सन 1947 में अगस्त के महीने में जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तब दोनों देशों के अस्तित्व में आने के बीच महज एक रात का अंतर था। बंटवारे के बाद दोनों मुल्कों ने प्रशासनिक ढांचा खड़ा करना शुरू किया और अपनी-अपनी सरकारें गठित कीं। हालांकि, इस ऐतिहासिक विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान के पास बैंकिंग और मौद्रिक नियंत्रण का कोई प्राथमिक ढांचा मौजूद नहीं था। यही वजह रही कि आजादी मिलने के बाद भी करीब 11 महीनों तक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ही पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक की भूमिका निभाता रहा। इस अवधि के दौरान नए पड़ोसी देश की पूरी मुद्रा आपूर्ति, सरकारी बैंकिंग कामकाज और वित्तीय प्रबंधन की देखरेख का जिम्मा भारत के केंद्रीय बैंक के कंधों पर ही टिका हुआ था।
विभाजन के समय पाकिस्तान के पास क्यों नहीं था बैंकिंग ढांचा?
भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना देश की आजादी से 12 वर्ष पूर्व सन 1935 में ही हो चुकी थी। 1947 तक आरबीआई का प्रशासनिक संजाल, अनुभवी कर्मचारी और करेंसी परिचालन व्यवस्था पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मजबूती से फैली हुई थी। इस विशाल नेटवर्क का हिस्सा कराची और लाहौर में स्थित करेंसी कार्यालय भी थे, जो विभाजन की रेखा खिंचने के बाद पाकिस्तान के क्षेत्र में चले गए। अचानक अलग मुल्क बनने के कारण पाकिस्तान के पास अपनी कोई केंद्रीय बैंकिंग संस्था नहीं थी और न ही सरकारी खजाने को संचालित करने की व्यवस्था थी। यदि उस समय करेंसी की आपूर्ति रोक दी जाती तो वहां का प्रशासनिक कामकाज ठप्प पड़ सकता था। इस प्रशासनिक शून्य को भरने के लिए आरबीआई ने पाकिस्तान की अंतरिम व्यवस्था के तहत उसके सेंट्रल बैंक का उत्तरदायित्व स्वीकार किया।
भारतीय रिजर्व बैंक ने छापे थे पाकिस्तान के शुरुआती नोट
रिजर्व बैंक द्वारा निभाई गई इस अनूठी दोहरी जिम्मेदारी का सीधा प्रमाण उस दौर के बैंक नोटों पर दिखाई देता है। नए देश के गठन के बाद पाकिस्तान के लिए पहले करेंसी नोट भारतीय रिजर्व बैंक ने ही छापे थे। भारत के नासिक और अन्य प्रिंटिंग प्रेसों में तैयार इन नोटों का मूल डिजाइन और ढांचा पूरी तरह भारतीय नोटों जैसा ही रखा गया था। हालांकि, पाकिस्तान सरकार की पहचान दर्ज करने के लिए नोटों के ऊपरी हिस्से पर अंग्रेजी में Government of Pakistan छापा गया, जबकि वाटरमार्क वाले स्थान पर उर्दू में Hakumat-e-Pakistan अंकित किया गया। इस तात्कालिक व्यवस्था से फायदा यह हुआ कि पाकिस्तान को नए सिरे से डिजाइन बनाने, प्लेट तैयार करने और नोटों के नए वितरण संजाल की लंबी प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना पड़ा।
पाकिस्तान (मौद्रिक प्रणाली और रिजर्व बैंक) आदेश, 1947
इस अंतरिम मौद्रिक परिचालन को कानूनी आधार देने के लिए पाकिस्तान (मौद्रिक प्रणाली और रिजर्व बैंक) आदेश, 1947 लागू किया गया था। इस कानूनी आदेश के तहत आरबीआई को जून 1948 तक पाकिस्तान सरकार के आधिकारिक बैंकर और मुद्रा नियंत्रक के रूप में कार्य करने का अधिकार मिला। उस समय आरबीआई में 1 रुपये, 2 रुपये, 5 रुपये, 10 रुपये और 100 रुपये के मूल्यों में पाकिस्तान के लिए नोट जारी किए थे। जब तक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का गठन नहीं हुआ, तब तक वहां भारतीय नोट और आरबीआई द्वारा संशोधित यही नोट निर्बाध रूप से चलते रहे।
आजादी के दो साल बाद क्यों हुआ आरबीआई का राष्ट्रीयकरण?
बैंकिंग इतिहास का एक बेहद रोचक पहलू यह भी है कि 1947 में भारत को आजादी मिलने के तुरंत बाद रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया था। उस समय तक आरबीआई निजी शेयरधारकों के मालिकाना हक वाली संस्था थी। चूंकि 1947 के आदेश के तहत आरबीआई को पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के तौर पर भी कानूनी सेवाएं देनी थीं, इसलिए जब तक उसकी सीमापार जिम्मेदारी समाप्त नहीं हुई, तब तक इसे पूर्ण रूप से भारत सरकार के स्वामित्व में नहीं लिया जा सकता था। जून 1948 में जब पाकिस्तान में रिजर्व बैंक की भूमिका पूरी तरह खत्म हो गई, उसके बाद सन 1949 में भारतीय रिजर्व बैंक का औपचारिक राष्ट्रीयकरण संपन्न हुआ।
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान की शुरुआत और जिन्ना का उद्घोष
पाकिस्तान का अपना केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान 1 जुलाई, 1948 को कराची में स्थापित हुआ और जाहिद हुसैन को इसका पहला गवर्नर नियुक्त किया गया। संस्थान के उद्घाटन समारोह में मुहम्मद अली जिन्ना ने इस कदम को देश की आर्थिक संप्रभुता का प्रतीक बताया था। बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स के अभिलेखों के अनुसार, उन्होंने कहा था कि स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का खुलना वित्तीय क्षेत्र में राष्ट्र की पूर्ण स्वाधीनता को प्रदर्शित करता है। इसके साथ ही आरबीआई ने पाकिस्तान में अपने सभी ऑपरेशन बंद कर दिए और भारत का अपना केंद्रीय बैंक पूरी तरह भारतीय बैंकिंग प्रणाली के विकास में जुट गया।



















