भागलपुर समेत बिहार के कई बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले किसानों के सामने हर साल मानसून के दौरान एक बड़ी समस्या खड़ी होती है। खेतों में लंबे समय तक जलजमाव रहने के कारण पारंपरिक सब्जियों की बुवाई काफी पिछड़ जाती है। जब पानी उतरता है और किसान बीज बोते हैं, तब तक फसल तैयार होने में काफी समय लग जाता है और बाजार में देर से पहुंचने के कारण सब्जियों के उचित दाम नहीं मिल पाते। हालांकि, अब कृषि विशेषज्ञों ने इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान निकाला है। बाढ़ के पानी के पूरी तरह निकलने का इंतजार किए बिना किसान अपने घर की छत पर ट्रे में नेनुआ की पौध तैयार कर सकते हैं, जिससे पानी उतरते ही सीधे खेत में रोपाई की जा सके और अगात फसल का बढ़िया मुनाफा कमाया जा सके।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सब्जी खेती की बड़ी चुनौतियां
बिहार के भागलपुर क्षेत्र में बाढ़ का पानी हर साल किसानों की पूरी फसल योजना को अस्त-व्यस्त कर देता है। आम तौर पर खेतों में जमा पानी पूरी तरह से निकलने में सितंबर महीने तक का समय लग जाता है। पारंपरिक खेती के तरीकों में किसान जलजमाव समाप्त होने के बाद ही खेतों की जुताई करके बीज बोने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। इस तरीके से बीज के अंकुरित होने, पौधे के बढ़ने और फल आने में काफी अधिक समय लग जाता है। इसके परिणामस्वरूप, जब तक स्थानीय किसानों की नेनुआ या अन्य सब्जियों की फसल मंडी में पहुंचती है, तब तक बाजार में अन्य गैर-प्रभावित क्षेत्रों से सब्जियों की भारी आवक हो चुकी होती है। आपूर्ति बढ़ने से मंडी में नेनुआ की कीमतें काफी गिर जाती हैं, जिससे बाढ़ की मार झेल चुके किसानों को उनकी उपज का लागत मूल्य निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
छत पर ट्रे में पौध तैयार करने की आसान तकनीक
बाढ़ के कारण होने वाले इस आर्थिक नुकसान और समय की बर्बादी से बचने के लिए कृषि विशेषज्ञ गूँजेश गुंजन ने किसानों को अगात यानी समय से पूर्व पौध तैयार करने की सलाह दी है। इस तकनीक के तहत किसानों को खेत से बाढ़ का पानी पूरी तरह खाली होने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठने की आवश्यकता नहीं है। किसान अपने घर की छत या किसी ऊंचे सुरक्षित स्थान पर प्लास्टिक की ट्रे में मिट्टी और जैविक खाद का मिश्रण भरकर नेनुआ के बीजों की बुवाई कर सकते हैं। भागलपुर क्षेत्र में सितंबर के दौरान जब तक खेतों से पानी धीरे-धीरे कम होता है, तब तक छत पर रखी ट्रे में नेनुआ के स्वस्थ पौधे बनकर पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। पानी उतरते ही इन तैयार पौधों को बिना किसी देरी के सीधे खेतों में रोप दिया जाता है, जिससे पौध तैयार होने में लगने वाले कीमती 20 से 25 दिनों की बचत हो जाती है।
नेनुआ की उन्नत किस्मों का सही चयन
नेनुआ की खेती से अधिकतम उत्पादन और गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए सही किस्म के बीजों का चयन करना अत्यंत आवश्यक होता है। कृषि विशेषज्ञ गूँजेश गुंजन के अनुसार भागलपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों की जलवायु तथा मिट्टी के हिसाब से तीन प्रमुख किस्में सबसे अधिक उपयुक्त मानी गई हैं। इनमें आलोक, मोहिनी और स्थानीय देशी किस्म शामिल हैं। इन विशिष्ट किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें अन्य साधारण किस्मों की तुलना में कीटों और रोगों का प्रकोप काफी कम होता है। इसके साथ ही इन पौधों में फलन की क्षमता बेहतरीन होती है और फल की गुणवत्ता भी बाजार की मांग के अनुकूल रहती है। किसान अपनी जमीन और स्थानीय मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इनमें से उपयुक्त किस्म चुन सकते हैं।
समय से पहले फलन और बाजार में ज्यादा मुनाफा
अगात तकनीक से नेनुआ की खेती करने पर फसल का उत्पादन चक्र कई हफ्ते आगे खिसक जाता है। जब तक अन्य किसान अपने खेतों में बीज बोने की तैयारी कर रहे होते हैं, तब तक इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों के खेतों में नेनुआ की फसल में फलन शुरू हो जाता है। इसका सीधा फायदा मंडी में बिक्री के समय मिलता है। शुरुआती सीजन में जब बाजार में ताजी सब्जियों की आवक कम होती है, उस समय किसान अपनी उपज को मंडी में पहुंचाकर ऊंचे और आकर्षक भाव हासिल कर सकते हैं। समय की इस सटीक बचत के कारण बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के किसान न केवल अपनी फसल की बेहतर कीमत पा सकते हैं, बल्कि कम समय में अधिक मुनाफा कमाकर बाढ़ से हुए शुरुआती नुकसान की भरपाई भी आसानी से कर सकते हैं।


















