नागौर जिले में इस साल मानसून की भरपूर बारिश ने किसानों के चेहरों पर खुशी ला दी है, जिसके चलते कपास की फसल काफी अच्छी स्थिति में दिखाई दे रही है। हालांकि, मौसम के मिजाज में आ रहे बदलाव और हवा में बढ़ती नमी के कारण अब कपास के लिए एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। जिले के कई हिस्सों में गुलाबी सुंडी यानी पिंक बॉलवॉर्म का हमला देखा जा रहा है। कृषि विभाग ने इस खतरे को गंभीरता से लेते हुए मेड़ता और डेगाना जैसे क्षेत्रों को संवेदनशील घोषित किया है और किसानों को सतर्क रहने का सुझाव दिया है।
फसल का आंकड़ा और महत्व
नागौर में कपास एक मुख्य नकदी फसल है। इस वर्ष जिले भर में कुल 62 हजार हेक्टेयर भूमि पर कपास की बुवाई की गई है, जो पिछले छह सालों के औसत आंकड़ों से काफी ज्यादा है। यदि बीते वर्षों की बात करें, तो यहाँ औसतन 60 हजार हेक्टेयर में खेती होती आई है और सालाना उत्पादन लगभग 88 हजार मीट्रिक टन तक पहुँच जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बार गुलाबी सुंडी पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो जिले के कुल उत्पादन और किसानों की आर्थिक स्थिति पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
गुलाबी सुंडी का विनाशकारी प्रभाव
कृषि विभाग के अधिकारी शंकरराम के अनुसार, गुलाबी सुंडी कपास की फसल के लिए सबसे घातक कीटों में से एक है। इसकी कार्यप्रणाली बेहद चालाकी भरी होती है; मादा पतंगा फूल और डेंडू पर अंडे देती है, जिससे निकलने वाली सुंडी सीधे कपास के डोडे के भीतर घुस जाती है। सुंडी अंदर ही अंदर बीज और रेशों को पूरी तरह नष्ट कर देती है, जिससे फसल खोखली हो जाती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि बाहर से देखने पर डेंडू बिल्कुल सामान्य लगता है, जिस कारण किसान शुरुआती स्तर पर इस बीमारी को पकड़ नहीं पाते। स्थिति गंभीर होने पर यह कीट पूरी फसल का 70 से 80 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा सकता है।
कैसे करें बचाव और नियंत्रण
विशेषज्ञों ने गुलाबी सुंडी की निगरानी के लिए फेरोमैन ट्रैप को सबसे कारगर और सुरक्षित तरीका बताया है। यह एक पर्यावरण के अनुकूल तकनीक है जिसमें प्लास्टिक के ट्रैप का इस्तेमाल किया जाता है और उसके भीतर विशेष रासायनिक ल्योर रखा जाता है। इस ल्योर की गंध नर पतंगों को अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे वे ट्रैप में फंस जाते हैं और प्रजनन चक्र टूट जाता है। इसके परिणामस्वरूप कीटों की संख्या में भारी गिरावट आती है। विभाग की सलाह है कि बुवाई के 40 से 45 दिन बाद प्रति हेक्टेयर 15 से 20 ट्रैप जरूर लगाएं। एक ट्रैप की लागत लगभग 50 से 60 रुपए होती है, जिसका अर्थ है कि प्रति बीघा खर्च करीब 200 से 300 रुपए के बीच ही आता है। समय रहते इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान अपनी मेहनत से उगाई गई फसल को बर्बाद होने से बचा सकते हैं और बेहतर पैदावार सुनिश्चित कर सकते हैं।










