उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित धोली प्याऊ के रेलवे मैदान में भव्य ब्रजरज उत्सव का आगाज़ हो चुका है। सरकार की ओर से आयोजित यह सांस्कृतिक एवं शिल्प मेला 23 अक्टूबर से शुरू होकर 2 नवंबर तक संचालित किया जाएगा। इस आयोजन में देश के कई राज्यों से पहुंचे हुनरमंद दस्तकार अपनी पारंपरिक हस्तकला का बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। मेले के पहले ही दिन से हस्तशिल्प प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों की भारी भीड़ यहां पहुंच रही है, जहां वे कारीगरों के हाथों से बनी खूबसूरत कलाकृतियों को निहारने के साथ जमकर खरीदारी भी कर रहे हैं।
शिल्प कला का अनूठा संगम और विविधता
इस उत्सव के परिसर में लगे स्टॉलों पर लकड़ी, पत्थर तथा संगमरमर की बनी सजावटी और उपयोगी वस्तुओं की विस्तृत श्रृंखला सजाई गई है। यहां विशेष रूप से तराशी गई देवी-देवताओं की मूर्तियां, खूबसूरत लैंप, हाथी, घड़ियाल, नक्काशीदार दीपक और ताजमहल के सजीव मॉडल्स आगंतुकों को बेहद आकर्षित कर रहे हैं। इन कलाकृतियों की बारीक नक्काशी भारतीय दस्तकारी की उच्च गुणवत्ता और परंपरा को दर्शाती है। घरेलू सजावट से लेकर उपहार देने के उद्देश्य से लोग इन दस्तकारी उत्पादों को काफी पसंद कर रहे हैं और इनकी खूब बिक्री हो रही है।
पीढ़ियों से विरासत में मिला हुनर और तकनीक
आगरा से इस मेले में भागीदारी करने आए कुशल कारीगर अशोक कुमार ने अपनी कला और पृष्ठभूमि की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से पत्थर और संगमरमर की नक्काशी का काम करता आ रहा है। वे स्वयं इस शिल्प को आगे बढ़ाने वाली तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं, जबकि परिवार की चौथी पीढ़ी भी अब पूरी लगन के साथ इसी पुश्तैनी कार्य में जुट गई है। इन खूबसूरत मूर्तियों और सजावटी वस्तुओं को तैयार करने के लिए जिस उच्च गुणवत्ता वाले मार्बल और पत्थर की जरूरत होती है, उसे विशेष रूप से राजस्थान से मंगाया जाता है। कारीगरों के अनुसार विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों को अंतिम रूप देने में उनकी बनावट और जटिलता के आधार पर अलग-अलग समय लगता है।
हर बजट में उपलब्ध कलाकृतियां और सरकारी सहयोग
उत्सव में प्रदर्शित हस्तनिर्मित उत्पादों की कीमतें आम खरीदारों की पहुंच को ध्यान में रखकर तय की गई हैं। स्टॉलों पर उपलब्ध हस्तनिर्मित मूर्तियों और सजावटी सामान की शुरुआती कीमत 100 रुपये से लेकर अधिकतम 10,000 रुपये तक रखी गई है, जिससे हर तबके के लोग अपनी पसंद के अनुसार खरीदारी कर पा रहे हैं। अशोक कुमार ने यह भी रेखांकित किया कि सरकारी स्तर पर पारंपरिक शिल्पकारों को निरंतर प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें पूर्व में दक्षता अवार्ड और उसके उपरांत राज्य स्तरीय सम्मान से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा ऐसे आयोजनों में भाग लेने के लिए सरकार कारीगरों के आने-जाने और खान-पान का पूरा खर्च वहन करती है तथा मेले में निशुल्क स्टॉल भी उपलब्ध कराती है।



















