देश के हाई-स्पीड रेल नेटवर्क की दिशा में एक बड़ा तकनीकी पड़ाव पार हो गया है। बेंगलुरु स्थित बीईएमएल की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में पहली स्वदेशी बुलेट ट्रेन का ढांचा पूरी तरह तैयार कर लिया गया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत तैयार की जा रही ट्रेन की कार बॉडी अब अपने सबसे कठिन तकनीकी मूल्यांकन से गुजर रही है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 1 नवंबर को विनिर्माण संयंत्र का दौरा कर चल रहे निर्माण कार्यों और गुणवत्ता पैमानों की प्रगति का जायजा लिया। इस आठ डिब्बों वाले रैक को 280 किलोमीटर प्रति घंटे की डिजाइन गति और 250 किलोमीटर प्रति घंटे की परिचालन गति के लिए विकसित किया जा रहा है।
कठिन स्क्वीज टेस्ट के दौर से गुजर रहा ट्रेन का ढांचा
फैक्ट्री परिसर में तैयार किया गया ट्रेन का प्राथमिक ढांचा कई जटिल घटकों को जोड़कर बनाया गया है। इसमें साइडवॉल, रूफवॉल, एंडवॉल और अन्य संरचनात्मक पैनलों को आपस में जोड़कर एक सुदृढ़ इंटीग्रेटेड कार बॉडी का रूप दिया गया है। फिलहाल इस तैयार संरचना की मजबूती आंकने के लिए 'स्क्वीज टेस्ट' का अंतिम चरण संचालित किया जा रहा है।
जब कोई ट्रेन अत्यधिक गति से ट्रैक पर दौड़ती है, तो उस पर हवा के दबाव, गतिज ऊर्जा और पटरियों से पैदा होने वाले कंपन का जबरदस्त असर पड़ता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होता है कि ट्रेन का ढांचा न तो अपनी ज्यामितीय बनावट खोए और न ही अत्यधिक दबाव में उसमें कोई विकृति आए। स्क्वीज टेस्ट के माध्यम से ट्रेन की मजबूती, स्थिरता और दबाव झेलने की क्षमता को निर्धारित वैश्विक सुरक्षा मानकों के आधार पर मापा जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, बोगी और मोटर असेंबली की तैयारी
संरचनात्मक परीक्षणों के सफल समापन के बाद निर्माण प्रक्रिया अपने अगले चरण में प्रवेश करेगी। धातु के इस ढांचे को वास्तविक ट्रेन में बदलने के लिए इसमें अत्याधुनिक प्रोपल्शन तकनीक, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक मोटरें लगाई जाएंगी। इसके साथ ही कोच के निचले हिस्से में बोगी, एक्सल और संबंधित मैकेनिकल असेंबली को फिट किया जाएगा। इस तरह यह ढांचा पटरी पर दौड़ने लायक एक पूर्ण हाई-स्पीड ट्रेन सेट का रूप ले लेगा।
माइनस तापमान से लेकर 50 डिग्री की गर्मी में मौसम परीक्षण
भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु विविधता को देखते हुए इस ट्रेन को अत्यंत चुनौतीपूर्ण मौसम परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा रहा है। विनिर्माण प्रक्रिया के बाद ट्रेन के सभी आंतरिक और बाहरी उपकरणों का व्यापक क्लाइमेट टेस्ट लिया जाएगा।
इस परीक्षण योजना के तहत कोच को 50 डिग्री सेल्सियस की झुलसाने वाली गर्मी से लेकर शून्य से नीचे जाने वाले माइनस तापमान तक संचालित करके देखा जाएगा। इसके अलावा रेगिस्तानी इलाकों की धूल भरी आंधियों, अत्यधिक नमी और मानसूनी मूसलाधार बारिश के सीधे संपर्क में आने पर भी सिस्टम की कार्यक्षमता जांची जाएगी। तकनीकी टीम यह सुनिश्चित करेगी कि लगातार पानी की बौछारों के बीच ट्रेन के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बिना किसी बाधा के सामान्य रूप से कार्य करते रहें।
यात्री सुविधाओं, केबिन कंपन और वातानुकूलन पर ध्यान
सिर्फ रफ्तार ही नहीं, बल्कि सफर के दौरान यात्रियों की सुविधा को भी इंजीनियरिंग डिजाइन के केंद्र में रखा गया है। निरीक्षण के दौरान रेल मंत्री ने पैसेंजर सीटों की एर्गोनॉमिक बनावट, कपलर सिस्टम और हीटिंग, वेंटिलेशन एंड एयर कंडीशनिंग यानी एचवीएसी यूनिट की समीक्षा की।
अत्यधिक रफ्तार के समय केबिन के भीतर शोर और कंपन यात्रियों को असहज न करें, इसके लिए विशेष ध्वनिरोधी और शॉक-एब्जॉर्बिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही कोच निर्माण में उपयोग किए जाने वाले प्रिसिजन इंजीनियर्ड जिग्स, फिक्स्चर्स, साइड मॉड्यूल और रूफ मॉड्यूल के इंटीग्रेशन का भी बारीकी से अध्ययन किया गया है ताकि असेंबली कार्य पूरी सटीकता के साथ पूरा हो।
घरेलू रेल विनिर्माण क्षमता में नया मील का पत्थर
बीईएमएल की आदित्य मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी में इस ट्रेन सेट का निर्माण भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। देश के भीतर अत्याधुनिक रोलिंग स्टॉक के निर्माण, मॉड्यूल इंटीग्रेशन और एडवांस टेस्टिंग क्षमता विकसित होने से घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को भारी मजबूती मिलेगी। यह परियोजना साबित करती है कि भारतीय इंजीनियरिंग अब वैश्विक स्तर की हाई-स्पीड तकनीकों को देश में ही धरातल पर उतारने में सक्षम है।















