भोजपुर के किसान अब खेती में नई तकनीक अपनाकर अपनी आय बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। पारंपरिक खेती से हटकर अब किसान अपने तालाबों का स्मार्ट तरीके से उपयोग कर रहे हैं, जिससे एक ही समय में दो अलग-अलग उत्पादों से आमदनी प्राप्त की जा सके। मखाना की खेती जो पहले केवल मिथिलांचल के क्षेत्रों तक ही सिमटी हुई थी, अब राज्य के अन्य हिस्सों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यदि सही प्रबंधन किया जाए, तो एक ही तालाब में मखाना और मछली पालन का तालमेल किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
एक साथ दोनों फसलों का प्रबंधन
मखाना की खेती के साथ मछली पालन करने का विचार कई किसानों के लिए आर्थिक रूप से बेहद सफल साबित हुआ है। मत्स्य पदाधिकारी कृष्ण कन्हैया ने इस एकीकृत खेती के लिए चार बुनियादी बातों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है, ताकि किसान बिना किसी नुकसान के बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकें।
- मछली की उचित प्रजाति का चयन: तालाब में ऐसी मछलियों का चयन करना सबसे महत्वपूर्ण है जो तालाब की निचली या मध्यम सतह पर रहती हैं। यह सुनिश्चित करता है कि मछली और मखाना के पौधों के बीच कोई संघर्ष न हो।
- स्थान का उचित प्रबंधन: यदि तालाब एक एकड़ के दायरे में फैला है, तो उसमें 20 गुणा 20 फीट का एक खाली कोना छोड़ना आवश्यक है। वैकल्पिक रूप से, आप 10 गुणा 10 फीट की दो अलग-अलग जगहें खाली रख सकते हैं।
- बांस से घेराबंदी की तकनीक: छोड़े गए खाली हिस्से को बांस की सहायता से सुरक्षित रूप से घेर देना चाहिए। इसका मुख्य उद्देश्य उस स्थान पर मखाना को उगने से रोकना है, ताकि मछलियों को सांस लेने और ऊपर आने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके और वे सुरक्षित रहें।
- रसायन मुक्त खेती: मखाना की फसल में किसी भी प्रकार के कीटनाशक का प्रयोग करना पूरी तरह से वर्जित होना चाहिए। कीटनाशकों का उपयोग मछलियों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक होता है, जिससे वे मर सकती हैं। मखाने के कीड़ों को मछलियां प्राकृतिक रूप से ही खाकर समाप्त कर देती हैं, इसलिए अतिरिक्त दवा की आवश्यकता नहीं होती।
तालाब निर्माण और उसमें मिश्रित खेती का यह आधुनिक चलन तेजी से फैल रहा है। यदि किसान इन नियमों का पालन पूरी सतर्कता के साथ करें, तो वे मछली और मखाना, दोनों से एक साथ भारी मुनाफा सुनिश्चित कर सकते हैं।










