बानो था। उनका बचपन आम बच्चों की तरह खिलौनों और पढ़ाई के बीच नहीं बीता। जब वह महज 4 साल की थीं, तभी उनके पिता अली बख्श उन्हें फिल्म स्टूडियो लेकर पहुंच गए थे। साल 1939 में उन्होंने निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म लेदरफेस में बतौर बाल कलाकार अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। इस पहली फिल्म के लिए उन्हें मेहनताने के तौर पर केवल 25 रुपये मिले थे। इतनी कम उम्र में काम के दबाव के चलते उनका स्कूल छूट गया और वह कभी सामान्य स्कूली शिक्षा हासिल नहीं कर सकीं।
स्टूडियो के चक्कर और पिता के साथ तनावपूर्ण संबंध
घर की माली हालत ठीक न होने के कारण परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का पूरा दारोमदार उनके नन्हे कंधों पर आ गया था। महज 6 से 7 साल की उम्र में वह काम की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर लगाने लगी थीं। धीरे-धीरे उनकी कमाई ही पूरे घर का मुख्य आर्थिक सहारा बन गई। लगातार काम करने के पारिवारिक दबाव के चलते मीना कुमारी और उनके पिता के बीच के संबंध हमेशा तनावपूर्ण और मुश्किलों से भरे रहे। विनोद मेहता द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी में इस बात का जिक्र मिलता है कि पिता के इसी डर और बंदिशों के चलते उन्होंने फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ गुपचुप तरीके से निकाह किया था।
बैजू बावरा से मिली असली पहचान और सफलता की नई उड़ान
चाइल्ड आर्टिस्ट से मुख्य अभिनेत्री बनने का उनका सफर आसान नहीं था, लेकिन साल 1952 में रिलीज हुई फिल्म बैजू बावरा ने उनकी किस्मत पूरी तरह बदल दी। इस फिल्म की अपार सफलता के बाद वह हिंदी सिनेमा की शीर्ष अभिनेत्रियों की कतार में शामिल हो गईं। इसके बाद उन्होंने परिणीता, आजाद, शारदा, मिस मैरी और दिल अपना और प्रीत पराई जैसी कई शानदार फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। हर नई फिल्म के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और उन्होंने कई यादगार भूमिकाएं निभाईं।
अपार शोहरत के बाद भी देखा बेहद दर्दनाक अंत
सफलता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद उनके जीवन की त्रासदियां कभी खत्म नहीं हुईं। फिल्मकार बिमल रॉय की बेटी रिंकी रॉय भट्टाचार्य ने साल 2014 में दिए एक इंटरव्यू में उनके अंतिम दिनों से जुड़े बेहद भावुक और दर्दनाक सच को साझा किया था। 31 मार्च 1972 को जब इस महान अभिनेत्री ने दुनिया को अलविदा कहा, तब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खस्ताहाल हो चुकी थी। अस्पताल का बिल चुकाकर उनका पार्थिव शरीर लेने के लिए परिवार के पास 3,500 रुपये तक नहीं बचे थे। दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली और इंडस्ट्री को कई ब्लॉकबस्टर फिल्में देने वाली अदाकारा का यह अंत बेहद पीड़ादायक था।


















