दुनिया भर में फैले आर्थिक तनाव और जटिल कूटनीतिक गतिरोध के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जी-20 देशों के मंच पर एक व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण पेश किया है। वैश्विक स्तर पर लंबे समय से खिंच रहे सैन्य टकरावों को खत्म करने की जरूरत पर बल देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को ऐसे सक्रिय कदम उठाने होंगे जिनसे खाद्य, ईंधन और जरूरी व्यापारिक आपूर्ति को सुरक्षित रखा जा सके। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का सबसे कड़ा और असहनीय बोझ विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है, इसलिए शांति और स्थिरता की दिशा में ठोस बातचीत आगे बढ़ाना समय की सबसे बड़ी मांग है। बैठक में मौजूद अन्य साझेदार मुल्कों के विदेश मंत्रियों ने भी इस दिशा में नई दिल्ली की कूटनीतिक पहलों और निरंतर संपर्कों का उल्लेख किया।
रूस और यूक्रेन के बीच टकराव कम करने का तीन सूत्री खाका
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के समाधान और उसके दुष्प्रभावों को रोकने के लिए भारत द्वारा उठाए जा रहे कदमों का विस्तृत ब्योरा देते हुए विदेश मंत्री ने बताया कि तीन सबसे संवेदनशील मुद्दों पर संबंधित पक्षों के साथ लगातार विमर्श किया जा रहा है। इस रणनीति में पहला मुख्य बिंदु नागरिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, ताकि व्यापारिक परिवहन में लगे निर्दोष कर्मियों और जलपोतों को युद्ध की आंच से बचाया जा सके। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रूस और यूक्रेन दोनों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज का निर्यात फिर से निर्बाध रूप से चालू कराना है। तीसरा और सबसे पेचीदा बिंदु ऊर्जा से जुड़े प्रमुख ठिकानों और प्रतिष्ठानों पर होने वाले हमलों को रोकने की संभावनाएं तलाशना है।
भारत ने इस संदर्भ में रूस और यूरोपीय मुल्कों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया है। काला सागर के जलमार्ग से खाद्यान्न की आवाजाही में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे एक गंभीर मानवीय और आर्थिक संकट पैदा हुआ है। रूस और यूक्रेन दोनों ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं, मक्का और अन्य अनाजों के सबसे बड़े निर्यातक रहे हैं। जब इन प्रमुख उत्पादक केंद्रों से निर्यात अचानक रुकता है या उसमें व्यवधान आता है, तो इसका सीधा और घातक असर उन सभी राष्ट्रों पर पड़ता है जो अपनी आबादी की दैनिक खाद्य जरूरतों के लिए अनाज आयात पर निर्भर रहते हैं।
ग्लोबल साउथ के लिए खाद्य और ऊर्जा संकट
ग्लोबल साउथ के देशों के लिए यह स्थिति जीवन और मरण का प्रश्न बन चुकी है, क्योंकि ये राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय खुले बाजार से अनाज खरीदने वाले सबसे बड़े ग्राहक हैं। जब कीमतें आसमान छूती हैं या आपूर्ति की कमी होती है, तो इन मुल्कों में भुखमरी और मुद्रास्फीति की विकट समस्या खड़ी हो जाती है। इसी कारण भारत चाहता है कि अनाज की आपूर्ति को यथाशीघ्र सामान्य बनाया जाए, जिससे दुनिया भर में मंडरा रहा खाद्य सुरक्षा का संकट और अधिक गहरा न हो।
