रामगंगा किनारे लेमनग्रास से मुरादाबाद के किसानों को मिल रहा मोटा मुनाफाव्यापार
2 घंटे पहले· 3

रामगंगा किनारे लेमनग्रास से मुरादाबाद के किसानों को मिल रहा मोटा मुनाफा

मुरादाबाद में रामगंगा नदी किनारे की जमीन लेमनग्रास की खेती के लिए मुफीद साबित हो रही है, जिससे किसान कम लागत में सालाना 1 से 2 लाख रुपये प्रति एकड़ तक कमा रहे हैं.

मुरादाबाद में किसानों के लिए लेमनग्रास एक फायदे का सौदा साबित हो रहा है. यहां की आबोहवा और मिट्टी, खासकर रामगंगा नदी के किनारे वाले इलाकों की जमीन, इस सुगंधित घास की खेती के लिए मुफीद मानी जा रही है. कम पानी और कम लागत में तैयार होने वाली यह फसल एक बार लगाने के बाद सालों तक किसानों को कमाई देती रहती है, जिससे तेल, चाय और दवाओं के बढ़ते बाजार में मुरादाबाद के किसानों को नया मौका मिल रहा है.

रामगंगा किनारे की जमीन क्यों है मुफीद

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक मुरादाबाद की जलवायु और यहां की भूमि, खासकर रामगंगा नदी के तटीय इलाकों की मिट्टी, लेमनग्रास की खेती के लिए बिल्कुल अनुकूल है. इस फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें बहुत कम पानी और कम लागत लगती है, फिर भी एक बार खेत में लगाने के बाद यह कई सालों तक लगातार उपज देती रहती है. यही वजह है कि यह किसानों के लिए कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल बन चुकी है.

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एक एकड़ में कितनी कमाई

सही तरीके से देखभाल करने पर किसान लेमनग्रास की खेती से सालाना 1 लाख से 2 लाख रुपये प्रति एकड़ तक कमा सकते हैं. कम समय में अच्छा मुनाफा देने की वजह से यह फसल अब मुरादाबाद के किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है. तेल, चाय और दवाओं में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, यही वजह है कि किसान इस खेती के जरिए अपनी आमदनी आसानी से बढ़ा सकते हैं.

स्लिप्स से होती है बुवाई, जमीन का चुनाव अहम

कृषि वैज्ञानिक डॉ दीपक मेहंदीरत्ता के मुताबिक लेमनग्रास की खेती मुख्य रूप से तेल निकालने के लिए की जाती है. उन्होंने बताया कि कृष्णा समेत इसकी कई वैरायटी अब उपलब्ध हैं और इसे स्लिप्स के जरिए लगाया जाता है. खेत के लिए ऐसी जमीन चुनी जाती है जहां पानी खड़ा न होता हो और मिट्टी दोमट किस्म की हो. एक स्लिप लगाने के बाद उसके आसपास अपने आप कई और स्लिप्स निकल आती हैं, और यही स्लिप्स आगे चलकर फसल को बढ़ाने के काम आती हैं. इस तरीके से लगाई गई फसल से करीब 7 वर्ष के भीतर लगभग 3 कटाइयां ली जा सकती हैं. डॉ मेहंदीरत्ता के मुताबिक जैसे ही पौधों में फूल आने की स्थिति बनने लगे, उसी समय कटाई कर देनी चाहिए. कटाई के बाद एक आसान प्रक्रिया से इसका तेल निकाला जाता है.

एक साल में 100 से 110 लीटर तक तेल

डॉ मेहंदीरत्ता बताते हैं कि लेमनग्रास का तेल कई तरह के औषधीय और अन्य कामों में इस्तेमाल होता है, यही वजह है कि बाजार में इसकी लगातार खपत बनी रहती है. अगर खेती अच्छी हो और बालियां सही तरीके से तैयार हों, तो एक साल में करीब 3 कटाई से किसानों को 100 से 110 लीटर तक तेल मिल सकता है. इतनी मात्रा में तेल मिलने से किसान भाइयों को अच्छी आमदनी होती है. इसका एक और फायदा यह है कि किसानों को बार-बार खेत की जुताई करने से भी छुटकारा मिल जाता है, जिससे मेहनत और खर्चा दोनों बचता है.

पत्तियां भी बिकती हैं, ईमानदारी से काम का मिलता है फायदा

डॉ मेहंदीरत्ता के मुताबिक अगर किसान पूरी ईमानदारी और सही तरीके से यह खेती करें, तो न सिर्फ तेल बल्कि इसकी पत्तियां भी बाजार में बिक जाती हैं. ये पत्तियां ग्रीन टी जैसी चीजों में इस्तेमाल होती हैं, इसलिए कई खरीदार सीधे पत्तियां भी खरीद लेते हैं. तेल और पत्तियां दोनों से होने वाली कमाई मिलाकर लेमनग्रास की खेती मुरादाबाद के किसानों के लिए अच्छे मुनाफे वाला जरिया बन गई है.

सवाल-जवाब

लेमनग्रास की खेती किसानों के लिए फायदेमंद क्यों है?
कम पानी और कम लागत में एक बार लगाने पर सालों तक उपज मिलती है, जिससे किसान सालाना 1 से 2 लाख रुपये प्रति एकड़ तक कमा सकते हैं.
मुरादाबाद में लेमनग्रास की खेती के लिए कौन सी जमीन सबसे मुफीद है?
रामगंगा नदी के तटीय इलाकों की दोमट मिट्टी वाली जमीन, जहां पानी खड़ा न होता हो, इस खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है.
लेमनग्रास कैसे लगाया जाता है?
इसे स्लिप्स के जरिए लगाया जाता है, एक स्लिप लगाने के बाद उसके आसपास कई और स्लिप्स अपने आप निकल आती हैं जो आगे फसल बढ़ाने में काम आती हैं.
एक साल में कितना तेल मिल सकता है?
अच्छी खेती और सही बालियों के साथ करीब 3 कटाई से एक साल में 100 से 110 लीटर तक तेल मिल सकता है.
फसल की कटाई कब करनी चाहिए?
जैसे ही पौधों में फूल आने की स्थिति बनने लगे, उसी समय कटाई कर देनी चाहिए.
लेमनग्रास से किसानों को और क्या फायदा मिलता है?
तेल के अलावा इसकी पत्तियां भी बिकती हैं, जिनका इस्तेमाल ग्रीन टी जैसी चीजों में होता है, और बार-बार खेत जोतने की जरूरत भी नहीं पड़ती.

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