हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसे कलाकार उभरे जिन्होंने पारंपरिक ढर्रे से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई। अभिनेता प्रेमनाथ भी उन्हीं गिने-चुने सितारों में शामिल रहे, जिनका फिल्मी सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम दिलचस्प नहीं था। बड़े पर्दे पर मुख्य नायक बनने की चाह लेकर मुंबई की मायानगरी पहुंचे इस कलाकार को असली शोहरत और मुकाम खलनायक के रूप में मिला। उनका रुतबा और दमदार संवाद अदायगी दर्शकों के जहन में लंबे समय तक बसी रही, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उन्हें गहरे निजी और पेशेवर संकट से गुजरना पड़ा था।
फौज से बगावत और अभिनय का बचपन का शौक
प्रेमनाथ का जन्म पेशावर के शहर में हुआ था। जब देश का बंटवारा हुआ, तब उनका पूरा कुनबा सीमा पार से भारत आकर मध्य प्रदेश के इलाके में बस गया। उनके वालिद पुलिस महकमे में पदस्थ थे और चाहते थे कि उनका बेटा भी वर्दी पहनकर अनुशासित जिंदगी जिए। इसी मंशा से पिता ने उनका दाखिला सेना में करवा दिया था। हालांकि फौजी माहौल उनके मिजाज से बिल्कुल मेल नहीं खाता था, क्योंकि उनका दिल बचपन से ही अदाकारी की दुनिया में लगा हुआ था। आखिरकार वे फौजी जिंदगी को अलविदा कहकर अपने इसी जुनून के सहारे मुंबई पहुंच गए।
पृथ्वी थिएटर से शुरुआत और बीना राय के साथ शादी
मायानगरी में अपने शुरुआती दिनों के दौरान वे पृथ्वी थिएटर के मंच से जुड़े, जहां उन्हें अभिनय की बारीकियों को तराशने का मौका मिला। रंगमंच के इसी तजुर्बे ने उनके फिल्मी सफर को एक ठोस आधार दिया। शुरुआती प्रोजेक्ट्स में उन्हें काम मिलने लगा और वे इंडस्ट्री में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे। इसी दौरान उनकी जिंदगी में अदाकारा बीना राय की आमद हुई। साथ काम करते हुए दोनों एक-दूसरे के करीब आए और कुछ वक्त बाद उन्होंने वैवाहिक रिश्ते में बंधने का फैसला कर लिया।
प्रोडक्शन हाउस का घाटा और संन्यास का दौर
विवाह के बंधन में बंधने के पश्चात इस दंपती ने खुद की फिल्म निर्माण कंपनी पी.एन. फिल्म्स की नींव रखी। इस प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले कई फीचर फिल्मों का निर्माण किया गया, मगर तकदीर ने साथ नहीं दिया और ज्यादातर प्रोजेक्ट्स टिकट खिड़की पर नाकाम साबित हुए। इस नाकामी का सीधा असर उनके निजी करियर पर पड़ा। उस दौर में बीना राय अपने काम के दम पर लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही थीं, जबकि प्रेमनाथ को बतौर मुख्य नायक लगातार संघर्ष करना पड़ रहा था। असफलताओं के इस सिलसिले ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया और वे इतने हताश हुए कि उन्होंने सिनेमाई दुनिया से पूरी तरह किनारा कर लिया। इस अलगाव के दौरान उन्होंने संन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया था।
खलनायक बनकर की शानदार वापसी
कुछ वर्षों तक सांसारिक चकाचौंध से दूर रहने के बाद उन्होंने दोबारा कैमरे के सामने लौटने का मन बनाया। इस मर्तबा उन्होंने नायक बनने की पुरानी जिद छोड़ दी और नकारात्मक किरदारों पर ध्यान केंद्रित किया। यह फैसला उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। 'जानी दुश्मन' जैसी चर्चित फिल्म में उनके खलनायकी अंदाज और रौबदार व्यक्तित्व को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। इसके बाद वे उद्योग के सबसे नामचीन विलेन्स की फेहरिस्त में शुमार हो गए। उन्होंने अपने काम से दिखा दिया कि किसी भी अभिनेता की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह पर्दे पर नायक की भूमिका में है या नहीं।
कपूर खानदान से रिश्ता और अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स
फिल्म उद्योग में राज कपूर और प्रेमनाथ की दोस्ती भी काफी चर्चित रही। दोनों ने साथ मिलकर कई फिल्मों में अदाकारी की। राज कपूर की निजी जिंदगी का एक बड़ा मोड़ भी प्रेमनाथ के परिवार से सीधे जुड़ा हुआ था। एक बार जब वे दोनों रीवा पहुंचे, तो वहां राज कपूर की पहली मुलाकात प्रेमनाथ की बहन कृष्णा से हुई और वे उन्हें अपना दिल दे बैठे, जिसके बाद दोनों का विवाह संपन्न हुआ। वहीं उनकी एक अन्य बहन उमा का विवाह विख्यात अभिनेता प्रेम चोपड़ा से हुआ था। इसके अलावा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काम किया। वर्ष 1969 में सामने आई अमेरिकी फिल्म 'केनरे' में उन्होंने अभिनय किया, जबकि 1967 से 1969 के बीच वे अमेरिकी धारावाहिक 'माया' में भी नजर आए।
अंतिम फिल्म और निधन
अपने पूरे सफर में विविध प्रकार की भूमिकाएं निभाने वाले प्रेमनाथ अंतिम बार हिंदी सिनेमा के पर्दे पर फिल्म 'हम दोनों' के जरिए नजर आए थे। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर 65 साल की उम्र में 3 नवंबर 1992 को दिल का दौरा पड़ने के चलते इस दुनिया को अलविदा कह गए। भले ही आज वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन भारतीय सिनेमा में विलेन के किरदारों को दी गई उनकी विशिष्ट पहचान आज भी याद की जाती है।



















