ईंधन की कीमतों के बाद अब भारतीय रसोई के सामने एक नई और बड़ी चुनौती खड़ी होती दिख रही है। मौसम की बदलती चाल और अनिश्चितताओं के कारण देश में दालों के उत्पादन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इस स्थिति से निपटने और आने वाले दिनों में दालों की कीमतों में किसी भी तरह की बेकाबू तेजी को रोकने के लिए सरकार ने अभी से ही एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में उपभोक्ता मंत्रालय ने कृषि मंत्रालय को एक पत्र भेजकर दालों के भंडारण से जुड़े नियमों में जरूरी बदलाव करने की पुरजोर सिफारिश की है। मंत्रालय का मानना है कि इन बदलावों से भविष्य में दालों की कमी से निपटने में मदद मिलेगी और आम उपभोक्ताओं को महंगाई की मार से बड़ी राहत मिल पाएगी।
प्राइस सपोर्ट स्कीम के नियमों में बदलाव की मांग
खाद्य और उपभोक्ता मामलों के विभाग ने कृषि मंत्रालय से अनुरोध किया है कि प्राइस सपोर्ट स्कीम यानी PSS के नियमों को कुछ हद तक आसान बनाया जाए। मौजूदा व्यवस्था के नियमों के मुताबिक, सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी गई दालों को नौ महीने के भीतर पूरी तरह से खत्म या बेच देना अनिवार्य होता है। हालांकि, उपभोक्ता मंत्रालय का तर्क है कि अल नीनो के प्रभाव की वजह से आगामी खरीफ सीजन में दालों की पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे देश में खाद्य महंगाई के तेजी से बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है। ऐसे में उपभोक्ताओं को कीमतों के इस असर से सुरक्षित रखने के लिए सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले स्टॉक की भंडारण सीमा को बढ़ाने की सख्त जरूरत है ताकि जरूरत के वक्त बाजार में संतुलन बनाया जा सके।
किसानों से एमएसपी पर खरीद और स्टॉक की भूमिका
प्राइस सपोर्ट सिस्टम यानी PSS वह व्यवस्था है जिसके तहत सरकार किसानों से सीधे दालें, तिलहन और कोपरा जैसी फसलें खरीदती है। यह सरकारी खरीद तब की जाती है जब खुले बाजार में इन फसलों के दाम काफी गिर जाते हैं, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP का लाभ देकर उन्हें आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने कृषि मामलों के विभाग को भेजे गए अपने पत्र में विशेष तौर पर यह रेखांकित किया है कि वर्ष 2025-26 के लिए तुअर और चना दाल के स्टॉक को ठिकाने लगाने या बेचने के मौजूदा नियमों में संशोधन किया जाना बेहद जरूरी है। ऐसा करने से आने वाले महीनों में जब भी बाजार में दालों की कमी महसूस होगी, तो सरकार के पास पर्याप्त स्टॉक होगा जिससे कीमतों पर प्रभावी ढंग से लगाम कसी जा सकेगी।
मौसम के शुरुआती आकलन और अधिकारियों की निगरानी
विभाग की ओर से भेजे गए पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि इस साल के खरीफ सीजन के दौरान दालों की कुल पैदावार में गिरावट दर्ज की जा सकती है। खराब मौसम और विपरीत परिस्थितियों के बीच आम उपभोक्ताओं को किफायती दरों पर दाल उपलब्ध कराते रहने के लिए मौजूदा प्रावधानों में बदलाव करना समय की मांग है। उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे की ओर से एग्रीकल्चर विभाग के सचिव आतिश चंद्रा को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि इस पूरे मामले पर बेहद बारीकी से नजर रखी जा रही है। इसके साथ ही, आने वाले खरीफ सीजन में दालों के उत्पादन के हर पहलू की लगातार मॉनिटरिंग भी की जा रही है ताकि समय रहते उचित कदम उठाए जा सकें।
अल नीनो का प्रभाव और भविष्य की नीतियां
शुरुआती आकलनों से यह संकेत मिलने लगे हैं कि अल नीनो की वजह से मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिसका सीधा असर देश के कई हिस्सों में फसलों के कुल उत्पादन पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी यह कह पाना संभव नहीं है कि कुल पैदावार में कितनी कमी आएगी, लेकिन खतरे की घंटी बज चुकी है। PSS योजना के तहत सरकार बाजार से फसलों की खरीदारी करके उनका विशाल भंडारण तैयार करती है और जब भी खुले बाजार में कीमतें आसमान छूने लगती हैं, तो सरकार अपने इसी सुरक्षित भंडार से अनाज को बाजार में उतारकर कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास करती है। उपभोक्ता विभाग का यह भी कहना है कि मौसम की इन तमाम चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भविष्य में दालों की खरीद और उनकी सुचारू बिक्री से जुड़ी नीतियों में समय रहते बदलाव करना आवश्यक हो गया है ताकि आम आदमी की थाली पर इसका असर न पड़े।



















