अंबाला में सब्जी की खेती करने वाले अन्नदाताओं के लिए मौसम में बदलाव से पहले खेतों को तैयार करना बेहद जरूरी हो गया है। आने वाले कुछ सप्ताह में तापमान में गिरावट के साथ सर्दी अपना असर दिखाना शुरू कर देगी, जिससे पाला और कड़ाके की ठंड फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। मौसम के इस मिजाज को भांपते हुए कृषि और बागवानी से जुड़े जानकारों ने किसानों को अभी से सुरक्षात्मक उपाय करने की सलाह दी है। सर्दियों के मौसम में टमाटर, हरी मिर्च, शिमला मिर्च, खीरे और अन्य संवेदनशील फसलों पर ठंड का सीधा प्रहार होता है, जिससे पौधों की ग्रोथ रुकने के साथ कुल पैदावार में भी बड़ी गिरावट दर्ज की जाती है। इसी समस्या के समाधान के लिए बागवानी विभाग ने आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर देना शुरू किया है, ताकि किसानों की मेहनत सुरक्षित रह सके।
मल्चिंग तकनीक से फसलों की सुरक्षा और नमी
फसलों को ठंड के प्रकोप से बचाने के लिए मल्चिंग एक बेहद कारगर और आधुनिक तरीका साबित हो रहा है। इस तकनीक में खेत की क्यारियों के ऊपर एक विशेष पॉलीथिन शीट बिछाई जाती है और तय दूरी पर पौधे रोपे जाते हैं। यह शीट न सिर्फ मिट्टी के अंदर की नमी को लंबे समय तक बरकरार रखती है, बल्कि तापमान को भी नियंत्रित रखती है और खरपतवार यानी अनचाहे पौधों की समस्या को भी काफी हद तक कम कर देती है। सर्दियों के दिनों में यह पॉलीथिन चादर पौधों की जड़ों को पाले के असर से बचाती है। बागवानी विभाग के नियमों के मुताबिक, जो किसान अपने खेतों में मल्चिंग प्रणाली को अपनाते हैं, उन्हें ढाई एकड़ तक के क्षेत्रफल के लिए अधिकतम 16 हजार रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इससे खेती की शुरुआती लागत का बड़ा बोझ कम हो जाता है और किसान बेहतर मुनाफा कमाने की स्थिति में आ जाते हैं।
लो टनल तकनीक से तैयार करें मिनी ग्रीनहाउस
मल्चिंग के अलावा लो टनल तकनीक भी सर्दियों की खेती में वरदान साबित हो रही है। इस विधि में सब्जियों की कतारों के ऊपर एक लचीला ढांचा खड़ा करके उसके ऊपर पारदर्शी प्लास्टिक शीट या नॉन-वोवन कवर तान दिया जाता है, जिससे पौधों के ऊपर एक छोटी सुरंग जैसी संरचना बन जाती है। यह सेटअप एक मिनी ग्रीनहाउस की तरह काम करता है, जो कड़ाके की ठंड, पाले और तेज ठंडी हवाओं से फसलों की रक्षा करता है। इसके साथ ही यह मिट्टी के तापमान और नमी को भी संतुलित बनाए रखता है। इस तकनीक के लिए सरकार की तरफ से 14 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से अनुदान दिया जाता है। योजना के नियमों के अनुसार, कोई भी इच्छुक किसान अधिकतम 10 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र के लिए इस लाभ को प्राप्त कर सकता है। इस विधि की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे सब्जियां समय से पहले तैयार हो जाती हैं और किसान अपनी उपज समय पर बाजार में बेचकर अच्छा दाम पा सकते हैं।
अंबाला के किसानों के लिए वित्तीय सहायता और आवेदन प्रक्रिया
अंबाला बागवानी विभाग के अधिकारी विशाल ने मीडिया से बातचीत में बताया कि अंबाला क्षेत्र में शिमला मिर्च समेत कई प्रमुख सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। ऐसे में किसानों के लिए लो टनल का इस्तेमाल करना पाले से फसल बचाने का सबसे बेहतरीन जरिया है। इस तकनीक को अपनाने पर किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से लगभग 35 हजार से 40 हजार रुपये तक की आर्थिक मदद मिल सकती है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसानों को विभाग के आधिकारिक पोर्टल यानी HortNet Haryana Portal पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य है। इसके अलावा, किसानों के लिए 'मेरी फसल मेरा ब्यौरा' पोर्टल पर भी अपनी फसल का पूरा विवरण दर्ज कराना बेहद जरूरी शर्त है। आवेदन की प्रक्रिया पूरी करते समय किसानों को अपने सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ परिवार पहचान पत्र यानी PPP की जानकारी भी पोर्टल पर दर्ज करनी होगी, ताकि सत्यापन प्रक्रिया में कोई रुकावट न आए।



















