देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व आते ही गलियों और मोहल्लों में भव्य झांकियां तथा पूजा पंडाल सज जाते हैं। भारतीय त्योहारों की रौनक बॉलीवुड के सुरीले भजनों और गीतों के बिना अधूरी मानी जाती है। दशकों के सिनेमाई सफर में हिंदी फ़िल्म उद्योग ने ऐसे कई कालजयी भजनों का निर्माण किया है, जिन्होंने धार्मिक उत्सवों के उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया है। इनमें से एक ऐसा ही यादगार गीत है जो पिछले 25 वर्षों से जन्माष्टमी के हर आयोजन की मुख्य पहचान बना हुआ है। साल 2001 में रिलीज हुई फ़िल्म लगान का सुपरहिट गाना राधा कैसे न जले जब भी बजता है, लोगों के कदम खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। इस भक्ति भाव से सराबोर रचना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे भारतीय सिनेमा के दिग्गज मुस्लिम कलाकारों ने मिलकर तैयार किया था, जिनकी कलात्मक प्रतिभा का जादू 25 साल बीत जाने के बाद भी पूरी तरह बरकरार है।
मुस्लिम कलाकारों की टोली ने रचा हिंदू आस्था का अमर गीत
सनातन परंपरा और श्रीकृष्ण प्रेम पर आधारित इस भक्ति गीत को आकार देने में तीन मुख्य मुस्लिम फ़िल्मी हस्तियों की केंद्रीय भूमिका रही थी। साल 2001 में आई फ़िल्म लगान के लिए इस मधुर रचना के मर्मस्पर्शी बोल प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर की कलम से निकले थे। वहीं इस गीत को अपनी अद्भुत धुनों से सजाने का काम ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने किया था। संगीत और शब्दों के इस संगम को पर्दे पर नृत्य के जरिए जीवंत करने का श्रेय भारतीय फ़िल्म उद्योग की दिग्गज नृत्य निर्देशिका सरोज खान को जाता है। इसके अतिरिक्त, इस पूरे फ़िल्मी प्रोजेक्ट और प्रस्तुति के केंद्र में अभिनेता तथा निर्माता आमिर खान मौजूद थे। दो से चार मुस्लिम कलाकारों की इस संयुक्त सांस्कृतिक साधना ने एक ऐसा सर्वकालिक रचना-कर्म पेश किया, जो आज भी भारत के हर घर में जन्माष्टमी के आगमन की गूंज बन जाता है।
25 सालों का सुरीला सफर और स्कूल के दिनों की पुरानी यादें
साल 2000 के दशक में बड़े हुए बच्चों के लिए यह गाना महज एक फ़िल्मी ट्रैक नहीं, बल्कि बचपन की सुनहरी यादों का हिस्सा है। स्कूल के वार्षिक समारोहों या जन्माष्टमी के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ऐसा शायद ही कोई छात्र रहा हो जिसने इस गीत पर नृत्य प्रस्तुति न दी हो। जब भी जन्माष्टमी की तारीख नजदीक आती है, यह सुरीली रचना घर-घर और सार्वजनिक लाउडस्पीकरों पर सुनाई देने लगती है। महान गायिका आशा भोसले तथा मशहूर गायक उदित नारायण की सुरीली जुगलबंदी ने इस रचना को अमरता प्रदान कर दी है। 25 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी इस गीत की लोकप्रियता में रत्ती भर कमी नहीं आई है। जैसे ही इसकी शुरुआती शहनाई और ढोलक की ताल गूंजती है, सुनने वालों का मन बरबस ही खुशी और भक्ति से झूम उठता है।
अंग्रेजों के खिलाफ क्रिकेट की लड़ाई में राधा-कृष्ण की प्रेम लीला
फ़िल्म लगान की मुख्य कथावस्तु वैसे तो ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों और गांव वालों द्वारा लगान माफ कराने के लिए खेले गए क्रिकेट मैच के संघर्ष पर केंद्रित थी। हालांकि, निर्देशक और संगीतकार ने इस गीत के माध्यम से कहानी में एक बेहद खूबसूरत सांस्कृतिक रंग भर दिया था। फ़िल्म में इस दृश्य के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और माता राधा के बीच की बाल-सुलभ नोकझोंक तथा पावन प्रेम संबंधों को बहुत ही बारीकी से पर्दे पर उकेरा गया है। पर्दे पर अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने राधा की भूमिका निभाई थी, जबकि अभिनेता आमिर खान कान्हा के रूप में नजर आए थे। गीत की नाटकीय स्थिति में राधा के मन की स्वाभाविक ईर्ष्या और कान्हा के प्रति उनकी शिकायतों को बड़े चुलबुले ढंग से प्रस्तुत किया गया है। राधा को यह शिकायत रहती है कि कन्हैया अन्य गोपियों के साथ अधिक समय बिताते हैं, वहीं नटखट कृष्ण अपनी शरारतों से बाज नहीं आते। दोनों कलाकारों के बीच का अभिनय इतना स्वाभाविक प्रतीत होता है मानो ब्रजभूमि की कोई अति प्राचीन पौराणिक कथा दर्शकों के सामने जीवंत हो उठी हो।
आशा भोसले और उदित नारायण का गायन तथा जावेद अख्तर के बोल
इस कालजयी रचना में प्राण फूंकने का काम आशा भोसले और उदित नारायण की कालजयी आवाजों ने किया। जावेद अख्तर द्वारा रचे गए काव्य में राधा-कृष्ण के पावन रिश्ते की चंचलता और मिठास साफ झलकती है। गीत के मुखड़े में राधा की विरह और शिकायत व्यक्त करते हुए लिखा गया है,
"मधुबन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले, कभी मुस्काए, कभी छेड़े, कभी बात करे। राधा कैसे ना जले?"इसके जवाब में कान्हा की तरफ से तर्क दिया जाता है कि गोपियां तो सिर्फ आकाश के तारों की तरह हैं, जबकि राधा स्वयं पूर्ण चंद्रमा हैं, फिर भी उनके मन में निष्पाप प्रेम को लेकर अधूरा विश्वास क्यों है। पूरे गीत के माध्यम से कवि ने यह संदेश दिया है कि कान्हा भले ही ब्रज की गोपियों के संग हंसी-थिठोली करें, परंतु उनके हृदय में केवल राधा के नाम के ही प्रेम-पुष्प खिले हुए हैं। यही कारण है कि राधा का रूठना और कान्हा का उन्हें मनाने के बजाय अपनी मनमोहक शरारतों को जारी रखना दर्शकों को मुग्ध कर देता है। 25 साल बीत जाने के बाद भी यह रचना भारतीय संगीत जगत की अनमोल धरोहर बनी हुई है।



















