फिल्म इंडस्ट्री में अकसर यह मान लिया जाता है कि चेहरे की चमक और ग्लैमर ही कामयाबी का पहला दरवाजा खोलते हैं। मगर कुछ कलाकारों ने इस सोच को सिरे से नकार दिया। ऐसी ही एक अदाकारा हैं विद्या बालन, जिन्हें शुरुआती दौर में सिर्फ ठुकराया गया, उनके लुक्स पर सवाल उठे और 'मनहूस' तक कहा गया — लेकिन उन्होंने इन्हीं तानों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
सपना तो हीरोइन बनने का था, पर इंडस्ट्री ने स्वागत तंज से किया। किसी ने आईने में चेहरा देखने की नसीहत दी, तो किसी ने वजन को लेकर भद्दी टिप्पणियां कीं। बावजूद इसके, इस अभिनेत्री ने अपनी 'कहानी' खुद लिखी।
पढ़ाई में तेज, इरादे और मजबूत
विद्या बालन का जन्म 1 जनवरी 1979 को मुंबई के एक तमिल परिवार में हुआ। बचपन से ही पढ़ाई में उनकी पकड़ मजबूत रही। उन्होंने मुंबई के नामी सेंट जेवियर्स कॉलेज से सोशियोलॉजी में स्नातक की डिग्री ली। खास बात यह रही कि एक्टिंग का जुनून होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ा और आगे चलकर मुंबई यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री भी पूरी की।
'हम पांच' की राधिका ने दिलाई पहचान
कॉलेज के दिनों में ही विद्या ने टेलीविजन के विज्ञापनों और म्यूजिक वीडियो में काम करना शुरू कर दिया था। इसी सिलसिले में उन्हें चर्चित टीवी शो 'हम पांच' में राधिका का किरदार मिला, जिसने पहली बार उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। छोटे पर्दे पर मिली इस कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्मों का रुख किया — यह सोचकर कि अब राह आसान होगी। हकीकत इसके बिलकुल उलट निकली।
बड़े पर्दे पर ठोकरें और बॉडी शेमिंग
साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में कई प्रोजेक्ट्स साइन करने के बावजूद उन्हें ऐन मौके पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हालत यह हो गई कि उन्हें लगातार 12 फिल्मों से रिजेक्ट किया गया, और कुल मिलाकर 13 फिल्मों से उन्हें हटाया गया। कुछ निर्देशकों और निर्माताओं ने तो उनके शरीर को लेकर तीखी और अपमानजनक बातें कहीं। अपने पुराने इंटरव्यू में खुद विद्या इस दर्द को बयां कर चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि एक प्रोड्यूसर ने उनके मुंह पर ही कह दिया था — 'तुम में हीरोइन बनने वाले लुक्स नहीं हैं।' इन बातों ने उन्हें इस कदर तोड़ा कि महीनों तक वे आईने में अपना चेहरा देखने से भी कतराती रहीं। दबाव यहां तक पहुंचा कि उन्हें नाक का ऑपरेशन कराने तक के लिए कहा गया।
'परिणीता' से पलट गई बाजी
इतने झटकों के बाद भी विद्या ने हथियार नहीं डाले। उन्होंने खुद को साबित करने की ठानी और लगातार ऑडिशन देती रहीं। साल 2005 में वह मौका आया जिसने उनकी जिंदगी का रुख ही बदल दिया। फिल्म थी 'परिणीता', जिसमें उन्होंने ललिता का किरदार निभाया। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ने दर्शकों और समीक्षकों, दोनों को प्रभावित किया और विद्या रातों-रात सुर्खियों में आ गईं।
राष्ट्रीय पुरस्कार और अपनी शर्तों पर बुलंदी
अपने दमदार, निडर और बेबाक अभिनय के दम पर उन्हें साल 2011 का बेस्ट एक्ट्रेस का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह सम्मान उन तमाम आलोचकों के लिए एक करारा जवाब था जिन्होंने कभी उनके लुक्स की वजह से उन्हें खारिज किया था। इसके बाद 'कहानी', 'बॉबी जासूस', 'तुम्हारी सुलु' और 'मिशन मंगल' जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि वे अकेले अपने कंधों पर पूरी फिल्म का बोझ उठा सकती हैं। उनकी फिल्मों में महिला किरदार महज सजावट नहीं, बल्कि कहानी की रीढ़ बनकर सामने आए।
विद्या की सबसे बड़ी खूबी यही रही कि उन्होंने ग्लैमर की होड़ में खुद को कभी नहीं बदला। उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया और वही भूमिकाएं चुनीं जिनमें अभिनय की असली गुंजाइश हो। यही वजह है कि कई फिल्मफेयर पुरस्कारों समेत अनेक सम्मान उनकी झोली में आए।













