धान की खेती करने वाले किसानों के लिए मानसून का समय किसी बड़े वरदान से कम नहीं होता है। देवघर और इसके आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों किसान धान की रोपाई के काम में पूरी लगन से जुटे हुए हैं। बारिश के इस मौसम का अन्नदाता पूरे साल बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि यह धान की फसल के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। वर्तमान में कई जगहों पर खेतों में रोपाई का काम पूरी तरह से संपन्न हो चुका है, जबकि कुछ इलाकों में अभी भी बिचड़ा तैयार किया जा रहा है और पौधे लगाए जा रहे हैं। ज्यादातर किसान यह मान बैठते हैं कि खेतों में बिचड़ा लगाने के बाद उनका मुख्य काम खत्म हो गया है और वे निश्चिंत हो जाते हैं। खेती के जानकारों के अनुसार यही वह समय होता है जब फसल को सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है। रोपाई के बाद सही समय पर सही कदम न उठाने से पूरी मेहनत बेकार हो सकती है।
शुरुआती दिनों की अहमियत
खेतों में पौधे लगाने के बाद का समय फसल के भविष्य को तय करता है। देवघर के कृषि विशेषज्ञ अंबिका कुशवाहा बताते हैं कि रोपाई के बाद के शुरुआती 20 से 25 दिन धान की फसल के लिए बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। इस अवधि के दौरान छोटे पौधे नई जगह की मिट्टी में अपनी जड़ों को स्थापित कर रहे होते हैं और उनके विकास की शुरुआत होती है। इस नाजुक समय में पौधों को अतिरिक्त पोषण और सुरक्षा की भारी जरूरत होती है। यदि इसी दौरान खेत में कीटों का हमला हो जाए, तो पौधे जड़ों से ही कमजोर पड़ने लगते हैं। उनकी बढ़ने की क्षमता पूरी तरह से रुक जाती है और फसल बर्बाद होने की कगार पर पहुंच जाती है। इसलिए किसानों को इस समय अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए और अपने खेतों की लगातार निगरानी करनी चाहिए। शुरुआती दिनों की यह निगरानी ही आगे चलकर बेहतर पैदावार की नींव रखती है।
केवल यूरिया का प्रयोग है एक बड़ी भूल
अक्सर खेतों में यह देखने को मिलता है कि किसान फसल की वृद्धि के लिए केवल रासायनिक खादों पर निर्भर रहते हैं। बहुत से किसान रोपाई के 20 से 25 दिन बीत जाने के बाद खेतों में सिर्फ यूरिया खाद का छिड़काव कर देते हैं और यह समझ लेते हैं कि उन्होंने अपनी फसल को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया है। कृषि विशेषज्ञ इसे एक बहुत बड़ी भूल मानते हैं। केवल यूरिया डालने से पौधों को पोषण तो मिल जाता है, लेकिन वे जानलेवा कीटों से बिल्कुल सुरक्षित नहीं होते। यूरिया के प्रयोग के साथ फसल को कीटाणुओं से बचाना भी उतना ही जरूरी होता है। सही तरीका यह है कि जब यूरिया का छिड़काव किया जा रहा हो, ठीक उसी समय किसी उचित कीटनाशक का भी इस्तेमाल किया जाए। इससे पौधे न केवल तेजी से बढ़ते हैं, बल्कि लंबे समय तक कीटों के जानलेवा हमले से भी महफूज रहते हैं।
तना छेदक कीट से सबसे बड़ा खतरा
धान की फसल के लिए सबसे बड़ा और खतरनाक दुश्मन तना छेदक कीट को माना जाता है। इसे अंग्रेजी में स्टेम बोरर के नाम से भी जाना जाता है। इस कीट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बाहर से आसानी से दिखाई नहीं देता है। यह चुपचाप पौधे के तने के अंदर प्रवेश कर जाता है और उसे भीतर ही भीतर पूरी तरह से खाकर खोखला कर देता है। शुरुआती दौर में किसानों को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं लग पाता है कि उनकी फसल पर किसी घातक कीट का हमला हो चुका है। जब तक नुकसान दिखाई देना शुरू होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। धीरे धीरे पौधे का ऊपरी हिस्सा पीला पड़ने लगता है। इसके बाद पूरी पत्ती और तना पूरी तरह से सूख जाता है। हरे-भरे लहराते खेतों के बीच अचानक सूखे हुए पौधे नजर आने लगते हैं, जो इस छिपे हुए कीट के हमले का सबसे स्पष्ट संकेत होते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह और सही प्रबंधन
अगर सही समय पर तना छेदक कीट की पहचान कर इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह बहुत ही तेजी से पूरे खेत में अपनी मजबूत पकड़ बना लेता है। एक बार जब यह कीट फैल जाता है, तो फसल की वृद्धि पूरी तरह से ठप हो जाती है और इसका सीधा एवं नकारात्मक असर कुल उत्पादन पर पड़ता है। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञ अंबिका कुशवाहा सख्ती से सलाह देते हैं कि इस गंभीर समस्या से बचने के लिए किसानों को किसी भी रासायनिक दवा या कीटनाशक का उपयोग बिना सही जानकारी के बिल्कुल नहीं करना चाहिए। बाजार में कई तरह के रसायन उपलब्ध हैं, लेकिन खेत की स्थिति और कीट के प्रकोप को समझे बिना उनका प्रयोग फसल के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है।
समय पर निगरानी और बेहतर पैदावार
किसानों को हमेशा कृषि विभाग के विशेषज्ञों की उचित सलाह लेनी चाहिए। विभागीय अधिकारियों के परामर्श के बाद ही सही कीटनाशक दवा और उसकी उचित मात्रा का चुनाव करना चाहिए। खेती में अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए समय पर खाद का उपयोग, खेतों में पानी का सही तरीके से प्रबंधन और शुरुआती चरण में ही कीटों पर नियंत्रण पाना सबसे अहम कदम होते हैं। बारिश के इस महत्वपूर्ण मौसम में कृषि विशेषज्ञ लगातार किसानों को यह सलाह दे रहे हैं कि वे अपनी फसल की नियमित रूप से निगरानी करें। रोपाई के बाद खेत को यूं ही नहीं छोड़ना चाहिए। अगर किसान इन बताई गई छोटी-छोटी बातों का गंभीरता से पालन करते हैं, तो उनकी धान की फसल पूरी तरह से स्वस्थ रहेगी और उत्पादन भी बेहतर मिलेगा।



