विदेश मंत्री ने ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर होने वाले हमलों को रोकने के मुद्दे को पूरी बातचीत का सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण पहलू करार दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि विभिन्न देशों और पक्षों के लिए ऊर्जा ढांचे की परिभाषा एक जैसी नहीं है। किसी देश के दृष्टिकोण से ऊर्जा ढांचे का आशय तेल रिफाइनरी से होता है, तो किसी दूसरे देश के लिए इसमें राष्ट्रीय बिजली ग्रिड, सब-स्टेशन और ईंधन का परिवहन करने वाले विशाल टैंकर जहाज भी शामिल माने जाते हैं। अलग-अलग प्राथमिकताओं और परिभाषाओं के कारण इस विषय पर सभी संबंधित पक्षों के बीच आम सहमति बनाना बेहद कठिन साबित हो रहा है, फिर भी भारत सभी पक्षों को एक मेज पर लाने और साझा जमीन तलाशने के प्रयास में जुटा है।
शीर्ष नेतृत्व स्तर पर संवाद और कूटनीतिक प्रयास
इस शांति प्रक्रिया को गति देने के लिए कूटनीतिक संपर्क उच्चतम स्तर पर स्थापित किए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ इस विषय पर प्रत्यक्ष और विस्तृत बातचीत की है। इसके अतिरिक्त विदेश मंत्री स्वयं मॉस्को और कीव की यात्राएं पूरी कर चुके हैं, जहां उन्होंने दोनों पक्षों की चिंताओं को करीब से समझा। अटलांटा में भी उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ इस विषय पर आमने-सामने गहन विमर्श किया।
भारत इसके साथ-साथ यूक्रेन के नेतृत्व के साथ भी निरंतर संवाद में बना हुआ है और अमेरिका के साथ इस पूरी प्रक्रिया पर आवश्यक समन्वय स्थापित किए हुए है। हालांकि, कूटनीति की नाजुक प्रकृति को देखते हुए विदेश मंत्री ने इन वार्ताओं की मौजूदा स्थिति और गोपनीय ब्योरों को सार्वजनिक करने से परहेज किया, ताकि शांति प्रयासों की संवेदनशीलता बनी रहे।
ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं का राजनीतिकरण
ऊर्जा सुरक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य पर चर्चा के दौरान भारत ने ऊर्जा बाजार में पैदा की जा रही कृत्रिम विकृतियों और आपूर्ति को राजनीतिक दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की। जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा कि ऊर्जा के स्वतंत्र प्रवाह का राजनीतिकरण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत हानिकारक है और इसकी सबसे भारी कीमत गरीब और विकासशील देशों को चुकानी पड़ती है। ऊर्जा की किल्लत और आपूर्ति में रुकावटों से जूझ रहे देशों के लिए यह एक गंभीर अस्तित्वगत चुनौती है। भारत ने जी-20 के शक्तिशाली मंच पर इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करने और तत्काल सुधारात्मक उपाय अपनाने की जरूरत दोहराई।
खाद्य सुरक्षा के दायरे में अनाज के अलावा कृषि के लिए अनिवार्य उर्वरकों की उपलब्धता का संकट भी प्रमुखता से उठा। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति में आ रहे अवरोधों का ताल्लुक केवल काला सागर तक सीमित नहीं है, बल्कि खाड़ी और लाल सागर के समुद्री क्षेत्रों में मची उथल-पुथल से भी सीधे जुड़ा हुआ है। जब इन महत्वपूर्ण जलमार्गों में भू-राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है, तो उर्वरकों की लागत और ढुलाई प्रभावित होती है, जिसका सीधा दुष्परिणाम वैश्विक कृषि उत्पादन और आगामी फसलों की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
आपूर्ति श्रृंखलाओं का विविधीकरण और जी-20 में आम सहमति
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की मजबूती पर बल देते हुए भारत ने मांग रखी कि विनिर्माण और उत्पादन के मुख्य केंद्रों को दुनिया के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में फैलाया जाना चाहिए। किसी भी एक देश अथवा एक ही क्षेत्र पर दुनिया की अत्यधिक निर्भरता भविष्य के लिए जोखिम भरी है। कोविड महामारी का स्मरण कराते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि जब उत्पादन के सीमित और संकेंद्रित केंद्र अचानक बंद या बाधित होते हैं, तो उसका झटका पूरी मानव जाति को झेलना पड़ता है। आधुनिक युद्ध और जलवायु परिवर्तन से उपजी आपदाएं भी भविष्य में ऐसी ही भीषण आपूर्ति रुकावटें खड़ी कर सकती हैं।
