सितंबर का महीना गेंदा की खेती के लिहाज से किसानों के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान लगाई गई फसल दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह के सीजन में अच्छी कमाई करा सकती है. रायबरेली जिले के वरिष्ठ उद्यान निरीक्षक नरेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, इस महीने अफ्रीकन गेंदा और फ्रेंच गेंदा की कई बेहतरीन किस्मों में से चुनाव किया जा सकता है और सही वैरायटी का चयन ही किसानों के मुनाफे की पहली शर्त है.
अफ्रीकन और फ्रेंच गेंदा में क्या है फर्क
अफ्रीकन गेंदा उन किसानों की पहली पसंद माना जाता है, जो बड़े आकार और ज्यादा वजन वाले फूल चाहते हैं. इसके उलट फ्रेंच गेंदा के फूल आकार में भले छोटे हों, लेकिन इनकी बनावट और रंगत ज्यादा आकर्षक होती है, जिसकी वजह से सजावट और गुलदस्ते के काम में इसकी अलग मांग रहती है. किसान अपने इलाके की जलवायु और मंडी की जरूरत देखकर इन दोनों में से कोई भी किस्म चुन सकते हैं.
कौन सी किस्में हैं किसानों की पहली पसंद
क्षेत्र की जलवायु और बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए किसान पूसा नारंगी गेंदा, पूसा बसंती गेंदा, अफ्रीकन येलो और अफ्रीकन ऑरेंज जैसी प्रचलित किस्मों को चुन सकते हैं. स्थानीय बाजार में आमतौर पर पीले और नारंगी रंग के फूलों की मांग सबसे ज्यादा रहती है. यही वजह है कि खेती शुरू करने से पहले आसपास के फूल बाजार का रुख जरूर समझ लेना चाहिए, ताकि जिस रंग के फूल की मांग ज्यादा है, उसी की रोपाई प्राथमिकता से हो सके.
मिट्टी और खेत की तैयारी कैसे करें
गेंदा की अच्छी पैदावार के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. खेत की गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए, जिससे जड़ों का फैलाव आसान हो सके. इसके बाद खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों को शुरुआती पोषण मिलता है.
पौध तैयार करने से लेकर रोपाई तक का तरीका
गेंदा की खेती आमतौर पर सीधे बीज बोने के बजाय पौध तैयार करके की जाती है. पहले बीजों से नर्सरी में पौध तैयार की जाती है और जब ये पौधे रोपाई लायक ऊंचाई के हो जाते हैं, तभी उन्हें खेत में स्थानांतरित किया जाता है. रोपाई करते समय पौधों के बीच पर्याप्त दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे हवा और धूप हर पौधे तक अच्छी तरह पहुंचती है और फफूंद व अन्य रोगों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.
सिंचाई और खाद-पानी का सही प्रबंधन
पौध रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए, ताकि पौधे जल्दी जमीन में जड़ पकड़ सकें. इसके बाद मौसम और मिट्टी की नमी को देखते हुए ही आगे पानी दिया जाना चाहिए. खेत में जरूरत से ज्यादा पानी जमा नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ें सड़ने लगती हैं और पूरी फसल को नुकसान पहुंच सकता है. बेहतर बढ़वार और ज्यादा फूल पाने के लिए जैविक खाद के साथ-साथ संतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल भी जरूरी है. बढ़वार के दौरान समय-समय पर जरूरी पोषण देने से पौधों की शाखाएं मजबूत होती हैं, जिससे फूलों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती है.
त्योहारी सीजन में मुनाफे का गणित
गेंदा फूल की सबसे बड़ी खूबी इसकी लगातार बनी रहने वाली बाजार मांग है. त्योहारों और शादी-विवाह के मौसम में इसकी कीमत बढ़ने से किसानों को अच्छे दाम मिलने की पूरी संभावना रहती है. हालांकि असली मुनाफा उत्पादन की मात्रा, स्थानीय मंडी, फूल की गुणवत्ता और उस वक्त मिलने वाले भाव पर ही टिका होता है. अगर किसान नजदीकी मंडी, फूल बाजार, मंदिरों, सजावट का काम करने वालों और शादी आयोजकों से पहले ही संपर्क बना लें, तो फसल तैयार होते ही बिक्री आसान हो जाती है. कई किसान बिचौलियों को दरकिनार कर सीधे ग्राहकों और डेकोरेशन कारोबारियों को फूल बेचकर अपनी कमाई भी बढ़ा लेते हैं.
सही समय पर बिक्री भी उतनी ही जरूरी
गेंदा की खेती से बेहतर मुनाफा कमाने के लिए सिर्फ अच्छा उत्पादन ही काफी नहीं है, बल्कि सही समय पर बिक्री उतनी ही अहम है. सितंबर में रोपाई की योजना बनाते वक्त किसानों को यह जरूर परखना चाहिए कि उनके इलाके में किस रंग और आकार के फूलों की मांग सबसे ज्यादा रहती है. सही किस्म का चुनाव, समय पर देखभाल और बाजार तक सही पहुंच मिलकर गेंदा की खेती को किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का एक भरोसेमंद जरिया बना सकते हैं.



















