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बर्लिन में जलवायु वित्त पर बरसे पीयूष गोयल, अमीर देशों को याद दिलाया 100 अरब डॉलर का अधूरा वादाव्यापार
24 अक्तू॰ 2026, 9:02 am (25 मिनट पहले)· 0

बर्लिन में जलवायु वित्त पर बरसे पीयूष गोयल, अमीर देशों को याद दिलाया 100 अरब डॉलर का अधूरा वादा

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन में अमीर देशों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि 11 साल बीतने के बावजूद विकासशील देशों को तय जलवायु मदद नहीं मिली है।

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु संकट को लेकर संपन्न पश्चिमी मुल्कों की नीयत पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने वैश्विक मंच पर स्पष्ट किया कि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और पर्यावरणीय बदलावों से मुकाबला करने के लिए जिस आर्थिक सहयोग का भरोसा दिया गया था, वह आज तक हकीकत में नहीं बदल सका है। औद्योगिक प्रगति की आड़ में लंबे समय तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले विकसित देश अब अपनी अनिवार्य जिम्मेदारियां निभाने के वक्त कदम पीछे खींच रहे हैं।

पेरिस समझौते के संकल्प और जमीनी हकीकत

बर्लिन में आयोजित एक गोलमेज बैठक में विचार रखते हुए केंद्रीय मंत्री ने याद दिलाया कि वर्ष 2015 के ऐतिहासिक पेरिस जलवायु सम्मेलन में धनी देशों ने विकासशील और अल्पविकसित देशों को वित्तीय संबल प्रदान करने की औपचारिक सहमति दी थी। उस दौरान तय योजना के मुताबिक प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की जलवायु सहायता राशि का कोष तैयार किया जाना था। इस प्रतिबद्धता को सामने आए 11 वर्ष का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर जरूरतमंद मुल्कों को इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला। यह संपूर्ण प्रक्रिया केवल कागजी दस्तावेजों और औपचारिक वार्ताओं तक ही सिमट कर रह गई है। इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी इस चर्चा से जुड़े पहलुओं को रेखांकित किया।

उत्सर्जन असमानता और कार्बन बॉर्डर टैक्स पर आपत्ति

यूरोपीय संघ की व्यापार नीतियों और उसके कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी सीबीएएम की व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता जताई गई। आबादी और कार्बन उत्सर्जन के अनुपातिक अंतर का ब्योरा देते हुए यह तथ्य रेखांकित किया गया कि भारत में पूरी दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी बसती है, इसके बावजूद वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश की कुल हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से भी नीचे बनी हुई है। इसके विपरीत, यूरोपीय क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का स्तर भारतीय औसत से कई गुना अधिक है। समृद्ध देशों ने कई दशकों तक अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों के सहारे अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत किया, मगर अब वे विकास की राह पर अग्रसर देशों को आवश्यक पूंजी और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने से बच रहे हैं।

घरेलू अनिवार्यताएं और हरित ऊर्जा का संकल्प

वैश्विक मंच पर यह रेखांकित किया गया कि भारत के समक्ष 140 करोड़ से अधिक नागरिकों के लिए दैनिक ऊर्जा उपलब्धता, खाद्यान्न सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा जैसी भारी जिम्मेदारियां मौजूद हैं। इतनी व्यापक चुनौतियों के बीच भी देश नवीकरणीय और पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा स्रोतों के विस्तार में उल्लेखनीय गति से आगे बढ़ रहा है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रदूषण कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा प्रणालियों को अपनाने हेतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ठोस आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी मिलना बेहद जरूरी है।

औद्योगिक निवेश और बुनियादी ढांचे पर बैठक

अपने बर्लिन प्रवास के दौरान पीयूष गोयल ने वैश्विक औद्योगिक कंपनी नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिल्दिज के साथ भी अहम बैठक की। इस वार्ता में भारत के भीतर कंपनी के विनिर्माण कार्यों का दायरा बढ़ाने, पर्यावरण अनुकूल निर्माण सामग्री के उत्पादन और आधुनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में दीर्घकालिक सहयोग स्थापित करने की संभावनाओं पर विस्तृत विमर्श किया गया।

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सवाल-जवाब

पीयूष गोयल ने बर्लिन में किस मुख्य मुद्दे पर बात की?
उन्होंने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में विकसित देशों द्वारा 100 अरब डॉलर की वार्षिक जलवायु सहायता का वादा पूरा न करने और कार्बन बॉर्डर टैक्स के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
जलवायु परिवर्तन कोष को लेकर क्या वादा किया गया था?
वर्ष 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान अमीर देशों ने विकासशील देशों की मदद के लिए हर साल 100 अरब डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी।
वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी कितनी है?
भारत में दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश का योगदान 3 प्रतिशत से भी कम है।
बर्लिन यात्रा के दौरान पीयूष गोयल ने किस औद्योगिक समूह से मुलाकात की?
उन्होंने नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिल्दिज से मुलाकात कर भारत में विनिर्माण और टिकाऊ निर्माण सामग्री पर चर्चा की।
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