खरीफ के मौसम में धान किसानों की सबसे भरोसेमंद फसल मानी जाती है, और बिहार जैसे राज्यों में तो इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। लेकिन अगर इसी धान के पानी भरे खेत में एक छोटा सा जलीय पौधा अजोला भी उगा दिया जाए, तो किसान की जेब पर पड़ने वाला बोझ काफी हल्का हो सकता है। यही वजह है कि अजोला को धान की खेती के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जाता।
आखिर अजोला है क्या
अजोला असल में एक जलीय फर्न है, जो ऐसी समशीतोष्ण जलवायु में पनपता है जहां न बहुत ज्यादा गर्मी हो और न कड़ाके की सर्दी। पानी की सतह पर यह हरे रंग की एक पतली परत की तरह दिखाई देता है। इस फर्न के निचले हिस्से में सिम्बोइंट के रूप में ब्लू ग्रीन एल्गी यानी सयानोबैक्टीरिया मौजूद रहता है, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन को पौधों के काम आने वाले रूप में बदल देता है।
मिट्टी और फसल, दोनों को फायदा
नाइट्रोजन मिट्टी की सेहत के लिए बेहद जरूरी तत्व है। अजोला में यह भरपूर मात्रा में होने के कारण खेत की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक खाद की कमी अपने आप पूरी हो जाती है। इसी वजह से अजोला की खेती से धान की फसल और खेत की जमीन, दोनों को एक साथ फायदा मिलता है। धान को अच्छी बढ़वार के लिए ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत होती है, और अजोला यह नाइट्रोजन प्राकृतिक तरीके से खेत में पहुंचा देता है।
कैसे और कब डालें खेत में
तरीका भी बेहद आसान है। धान की रोपाई के करीब एक सप्ताह बाद, जब खेत पानी से भरा हो, तब उसमें ताजा अजोला छिड़क दिया जाता है। इसके बाद यह फर्न खुद ही फैलकर खेत में नाइट्रोजन की आपूर्ति करता रहता है। नतीजा यह होता है कि रासायनिक खाद की जरूरत घट जाती है और उत्पादन भी बढ़ जाता है।
यूरिया का खर्च 30 फीसदी तक कम
आमतौर पर किसान नाइट्रोजन की कमी यूरिया डालकर पूरी करते हैं, जिस पर अच्छा खासा पैसा खर्च होता है। अजोला यही काम बिना लागत के कर देता है। गया जिले के प्रगतिशील किसान श्रीनिवास कुमार के मुताबिक, अजोला के इस्तेमाल से यूरिया और दूसरे नाइट्रोजन वाले उर्वरकों की जरूरत में 25 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। जाहिर है, खर्च घटेगा तो किसान का मुनाफा बढ़ने की गुंजाइश भी बनेगी।
खरपतवार की समस्या से राहत
धान की खेती में खरपतवार हमेशा से बड़ी मुसीबत रही है। अजोला पानी की पूरी सतह को ढक लेता है, जिससे सूरज की रोशनी नीचे तक नहीं पहुंच पाती। रोशनी न मिलने से खरपतवार उग ही नहीं पाता या बहुत कम उगता है। इसका सीधा फायदा यह है कि निराई-गुड़ाई पर होने वाला खर्च और मजदूरी की लागत, दोनों घट जाती है।
पशुओं के लिए पौष्टिक चारा भी
अजोला का फायदा सिर्फ खेत तक सीमित नहीं है, यह पशुपालन में भी बड़े काम आता है। इसमें प्रोटीन की अच्छी मात्रा होती है, जो मवेशियों के लिए पौष्टिक आहार का काम करती है। कई किसान अजोला उगाकर अपनी गाय-भैंसों को चारे के रूप में खिलाते हैं, जिससे पशुओं की सेहत भी सुधरती है और दूध उत्पादन में भी इजाफा देखने को मिलता है।













