सहारनपुर में मानसून की दस्तक के साथ ही कृषि कार्य तेजी पकड़ चुके हैं, लेकिन बारिश का यह मौसम फसलों के लिए नई चुनौतियां भी लेकर आता है। धान, जिसे भरपूर पानी की आवश्यकता होती है, इस दौरान कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की संभावना रहती है। जब खेतों में नमी और आर्द्रता बढ़ती है, तो विभिन्न प्रकार के रोग और संक्रमण फसल को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं। किसानों के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि फसल में किन लक्षणों को देखकर सतर्क होना चाहिए और उन्हें रोकने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना क्यों जरूरी है।
धान की फसल को प्रभावित करने वाली मुख्य बीमारियां
धान की फसल के लिए सबसे घातक बीमारियों में शीथ ब्लाइट, नेक ब्लास्ट, लीफ ब्लाइट, रूट रोट और नेमाटोड प्रमुख हैं। ये रोग अक्सर फसल के शुरुआती चरणों में ही सक्रिय हो जाते हैं। संक्रमण का मुख्य स्रोत अक्सर बीज और वह नर्सरी होती है जहां पौध तैयार की जाती है। यदि प्रारंभिक चरण में ही पौध संक्रमित हो जाए, तो खेत में रोपाई के बाद बीमारी पूरे क्षेत्र में तेजी से फैल जाती है। बारिश का मौसम इन हानिकारक सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है, जिससे फसल पर इनके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखने लगते हैं।
रासायनिक और जैविक बचाव के तरीके
अक्सर किसान इन बीमारियों को देखने के बाद रासायनिक छिड़काव का विकल्प चुनते हैं, लेकिन बारिश के कारण इनका प्रभाव कई बार सीमित रह जाता है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और प्रोफेसर डॉ. आई.के. कुशवाहा के अनुसार, सावधानी और निवारक उपचार ही फसल को बड़ी क्षति से बचा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेमाटोड जैसी समस्याओं में पौधों की जड़ों में गांठे बन जाती हैं, जो फसल के विकास को बुरी तरह अवरुद्ध करती हैं।
कैसे करें अपनी फसल का सुरक्षा प्रबंधन
प्रोफेसर डॉ. आई.के. कुशवाहा ने धान को सुरक्षित रखने के लिए विशेष विधि समझाई है। किसानों को कार्बेन्डाजिम + मैनकोज़ेब या थायोफिनेट मिथाइल का उपयोग करना चाहिए। इसकी मात्रा 2 से 3 ग्राम प्रति लीटर पानी के अनुपात में रखकर एक घोल बनाना होता है। रोपाई करने से पहले धान की पौध की जड़ों को इस तैयार मिश्रण में 5 से 10 मिनट तक डुबोकर रखना चाहिए। यह प्रक्रिया रूट रोट जैसी जटिल समस्याओं से लड़ने में अत्यधिक मददगार साबित होती है।
इसके अतिरिक्त, यदि शीथ ब्लाइट के लक्षण पत्तियों के निचले हिस्सों में दिखाई देने लगें, तो ट्राइकोडर्मा का उपयोग एक रामबाण साबित हो सकता है। ट्राइकोडर्मा एक मित्र फफूंदी है जो हानिकारक रोगों को खत्म करने में सक्षम है। किसान इसे गुड़ और बेसन के घोल के साथ मिलाकर 200 लीटर पानी में तैयार करें। इस मिश्रण को खेत के इनलेट पर डालने से यह पानी के बहाव के साथ पूरे खेत में फैल जाता है और हानिकारक फफूंद को जड़ से नष्ट कर देता है। सही समय पर अपनाया गया यह जैविक और रासायनिक तालमेल किसानों की मेहनत को सुरक्षित रखने में पूरी तरह कारगर है।



















