मानसून की सक्रियता के बीच लगातार हो रही भारी बारिश किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। खेतों में जलजमाव की समस्या गन्ने की फसल के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है, जिससे किसान चिंतित हैं कि मौसम का यह मिजाज उनके उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। कृषि विशेषज्ञों ने ऐसी स्थिति में फसल को बचाने और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कुछ वैज्ञानिक तरीके सुझाए हैं, जिन पर अमल करना लाभदायक साबित होगा।
खेत से पानी की समुचित निकासी
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. सतीश चंद्र नारायण का कहना है कि बरसात के मौसम में सबसे पहली प्राथमिकता खेत में पानी को रुकने न देने की होनी चाहिए। यदि खेत के अंदर पानी इकट्ठा हो जाए, तो गन्ने की जड़ों का विकास रुक सकता है और पौधे गलने लगते हैं। इसके लिए किसानों को खेतों के किनारे उचित नालियां बनानी चाहिए या यदि जलभराव अधिक हो, तो पंप सेट का उपयोग करके तत्काल पानी को बाहर निकाल देना चाहिए। खेत जितना जल्दी सूखेगा, फसल के नुकसान की आशंका उतनी ही कम हो जाएगी।
उर्वरकों का सही उपयोग
जब खेत की जमीन इतनी सूख जाए कि उस पर आसानी से चला जा सके, तो फसल की वृद्धि को पुनर्जीवित करने के लिए खाद का उपयोग करना चाहिए। डॉ. सतीश चंद्र नारायण के सुझाव के मुताबिक, मानसून सीजन के दौरान सामान्य की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन का प्रयोग करना उचित रहता है। इसके साथ-साथ प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 30 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम सल्फर का छिड़काव फसल को पोषण देने में बहुत प्रभावी सिद्ध होता है। सल्फर न केवल पौधों को मजबूती देता है, बल्कि प्रतिकूल मौसम से प्रभावित पौधों को पुनः जीवित होने में मदद करता है। दिलचस्प बात यह है कि अधिक जलभराव वाले खेतों में फास्फोरस का स्तर पहले से ही पर्याप्त रहता है, इसलिए अलग से फास्फोरस डालने की सलाह नहीं दी जाती है।
पोषक तत्वों का छिड़काव
पौधों को त्वरित ऊर्जा प्रदान करने का सबसे कारगर माध्यम पत्तियों पर पोषक तत्वों का घोल छिड़कना है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 3 किलोग्राम यूरिया को सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ मिलाकर 200 लीटर पानी में घोल तैयार कर लेना चाहिए। इस मिश्रण का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने से फसल को तत्काल पोषण मिलता है और उसकी सेहत में सुधार आता है।
बीमारियों से सुरक्षा
लंबे समय तक खेत में पानी के ठहराव से गन्ने में रेड रॉट जैसी खतरनाक फफूंद जनित बीमारियों के पनपने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इस समस्या से फसल को बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियनम का उपयोग बेहद जरूरी है। इसे 15-15 दिन के अंतराल पर मिट्टी में मिलाना चाहिए या फिर सिंचाई के पानी के साथ देना चाहिए। यह प्रक्रिया दो बार दोहराने से फसल बीमारियों से सुरक्षित रहती है और पैदावार के स्तर पर भी अनुकूल परिणाम देखने को मिलते हैं।










