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भोजपुर: बगीचे के सूखे पत्तों से उपेंद्र सिंह बना रहे हैं सोना जैसी खाद, खेती में मिल रहा है फायदाव्यापार
1 घंटे पहले· 2

भोजपुर: बगीचे के सूखे पत्तों से उपेंद्र सिंह बना रहे हैं सोना जैसी खाद, खेती में मिल रहा है फायदा

बिहार के भोजपुर में प्रगतिशील किसान उपेंद्र सिंह बेकार समझे जाने वाले सूखे पत्तों से उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार कर खेती की लागत कम कर रहे हैं।

अमित पटेलअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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बिहार के भोजपुर जिले के आयर गांव के निवासी उपेंद्र सिंह एक प्रगतिशील किसान के रूप में नई राह दिखा रहे हैं। आमतौर पर लोग अपने बगीचों से गिरने वाले सूखे और पुराने पत्तों को अनुपयोगी मानकर जला देते हैं या उन्हें कचरे में फेंक देते हैं, लेकिन उपेंद्र सिंह ने इन पत्तों में एक बड़ा अवसर देखा है। वे इन सूखे पत्तों का उपयोग करके उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद का निर्माण कर रहे हैं, जो खेतों के लिए अमृत के समान साबित हो रही है। इस अभिनव पहल से न केवल पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाया जा रहा है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता में भी अभूतपूर्व सुधार देखने को मिल रहा है।

खाद बनाने की विशेष विधि

उपेंद्र सिंह ने इस प्रक्रिया को विस्तार से समझाया है। सबसे पहले बगीचे में बिखरे हुए सूखे पत्तों को एक निश्चित स्थान पर इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद, इन पत्तों को एक गड्ढे या निर्धारित जगह पर परत दर परत बिछाया जाता है। इस प्रक्रिया में गोबर, नींबू और अन्य प्राकृतिक जैविक पदार्थों का मिश्रण मिलाया जाता है, जिससे पत्तों के सड़ने की गति तेज हो जाती है। वे बताते हैं कि खाद को जल्दी तैयार करने के लिए समय-समय पर इसमें नमी बनाए रखना और मिश्रण की पलटाई करना बहुत आवश्यक होता है, ताकि सभी तत्व सही ढंग से आपस में मिल सकें।

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मिट्टी की सेहत में सुधार

इस जैविक खाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी रासायनिक पदार्थ का कोई इस्तेमाल नहीं किया जाता है। उपेंद्र सिंह के अनुसार, यह मिट्टी के लिए पूरी तरह से सुरक्षित और गुणकारी है। इसके लगातार इस्तेमाल से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा में इजाफा होता है। साथ ही, खेत में केंचुओं और पौधों के लिए लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या तेजी से बढ़ती है। खाद के प्रयोग से मिट्टी की जल धारण करने की क्षमता भी पहले से बेहतर हो गई है। इससे फसलों की जड़ें न केवल मजबूत होती हैं, बल्कि पौधों का प्राकृतिक विकास भी सुनिश्चित होता है।

लागत में कमी और उत्पादन में वृद्धि

वर्तमान में उपेंद्र सिंह अपने कई एकड़ के बगीचों और खेतों में इसी स्वदेशी खाद का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने साझा किया कि इस विधि को अपनाने के बाद अब उन्हें रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बहुत कम करनी पड़ी है। खाद घर पर ही तैयार होने के कारण उनकी खेती की लागत में भी काफी बचत हो रही है। परिणाम स्वरूप, उनकी फसलों की गुणवत्ता में सुधार आया है और उत्पादन का स्तर भी सकारात्मक रूप से बढ़ा है।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश

सूखे पत्तों को जलाना एक आम समस्या है, जिससे वातावरण में हानिकारक धुआं फैलता है और प्रदूषण बढ़ता है। उपेंद्र सिंह ने इस कचरे को उपयोगी संसाधन में बदल दिया है। उनका मानना है कि पत्तों को जलाने के बजाय खाद बनाने से कचरा प्रबंधन आसान हो जाता है और पर्यावरण को प्रदूषण से राहत मिलती है। उनकी यह मेहनत अब स्थानीय किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। आस-पास के कई किसान अब उनके खेतों पर आकर जैविक खाद बनाने की पूरी प्रक्रिया को बारीकी से सीख रहे हैं और अपने खेतों में भी इसे लागू करने के लिए उत्साहित हैं। यह प्रयोग यदि बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो मिट्टी की सेहत को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में काफी मदद मिल सकती है।

इसका आप पर असर

भारत में: किसान रसायनों का उपयोग घटाकर और कृषि कचरे का पुनर्चक्रण करके अपनी खेती की लागत में कमी ला सकते हैं।

बिहार में: भोजपुर के आसपास के किसान उपेंद्र सिंह के तरीके को अपनाकर कम लागत में अपनी जमीन की उर्वरता बढ़ा सकते हैं।

प्रेरणा और सीख

  • कचरे को संसाधन बनाना: बेकार चीजों में मूल्य ढूंढना सीखें।
  • पर्यावरण की सुरक्षा: हानिकारक रसायनों के बजाय प्राकृतिक तरीकों को प्राथमिकता दें।
  • सीखने की प्रवृत्ति: नवाचार को अपनाएं और दूसरों को भी प्रोत्साहित करें।
  • लागत कम करना: स्थानीय उपलब्ध सामग्री से कृषि की लागत घटाई जा सकती है।

सवाल-जवाब

उपेंद्र सिंह खाद बनाने के लिए किन चीजों का उपयोग करते हैं?
वे खाद बनाने के लिए बगीचे के सूखे पत्तों, गोबर, नींबू और अन्य प्राकृतिक जैविक सामग्री का मिश्रण उपयोग करते हैं।
क्या इस खाद में किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग किया जाता है?
नहीं, यह खाद पूरी तरह से प्राकृतिक है और इसमें किसी भी रासायनिक पदार्थ का प्रयोग नहीं किया जाता है।
इस जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी को क्या फायदा होता है?
इसके प्रयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन की वृद्धि होती है, सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है और मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार आता है।
किसान उपेंद्र सिंह को इस खाद से क्या आर्थिक लाभ मिल रहा है?
उन्हें रासायनिक उर्वरकों की कम आवश्यकता पड़ रही है, जिससे उनकी खेती की लागत कम हो गई है और फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
अमित पटेल
लेखक के बारे मेंअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताबिज़नेस समाचार, वित्तीय बाज़ार, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट मामले, स्टार्टअप, उद्यमिता, आर्थिक रुझान, टेक्नोलॉजी बिज़नेस, निवेश, वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, स्टार्टअप, तकनीक और आर्थिक रुझानों को कवर करते हैं। वे आधुनिक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले कारोबार और उद्योगों की ख़बरें, बाज़ार विश्लेषण और अंतर्दृष्टि देते हैं।

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, उद्यमिता, तकनीक और आर्थिक घटनाक्रमों को कवर करते हैं। वे ब्रेकिंग बिज़नेस न्यूज़, कॉर्पोरेट रणनीतियों, शेयर बाज़ार के रुझानों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले औद्योगिक नवाचारों पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, स्पष्टता और गहन विश्लेषण पर ज़ोर देते हुए अमित पाठकों को जटिल कारोबारी विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करते हैं। उनकी कवरेज वित्तीय बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उभरते उद्योगों, आर्थिक नीति, निवेश रुझानों और डिजिटल बदलाव तक फैली है।

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