भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियादी स्थिति और निरंतर उच्च विकास दर को देखते हुए जापानी साख निर्धारण एजेंसी जेसीआर ने देश की सोवेरिन साख में सुधार किया है। जून तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) आंकड़े जारी होने के ठीक दो दिन बाद आए इस फैसले में जेसीआर ने भारत की रेटिंग को 'BBB+' से एक पायदान बढ़ाकर 'A-' कर दिया है। एजेंसी ने भारत के रेटिंग आउटलुक को 'स्थिर' रखा है। रेटिंग में बढ़ोतरी का मुख्य आधार देश की मजबूत आर्थिक वृद्धि दर, राजकोषीय अनुशासन में लगातार सुधार और वित्तीय प्रणाली की बढ़ती मजबूती को बताया गया है।
मुख्य आर्थिक संकेतक और विकास की रफ्तार
जापानी एजेंसी जेसीआर ने अपने मूल्यांकन में कहा कि 140 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी और मौजूदा मूल्यों पर 3.9 लाख करोड़ डॉलर का आकार रखने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष में भी 6 फीसदी से अधिक की उच्च विकास दर बनाए रखने में सक्षम है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय अर्थव्यवस्था निजी खपत और सार्वजनिक पूंजीगत निवेश के बल पर औसतन 7 फीसदी के आसपास की तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है।
चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान भारत की GDP वृद्धि दर 7.8 फीसदी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जताए गए 7 फीसदी के अनुमान से भी काफी बेहतर है। उल्लेखनीय है कि इससे पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में भी देश की समग्र आर्थिक वृद्धि दर 7.8 फीसदी ही रही थी। यह लगातार बना हुआ मजबूत प्रदर्शन भारतीय बाजार की आंतरिक क्षमता और विनिर्माण व सेवा क्षेत्र की मजबूती को रेखांकित करता है।
सरकारी नीतियों और वित्तीय ढांचे का योगदान
आर्थिक बुनियाद को मजबूत करने में केंद्र सरकार की नीतियों की अहम भूमिका रही है। जेसीआर ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार ने उत्पादकता बढ़ाने और व्यापक आर्थिक विकास को गति देने वाली अनुकूल नीतियों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया है। इसमें डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विकास और माल एवं सेवा कर (GST) का सफल कार्यान्वयन शामिल है। इन सुधारात्मक कदमों ने व्यापारिक सुगमता को बढ़ाया है और कर संग्रह के दायरे को व्यापक किया है।
इसके अलावा, गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (NBFC) की वित्तीय स्थिति में दर्ज सुधार ने भी इस रेटिंग अपग्रेड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल के वर्षों में भारत के वित्तीय क्षेत्र की बैलेंस शीट में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिससे बैंकिंग और गैर-बैंकिंग संस्थान संभावित आर्थिक झटकों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम और मजबूत हुए हैं। देश की ठोस आर्थिक स्थिति और बेहतर नीतिगत दक्षता को देखते हुए ही जेसीआर ने विदेशी और स्थानीय मुद्रा दोनों में भारत की दीर्घकालिक साख को बढ़ा दिया है।
वैश्विक रेटिंग एजेंसियों का रुख और रेटिंग का पैमाना
रेटिंग स्केल के मानकों के अनुसार, जेसीआर की 'A' ग्रेड श्रेणी यह दर्शाती है कि संबंधित देश या संस्था के पास अपने वित्तीय दायित्वों को समय पर पूरा करने की उच्च स्तरीय निश्चितता मौजूद है। इससे पहले भारत 'BBB+' श्रेणी में था, जो वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए केवल पर्याप्त स्तर की सुरक्षा का संकेत देती थी। रेटिंग में 'A-' स्तर पर यह सुधार वैश्विक निवेशकों के बीच भारतीय संप्रभु ऋण (सोवेरिन डेट) की विश्वसनीयता को और बढ़ाएगा।
जापानी एजेंसी का यह सकारात्मक कदम ऐसे समय में आया है जब हाल ही में दो अन्य प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसियों, एसएंडपी और फिच ने भी भारत की निवेश-ग्रेड साख को बरकरार रखा था। उन एजेंसियों ने भी भारत की गतिशील अर्थव्यवस्था, नीतिगत निरंतरता और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्र में सरकार के भारी निवेश को अपनी रेटिंग का मुख्य आधार बनाया था। जेसीआर के इस ताजा कदम से अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट मार्केट में भारत की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई है।
राजकोषीय घाटा, कर्ज लक्ष्य और संरचनात्मक चुनौतियां
सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ जेसीआर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद कुछ दीर्घकालिक संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। एजेंसी के अनुसार, देश में उच्च राजकोषीय घाटा, विभिन्न राज्यों के बीच आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए राजकोषीय हस्तांतरण का तंत्र, और चुनावी चक्रों के दौरान वित्तीय प्रबंधन की संवेदनशीलता ऐसे विषय हैं जिन पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है।
हालांकि, एजेंसी ने स्वीकार किया कि सरकार ने सब्सिडी जैसे नियमित खर्चों की वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता पाई है। सरकार ने अपने बजटीय संसाधनों का रुख बुनियादी ढांचे के निर्माण और पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की ओर मोड़ा है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में कर्ज-जीडीपी अनुपात 55.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है, जो वित्त वर्ष 2025-26 के 56.1 फीसदी की तुलना में बेहतर स्थिति दिखाता है। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य मार्च 2031 तक इस अनुपात को घटाकर 50 फीसदी के स्तर पर लाना है।
राजकोषीय अनुशासन के मोर्चे पर, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे को GDP का 4.3 फीसदी (यानी 16.96 लाख करोड़ रुपये) रखने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त, चालू वित्त वर्ष के लिए सकल बाजार उधारी लक्ष्य 16.09 लाख करोड़ रुपये और शुद्ध बाजार उधारी लक्ष्य 11.73 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। इन वित्तीय पैमानों पर लक्षित दिशा में आगे बढ़ना अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



















