हिंदी सिनेमा के इतिहास में शादी के विदाई गीतों का एक अलग और बेहद भावुक स्थान रहा है। वर्ष 1957 में आई क्लासिक फिल्म मदर इंडिया का विदाई गीत पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली आज भी भारतीय शादियों में आंखें नम कर देता है। इस अमर गीत को पर्दे पर मशहूर अभिनेत्री नरगिस पर फिल्माया गया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जब इस गीत को रिकॉर्डिंग स्टूडियो में गाया जा रहा था, तब माहौल इतना ज्यादा गमगीन हो गया था कि गायिका शमशाद बेगम अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सकीं और गाते-गाते ही रो पड़ी थीं।
रिकॉर्डिंग स्टूडियो में छा गया था सन्नाटा और गमगीन माहौल
जब मुंबई के स्टूडियो में संगीतकार नौशाद इस गाने की धुनों पर काम कर रहे थे और शमशाद बेगम माइक के सामने खड़ी होकर बोल गा रही थीं, तब हर कोई भावनाओं के बहकावे में आ गया था। शकील बदायूनी द्वारा लिखे गए एक-एक शब्द में एक बेटी के अपने पिता का घर छोड़कर परदेस जाने का दर्द इस कदर पिरोया गया था कि वहां मौजूद हर शख्स भावुक हो गया। शमशाद बेगम की रुंधी हुई आवाज और आंखों से बहते आंसुओं को देखकर वहां मौजूद वाद्ययंत्र बजाने वाले संगीतकार और अन्य कलाकार भी रोने लगे थे। इस गीत से जुड़ी सबसे अनूठी और खूबसूरत बात यह भी है कि एक पारंपरिक हिंदू शादी के विदाई दृश्य के लिए बनाए गए इस ऐतिहासिक गीत के गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायिका शमशाद बेगम, तीनों ही मुस्लिम कलाकार थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति के इस अत्यंत संवेदनशील क्षण को अपनी कला के माध्यम से अमर बना दिया।
सूफी संत अमीर खुसरो की कालजयी रचना से जुड़ाव
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और लोक कला प्रेमियों के अनुसार, मदर इंडिया के इस लोकप्रिय विदाई गीत की आत्मा महान सूफी संत और मध्यकालीन कवि अमीर खुसरो की सुप्रसिद्ध रचना काहे को ब्याही बिदेस से प्रेरित है। अमीर खुसरो की इस अमर कविता में एक बेटी अपने पिता यानी बाबुल से सवाल करती है कि उसने उसे परदेस क्यों ब्याह दिया। कविता की पंक्तियों में बेटी अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहती है कि पिता ने बेटों को तो दो-दो मंजिल के महल दे दिए, लेकिन बेटी के हिस्से में सिर्फ परदेस आया है। वह खुद की तुलना पिता के आंगन में बंधी उस गाय से करती है जिसे जिधर हांक दिया जाए वह उधर ही चली जाती है, या फिर चमेली की उन कलियों से करती है जो हर घर की शोभा बनती हैं। अमीर खुसरो के इन्हीं मर्मस्पर्शी विचारों को शकील बदायूनी ने आधुनिक हिंदी सिनेमा के सांचे में बहुत खूबसूरती से ढाला था।
नरगिस के अभिनय और शकील बदायूनी के शब्दों का असर
फिल्म में जब यह गीत बजता है, तो नरगिस का अभिनय और उनके चेहरे के भाव हर देखने वाले का दिल छू लेते हैं। शकील बदायूनी के लिखे बोल जैसे पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली, मेरी किस्मत में जाता था परदेस रे और मोरे गौने में चांद और सितारे दिए, एक दुल्हन की नई जिंदगी की शुरुआत और पुराने रिश्तों से बिछड़ने के दर्द को समेटे हुए हैं। गीत में दुल्हन अपने नए सफर पर निकलते हुए कहती है कि उसमें कोई खास गुण या खूबी भले न हो, लेकिन अब उसकी चूड़ियों की लाज और सम्मान उसके जीवनसाथी के हाथों में है। यही कारण है कि दशकों बीत जाने के बाद भी यह विदाई गीत भारतीय समाज और सिनेमा जगत में भावुकता का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।



















