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मिजोरम विवाह कानून संशोधन के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने को कहामिजोरम
24 अग॰ 2026, 8:40 pm (1 घंटे पहले)· 3

मिजोरम विवाह कानून संशोधन के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने मिजोरम के विवाह और संपत्ति उत्तराधिकार कानून संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को गुवाहाटी हाईकोर्ट का रुख करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मिजोरम की महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि वह अपनी याचिका के साथ गुवाहाटी हाईकोर्ट में जाएं, क्योंकि इस राज्य पर उसी उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र है। यह मामला मिजोरम के विवाह और संपत्ति से जुड़े कानूनों में किए गए संशोधनों को चुनौती देने से जुड़ा हुआ है।

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर हुई थी याचिका

मेरियम एल हरंगचाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दाखिल की गई थी। इसमें मिजोरम विवाह और संपत्ति उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिसके जरिए वर्ष 2014 के मूल मिजोरम विवाह, तलाक और संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम में बदलाव किए गए थे। याचिका में नए प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।

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अदालत ने स्थानीय स्तर पर सुनवाई पर दिया जोर

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि जब क्षेत्र में उच्च न्यायालय उपलब्ध है, तो उन्हें इसके लिए दिल्ली आने की कोई आवश्यकता नहीं है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आप हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाते हैं? आखिर उच्च न्यायालयों की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की जा सकती है।

गैर-मिजोरम पुरुषों से विवाह और अधिकारों का विवाद

याचिकाकर्ता का मुख्य आरोप है कि संशोधित कानून उन मिजोरम की महिलाओं के साथ भेदभाव करता है जो गैर-मिजोरम पुरुषों से विवाह करती हैं और इससे उनके बच्चों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस कानूनी पेंच के कारण महिलाओं की सामुदायिक पहचान, उनकी अनुसूचित जनजाति की स्थिति और बच्चों की कानूनी स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

नए कानून के अन्य मुख्य प्रावधान

वर्ष 2026 के संशोधित कानून में पारंपरिक प्रथाओं को शामिल करते हुए वर्ष 2014 के मूल कानून के प्रावधानों को और मजबूत किया गया है। इसमें बहुविवाह, अंतर-सामुदायिक विवाह और वैवाहिक संपत्ति पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े बदलाव शामिल हैं। नए नियमों के तहत बहुविवाह पर रोक लगाई गई है और महिलाओं को वैवाहिक संपत्ति में 50 प्रतिशत का समान हिस्सा दिया गया है, लेकिन अंतर-जातीय विवाहों से जुड़े नियम विवाद का विषय बने हुए हैं।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को क्या निर्देश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने का निर्देश दिया।
यह याचिका किसने दायर की थी?
यह याचिका मेरियम एल हरंगचाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी।
याचिका में किस कानून को चुनौती दी गई है?
याचिका में मिजोरम विवाह और संपत्ति उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
याचिका में मुख्य आपत्ति क्या है?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि संशोधित कानून गैर-मिजोरम पुरुषों से विवाह करने वाली महिलाओं के साथ भेदभाव करता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 मिनट पहले

यह मामला संवैधानिक अधिकारों और पारंपरिक प्रथाओं के बीच के उस संवेदनशील संघर्ष को उजागर करता है, जहाँ स्थानीय कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता आमने-सामने आ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता को गुवाहाटी हाईकोर्ट भेजने से यह स्पष्ट है कि उच्च न्यायालयों को क्षेत्रीय मामलों में अपनी संवैधानिक भूमिका पहले निभानी चाहिए। आगे चलकर, गैर-मिजोरम पुरुषों से विवाह करने वाली महिलाओं की अनुसूचित जनजाति की स्थिति और उनके बच्चों के अधिकारों पर हाईकोर्ट का रुख इस कानूनी विवाद की दिशा तय करेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·25 मिनट पहले

यह प्रकरण न केवल उत्तर-पूर्व के पारंपरिक कानूनों और लैंगिक समानता के जटिल समीकरण को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे सामुदायिक पहचान और आदिवासी अधिकारों के संरक्षण से जुड़े नीतिगत मामले अब देश की न्यायिक प्राथमिकताओं का केंद्र बन रहे हैं। हाईकोर्ट के आगामी निर्णय से पूर्वोत्तर के सामाजिक ताने-बाने और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन साधने की एक नई मिसाल कायम होने की पूरी संभावना है।

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