भारत ने सख्त लहजे में आगाह किया कि आपूर्ति श्रृंखलाओं को कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग अथवा दूसरे राष्ट्रों पर अनुचित राजनीतिक दबाव डालने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति से हर हाल में बचना होगा। इसका एकमात्र सुरक्षित समाधान यही है कि कई भौगोलिक क्षेत्रों में उत्पादन केंद्र विकसित किए जाएं। जी-20 की बैठक में सर्वसम्मत साझा बयान जारी न हो पाने के संदर्भ में जयशंकर ने याद दिलाया कि अभी नेताओं का औपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित होना बाकी है। दिसंबर में होने वाले इस मुख्य सम्मेलन से पहले सदस्य राष्ट्रों के बीच साझा सहमति तैयार करने के कूटनीतिक प्रयासों में तेजी आने की पूरी संभावना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जी-20 देश अहम वैश्विक मुद्दों पर साझा आधार तलाशने में सफल होंगे।
ब्रिक्स समूह की कार्यप्रणाली का उदाहरण देते हुए जयशंकर ने समझाया कि परस्पर भिन्न परिस्थितियों और विचारों वाले सदस्य राष्ट्र होने के बावजूद वहां के प्रमुख देश एक संयुक्त साझा बयान पर सहमत होने में सफल रहे थे। भारत जी-20 के भीतर भी इसी प्रकार की आम सहमति कायम कराने के प्रयासों को अपना पूरा समर्थन देगा। अटलांटा में बैठक के दौरान जयशंकर ने अनेक देशों के विदेश मंत्रियों के साथ द्विपक्षीय तथा छोटे समूहों में सार्थक बैठकें कीं। आज के बेहद ध्रुवीकृत अंतरराष्ट्रीय वातावरण में भारत की यह अनूठी विशेषता मानी जा रही है कि वह विरोधी खेमों के साथ भी खुला संवाद बनाए रख सकता है और उनके गहरे मतभेदों को पाटने में रचनात्मक योगदान दे सकता है।
क्वाड बैठक और म्यूनिख संदर्भ पर सफाई
जी-20 की मुख्य बैठकों से इतर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने शनिवार सुबह क्वाड समूह की एक उच्चस्तरीय बैठक में भाग लिया। चालू वर्ष के भीतर इन चारों प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के विदेश मंत्रियों की यह तीसरी महत्वपूर्ण बैठक थी, जिसके पूर्व वे नई दिल्ली और मनीला में भी मिल चुके थे। चारों विदेश मंत्रियों ने एकमत से स्वीकार किया कि क्वाड के प्राथमिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में उपयोगी और सकारात्मक प्रगति दर्ज की गई है। आने वाले समय में इस चतुष्कोणीय समूह की प्राथमिकताओं और कार्ययोजना को समकालीन चुनौतियों के अनुरूप नई दिशा देने के साथ-साथ इसके समग्र एजेंडे का विस्तार करने पर भी गंभीर विचार किया जाएगा।
अमेरिका के संदर्भ में पूर्व में की गई अपनी तीखी टिप्पणियों से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए जयशंकर ने स्पष्ट किया कि वे वक्तव्य म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ एक बिल्कुल अलग संदर्भ में हुई निजी चर्चा का हिस्सा थे। अटलांटा में आयोजित विदेश मंत्रियों की बैठक का कूटनीतिक वातावरण, उद्देश्य और मंच पूरी तरह भिन्न था। उन्होंने कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में कही गई बात उसके संदर्भ और वहां मौजूद विशिष्ट श्रोताओं की प्रकृति के अनुरूप ही समझी जानी चाहिए।



















