उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल मसूरी में इस मानसूनी सीजन में हो रही मूसलाधार बारिश ने लोक निर्माण विभाग और स्थानीय प्रशासन के बुनियादी दावों की पोल खोल दी है। सड़कों की बदहाली और जगह-जगह हो रहे भूस्खलन के कारण आम जनता का दैनिक जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। क्षेत्र के सबसे संवेदनशील स्थान 'पानी वाला बैंड' के पास स्थिति अत्यधिक भयावह बनी हुई है, जहाँ इस सीजन में ही सड़क दो बार धंसकर बह चुकी है। इस ढुलमुल निर्माण और प्रशासनिक अनदेखी के कारण स्थानीय व्यापारियों और निवासियों में गहरा आक्रोश है। वहीं, कई पीढ़ियों से मसूरी में रह रहे बुजुर्ग नागरिक बिल्लू का कहना है कि यदि अनियंत्रित निर्माण और अनदेखी पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में पहाड़ों की रानी मसूरी का केवल नाम ही शेष रह जाएगा।
पानी वाला बैंड पर मंडराता खतरा और चरमराती आवाजाही
मसूरी की प्रमुख सड़कों पर बने खड्ड और लगातार होती बारिश ने यातायात व्यवस्था को ठप कर दिया है। 'पानी वाला बैंड' के समीप बार-बार सड़क टूटने से राहगीरों और वाहन चालकों के लिए आवाजाही जोखिम भरी बन चुकी है। सड़क धंसने के कारण हादसों की आशंका हर समय बनी रहती है, जबकि आए दिन लगने वाले लंबे ट्रैफिक जाम से लोगों की दिनचर्या पर बुरा असर पड़ा है। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि प्रशासन द्वारा कराए जा रहे निर्माण कार्य गुणवत्ताहीन हैं और मानसून की पहली ही बारिश में उनकी हकीकत सामने आ जाती है। प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही से जनजीवन प्रभावित हो रहा है और लोगों का सब्र अब टूट चुका है।
अंधाधुंध निर्माण और बंद होते प्राकृतिक जल स्रोत
मसूरी के पुराने निवासियों के अनुसार, पहले के दौर में मानसून के दौरान इतने बड़े पैमाने पर लैंडस्लाइड नहीं होते थे। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में कमर्शियल गतिविधियों के नाम पर पहाड़ियों का अंधाधुंध कटान किया गया है। बहुमंजिला होटल और विशाल रिसॉर्ट्स बनाने के लिए पहाड़ों की नींव कमजोर कर दी गई है। इनमें से अधिकांश व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का संचालन दूसरे राज्यों के बिल्डरों द्वारा किया जा रहा है। इसके साथ ही, शहर में उत्पन्न होने वाले कचरे के निस्तारण की कोई ठोस और वैज्ञानिक व्यवस्था नहीं है। लोग खुले में ही कूड़ा-कचरा फेंक रहे हैं, जिससे प्राकृतिक जल स्रोत और बरसाती नाले पूरी तरह बंद हो गए हैं।
जल स्रोतों के अवरुद्ध होने का सीधा प्रभाव पहाड़ों की स्थिरता पर पड़ रहा है। जिस बारिश के पानी को स्वाभाविक रूप से बहकर घाटियों में निकल जाना चाहिए था, वह कचरे के जमाव के कारण रुक जाता है और पहाड़ों के भीतर ही सोखा जा रहा है। लगातार पानी अवशोषित होने से पहाड़ों के अंदर की मिट्टी ढीली हो जाती है, जो अंततः बड़े भूस्खलन और सड़कों के धंसने का कारण बनती है।
राज्य गठन के अधूरे सपने और शिवालिक श्रेणी की नाजुक स्थिति
वर्ष 2000 में जब उत्तराखंड अलग राज्य बना था, तब पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को उम्मीद थी कि अपना राज्य मिलने से मसूरी और आसपास के इलाकों की तस्वीर बदलेगी। लोगों को उम्मीद थी कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार होगा, टिकाऊ सड़कें बनेंगी और स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे। लेकिन समय के साथ मसूरी केवल बड़े सेठों और बाहरी कारोबारियों का व्यावसायिक केंद्र बनकर रह गया, जबकि स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा और अधिक कमजोर होता चला गया।
भूगर्भीय दृष्टिकोण से मसूरी शिवालिक पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत आता है। ये पहाड़ उम्र में अपेक्षाकृत नए और कच्चे माने जाते हैं, जिनकी संरचना अत्यधिक संवेदनशील होती है। शिवालिक श्रेणी की पहाड़ियां भारी निर्माण कार्य, विशाल कंक्रीट के ढांचे और लगातार खोदे जाने का भार सहन करने में सक्षम नहीं हैं। यदि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने तुरंत निर्माण नीतियों पर पुनर्विचार नहीं किया और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो प्रकृति का यह असंतुलन एक बड़े विनाश का रूप ले सकता है।





















