नेपाल में आई भीषण बाढ़ के कारण पैदा हुए अभूतपूर्व संकट के बीच देश के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में अंतरराष्ट्रीय सहायता की महत्ता को रेखांकित किया। 1,000 से अधिक लोगों की जान लेने वाली इस प्राकृतिक आपदा के बाद बालेन शाह ने स्पष्ट किया कि इतने बड़े पैमाने पर हुई तबाही के दौरान विदेशी मदद लेने से इनकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। उन्होंने बताया कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नेपाल ने समय पर राहत पाने के लिए निजी क्षेत्र के माध्यम से अन्य देशों के साथ तालमेल स्थापित किया था।
भारतीय और चीनी तकनीशियनों की त्वरित तैनाती
संसदीय संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पड़ोसी देशों भारत और चीन से मिली त्वरित सहायता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि दोनों मित्र राष्ट्रों ने आपदा के तुरंत बाद अपने कुशल तकनीशियन नेपाल भेजे। इन टीमों ने पहले ही दिन से प्रभावित इलाकों में हवाई सर्वेक्षण और विभिन्न वैज्ञानिक जांच-पड़ताल शुरू कर दी थी, ताकि नुकसान के दायरे का सटीक अंदाजा लगाया जा सके और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचने के व्यावहारिक रास्तों की पहचान की जा सके।
दुर्गम क्षेत्रों में बचाव और राहत कार्य की चुनौतियां
आपदा के प्रभाव का विवरण देते हुए प्रधानमंत्री शाह ने भारतीय तकनीशियनों के प्रयासों की सराहना की, जो अत्यधिक विषम परिस्थितियों के बावजूद सबसे दूर-दराज़ के क्षेत्रों तक जल्द से जल्द पहुंचने में सफल रहे। उन्होंने संसद को अवगत कराया कि बाढ़ के बाद बने हालात बेहद असाधारण थे। प्रभावित स्थानों पर कीचड़ और गाद का जमाव इस सीमा तक था कि वहां खुदाई करने वाली मशीनों (एक्सकेवेटर) को तैनात करना कठिन हो गया था। इसके साथ ही नेपाली सेना और आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स के जवानों के लिए भी वहां खड़े रहने तक की जगह नहीं बची थी, जिसके कारण तकनीकी विशेषज्ञता और हवाई निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।


















