बिहार के भागलपुर और नवगछिया क्षेत्र में गंगा नदी के बढ़ते जलप्रलय ने कृषि व्यवस्था को भारी आघात पहुंचाया है। नदी का पानी तटवर्ती इलाकों में घुस जाने से किसानों की महीनों की कड़ी मेहनत और पूंजी पर पानी फिर गया है। यहां बड़े पैमाने पर की जाने वाली सब्जी की पैदावार देश के अन्य राज्यों तक आपूर्ति की जाती है, लेकिन मौजूदा हालात ने अन्नदाताओं को गहरे संकट में डाल दिया है।
गोभी की फसल पर कुदरत की मार
नदी के किनारे उगाई जाने वाली गोभी की फसल पूरी तरह जलमग्न हो चुकी है। एक स्थानीय कृषक ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी फसल पर लगभग एक लाख रुपये की लागत लगाई थी। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस बार अच्छी पैदावार से बंपर मुनाफा होगा और वे उस राशि से अपना मकान बनवाने के लिए बचत कर सकेंगे। लेकिन पौधे में फूल आने से पहले ही बाढ़ के पानी ने सब कुछ चौपट कर दिया।
बरसों से जारी है तबाही का सिलसिला
पीड़ित किसानों का कहना है कि यह संकट केवल इस साल का नहीं है। पिछले करीब तीन वर्षों से लगातार बाढ़ आने के कारण हर साल उनकी सब्जियां या अन्य फसलें बर्बाद हो रही हैं। जमा-पूंजी पहले ही खेतों में लग चुकी है और मकान का सपना भी अधूरा रह गया है।
किराये के खेत और बढ़ता कर्ज का बोझ
क्षेत्र में कई ऐसे कृषक हैं जो दूसरों की जमीन पट्टे या किराए पर लेकर खेती करते हैं। इसके एवज में उन्हें जमीन मालिक को तयशुदा अनाज या फसल का हिस्सा देना पड़ता है। फसल पूरी तरह नष्ट होने के बावजूद उन्हें खेत का किराया तो चुकाना ही होगा। ऐसे विकट समय में परिवार का भरण-पोषण करने और अगली फसल की तैयारी के लिए उन्हें दोबारा कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
जीवनयापन और जरूरी खर्चों पर संकट
पारंपरिक तौर पर इस कृषि से होने वाली आमदनी से ही बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा और घर की अन्य बुनियादी आवश्यकताएं पूरी होती थीं। अब मुनाफे की जगह सिर पर भारी कर्ज चढ़ने का डर मंडरा रहा है। किसानों का दर्द साफ झलकता है कि वे हर साल नए सिरे से संघर्ष कर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, लेकिन पानी का तेज बहाव उनकी सारी उम्मीदें और कमाई अपने साथ बहा ले जाता है।



















