बॉलीवुड अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'द वन- फोर्स ऑफ फॉरेस्ट' को लेकर काफी चर्चा में बने हुए हैं। इस फिल्म में उनके साथ मुख्य भूमिका में तमन्ना भाटिया भी नजर आने वाली हैं। हाल ही में फिल्म के निर्माताओं ने 'द वन' का टीजर रिलीज किया है, जिसमें सिद्धार्थ और तमन्ना एक अनोखी और रहस्यमयी लोककथाओं की दुनिया में प्रवेश करते दिखाई देते हैं। बालाजी मोशन पिक्चर्स के बैनर तले बन रही इस फिल्म का टीजर दर्शकों को भारतीय प्राचीन मान्यताओं और फैंटेसी के एक ऐसे संसार में ले जाता है जो भारतीय सिनेमा के पर्दे पर कम ही देखने को मिलता है। अलौकिक ताकतें, पुरानी मान्यताएं और कई अनसुलझे रहस्य इस फिल्म की मूल कहानी का केंद्र बिंदु हैं। इसी बीच फिल्म के मेकर्स ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया है कि इस पूरी फिल्म की कहानी असल में बिहार के 16वीं सदी के प्राचीन 'वन देवी मंदिर' पर आधारित है।
अरुणाभ कुमार और दीपक मिश्रा को कहां से आया विचार?
इस बहुप्रतीक्षित फिल्म का निर्देशन 'पंचायत' वेब सीरीज से खासी लोकप्रियता हासिल करने वाले निर्देशक दीपक मिश्रा ने किया है, जबकि द वायरल फीवर के अरुणाभ कुमार और एकता कपूर इसके निर्माता हैं। खास बात यह है कि इस फिल्म की कहानी खुद अरुणाभ कुमार ने ही लिखी है। हाल ही में दीपक मिश्रा और अरुणाभ कुमार ने एक साक्षात्कार के दौरान इस बात से पर्दा उठाया कि उन्हें इस अनोखी कहानी की प्रेरणा आखिर कहां से मिली और उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाने का फैसला कैसे किया।
बिहार के 'वन देवी मंदिर' की वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्म
दीपक मिश्रा और अरुणाभ कुमार ने एक इंटरव्यू के दौरान 'द वन' से जुड़े कई दिलचस्प राज खोले। अरुणाभ कुमार ने जानकारी दी कि 'द वन' की पटकथा पटना के पास स्थित 'वन देवी मंदिर' की वास्तविक कथाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। अरुणाभ के मुताबिक, उन्होंने उन लोगों से लंबी बातचीत की जो इस मंदिर में जा चुके थे और वहां से जुड़ी लोक-कथाओं के बारे में जानते थे। इसके बाद इस प्राचीन स्थान को लेकर उनकी उत्सुकता लगातार बढ़ती चली गई। उन्होंने वहां के स्थानीय पुजारियों और आसपास के ग्रामीणों से भी चर्चा की, जिसके बाद उनके मन में इस फिल्म को बनाने का विचार आया। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अरुणाभ कुमार और दीपक मिश्रा ने मिलकर इस विषय पर काम करने की योजना बनाई।
क्या है 16वीं सदी के इस मंदिर का इतिहास?
मंदिर और फिल्म के इतिहास पर रोशनी डालते हुए अरुणाभ कुमार ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में हुआ था। स्थानीय ग्रामीणों और वहां के बाशिंदों के अनुसार, उस जंगल में कुछ ऐसी अज्ञात और अदृश्य शक्तियां थीं जो लोगों को परेशान किया करती थीं। यही वजह है कि सूर्यास्त के बाद उस जंगल में किसी भी इंसान का जाना पूरी तरह वर्जित था और यह डरावनी लोककथा आज भी वहां के लोगों के बीच उतनी ही प्रचलित है। उन्होंने पुजारियों और ग्रामीणों से बातचीत करने के बाद इस बारे में दो साल पहले दीपक मिश्रा को बताया था। उन दोनों को यह रहस्यमयी कहानी बेहद रोमांचक लगी, जिसके बाद वे निर्माता एकता कपूर के पास पहुंचे और उन्होंने तुरंत कह दिया कि यह विषय बड़े पर्दे पर दिखाने के बिल्कुल काबिल है।
वीएफएक्स और एनिमेशन से रची गई 'द वन' की काल्पनिक दुनिया
फिल्म के निर्माण को लेकर निर्देशक दीपक मिश्रा ने बताया कि इस तरह की जटिल कहानी को पर्दे पर उतारना और उस खास काल्पनिक दुनिया को गढ़ना आसान काम नहीं था। यह सब सामान्य तरीके से शूटिंग करके संभव नहीं हो सकता था, इसलिए निर्माताओं ने आधुनिक तकनीक का पूरा सहारा लिया। स्पेशल इफेक्ट्स और अत्याधुनिक एनिमेशन की मदद से 'द वन' की उस अद्भुत दुनिया को पूरी तरह तैयार किया गया है। जानकारी के लिए बता दें कि यह फिल्म 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया के अलावा सुनील ग्रोवर, मनीष पॉल, अजय राजू और अनूप सोनी जैसे जाने-माने कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे।
मां वन देवी मंदिर की असल स्थिति और मान्यताएं
अगर बात करें 'मां वन देवी मंदिर' की वास्तविक स्थिति की, तो यह प्राचीन मंदिर पटना जिले के बिहटा के पास स्थित अमहारा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों की सीमाओं के संगम पर बना हुआ है। यह एक अत्यंत प्राचीन और रहस्यमयी सिद्धपीठ माना जाता है, जिसे करीब 350 से 400 साल पुराना बताया जाता है। यह पवित्र स्थान राज्य की राजधानी पटना से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और चारों तरफ से घने हरे-भरे तथा शांत वातावरण से पूरी तरह घिरा हुआ है। इस मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि यहां माता दुर्गा की कोई पारंपरिक मूर्ति स्थापित नहीं है, बल्कि देवी का एक पावन पिंड यहां पूजा जाता है। स्थानीय लोक-मान्यताओं के मुताबिक, सूरज ढलने के बाद इस मंदिर और इसके आसपास के जंगलों में किसी का भी रुकना सख्त मना है। मंदिर के पट बंद होने के बाद वहां के पुजारी तक रात में वहां नहीं रुकते हैं।


















