भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी अभिनेत्रियां आईं जिन्होंने अपनी अदाकारी के दम पर दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। लेकिन ट्रेजेडी क्वीन के नाम से मशहूर मीना कुमारी की किस्मत में जितना दर्द लिखा था, शायद ही किसी और के हिस्से आया हो। उनकी नशीली निगाहें, गंभीर खामोशी और हर किरदार में पूरी तरह ढल जाने की खूबी ने उन्हें ऐसा मुकाम दिलाया जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। परदे पर हमेशा गम को जीवंत करने वाली यह कलाकार अपनी असल जिंदगी में भी ताउम्र अकेलेपन और टूटे हुए दिल के साथ जीती रही। उनकी जिंदगी का यही अथाह दर्द उनके आखिरी वक्त से ठीक पहले एक ऐसे गाने में सिमट गया, जिसने अनजाने में ही उनकी पूरी जीवन-गाथा को 5 मिनट और 57 सेकंड के दायरे में ला खड़ा किया।
चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था
यह अमर गीत 'चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था' आज भी मीना कुमारी की पहचान के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। इसे स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी, संगीत गुलाम मोहम्मद ने तैयार किया था और इसके बोल जाने-माने शायर कैफी आजमी ने लिखे थे। इस गीत के भीतर एक ऐसी स्त्री की पीड़ा छिपी है, जो किसी के बिछड़ जाने के बाद भी उसी पुराने रास्ते, पुरानी याद और अंतहीन इंतजार में टकटकी लगाए बैठी रहती है। जब फिल्म पाकीजा में मीना कुमारी का किरदार साहिबजान इस धुन पर थिरकता है, तो वह केवल एक फिल्मी दृश्य भर नहीं रह जाता। उस अभिनय के पीछे एक बेचैनी होती है, चेहरे पर अधूरी चाहत झलकती है और आंखों में ऐसा मौन दर्द होता है जिसे शब्दों में बयां करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही कारण है कि इतने दशक बीत जाने के बाद भी जब यह संगीत गूंजता है, तो लोगों को किरदार से ज्यादा मीना कुमारी की अपनी दास्तान याद आने लगती है।
जिंदगी का कड़वा सच बने बोल
इस गीत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके शब्दों को यदि मीना कुमारी के निजी जीवन के परिप्रेक्ष्य में सुना जाए तो इनका भाव और भी ज्यादा गहरा हो जाता है। शुरुआती पंक्तियों में अचानक से मिले प्रेम की मिठास तो है, लेकिन साथ ही उसके हमेशा के लिए छिन जाने का खौफ और उसकी यादों का सिलसिला भी है। मीना कुमारी के वास्तविक जीवन में भी प्रेम, रिश्ते, तन्हाइयां और मानसिक टूटन कभी एक-दूसरे से अलग नहीं रहे। बचपन से ही कैमरे की चकाचौंध के बीच जीवन बिताने वाली इस अभिनेत्री को अपने लंबे सफर में हमसफर की तलाश थी। निर्देशक कमाल अमरोही के साथ उनका रिश्ता जुड़ा भी, लेकिन वह नाता खुशियों से ज्यादा गहरा दर्द दे गया। रिश्तों की कड़वाहट, गहराता अकेलापन, शराब की लत और लगातार बिगड़ता स्वास्थ्य इन सबने मिलकर उनके जीवन को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जहां से आगे के रास्ते पूरी तरह धुंधले हो चुके थे।
ढलती रात और बुझते चिराग
गाने की आगे की पंक्तियां कहती हैं कि वहीं थम के रह गई है मेरी रात ढलते ढलते। यह एक लाइन मीना कुमारी की निजी जिंदगी का सबसे कड़वा और अंतिम सच साबित हुई। पाकीजा फिल्म को बनकर तैयार होने में लगभग 14 साल का लंबा अरसा लग गया था। जब यह बहुप्रतीक्षित फिल्म आखिरकार रिलीज हुई, तब तक मीना कुमारी लिवर सिरोसिस जैसी जानलेवा बीमारी की बुरी तरह चपेट में आ चुकी थीं। उनकी जिंदगी की शाम सचमुच ढलने की कगार पर पहुंच चुकी थी। फिल्म के एक दृश्य में वह मोमबत्ती यानी शमा को देखते हुए नृत्य करती नजर आती हैं। परदे पर बुझते हुए दीये का वह दृश्य इस बात का बेहद दुखद संकेत था कि इस महान अदाकारा के जीवन की अपनी लौ भी अब शांत होने वाली है। शूटिंग के दौरान उनकी सेहत इतनी ज्यादा खराब थी कि कई कठिन नृत्य मुद्राओं के लिए बॉडी डबल का सहारा लेना पड़ा था, लेकिन उनके चेहरे के जितने भी क्लोज-अप शॉट्स कैमरे में कैद हुए, उनमें उनका आंतरिक दर्द साफ तौर पर झलकता दिखाई दिया।
एक चमकता सितारा जो हमेशा के लिए खो गया
4 फरवरी 1972 को जब पाकीजा सिनेमाघरों में उतरी, तो दर्शकों ने मीना कुमारी के इस रूप और इस गीत को हाथों-हाथ लिया। सिनेमाघरों के भीतर इस गाने पर लोग परदे पर सिक्के तक उछाल दिया करते थे। लेकिन इस ऐतिहासिक कामयाबी का जश्न मनाने के लिए इस दिग्गज अभिनेत्री के पास अब और वक्त नहीं बचा था। फिल्म के सिनेमाघरों में आने के ठीक दो महीने बाद, 31 मार्च 1972 को मात्र 38 साल की छोटी सी उम्र में मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। जिस गाने में उन्होंने खुद यहू गाया था कि ये चिराग बुझ रहे हैं, बिल्कुल वैसा ही घटित हुआ। फिल्म की सफलता के उजले दौर के बीच भारतीय सिनेमा का वह सबसे चमकीला सितारा हमेशा के लिए अंधेरे में विलीन हो गया।



















