केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति की ताजा बैठक के बाद रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में बढ़ोतरी की घोषणा की। इस फैसले का सीधा असर उन लोगों पर पड़ने जा रहा है जो अपने लिए घर खरीदने की योजना बना रहे हैं या पहले से होम लोन की ईएमआई भर रहे हैं। जब केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत दरों में इजाफा करता है, तो वाणिज्यिक बैंक भी अपने सभी तरह के रिटेल कर्ज की ब्याज दरों को बढ़ा देते हैं। चूंकि अधिकांश बैंक लोन बाहरी बेंचमार्क यानी रेपो रेट से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए होम लोन की ब्याज दरों में करीब 0.25 फीसदी तक का उछाल देखने को मिल सकता है। आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब बाजार में पहले से ही रोजमर्रा की चीजें महंगी हैं, तो ऐसे समय में कर्ज को और अधिक महंगा करके महंगाई से कैसे निपटा जा सकता है।
महंगाई और नीतिगत ब्याज दरों का सीधा संबंध
खुदरा महंगाई और बैंक कर्ज की ब्याज दरों के बीच एक सीधा और गहरा रिश्ता काम करता है। आर्थिक चक्र का बुनियादी नियम यह है कि जब भी अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो कर्ज की दरें भी ऊपर जाने लगती हैं। इसके विपरीत जब महंगाई नियंत्रण में आ जाती है और कीमतें स्थिर होती हैं, तब कर्ज सस्ता होने लगता है। रिज़र्व बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों और रेपो रेट की समीक्षा करते समय मुख्य रूप से खुदरा महंगाई के आंकड़ों पर ही अपनी नजर बनाए रखता है। जैसे ही खुदरा महंगाई के आंकड़े निर्धारित लक्ष्य से ऊपर निकलते हैं, केंद्रीय बैंक बाजार में पैसे के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए रेपो रेट बढ़ाना शुरू कर देता है। इस बार भी खुदरा महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए रिज़र्व बैंक ने इसी स्थापित फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हुए रेपो रेट बढ़ाने का कदम उठाया है।
मांग और आपूर्ति के संतुलन से कीमतों पर नियंत्रण
इस पूरी व्यवस्था का मुख्य आधार बाजार में मांग और आपूर्ति का बुनियादी अर्थशास्त्र है। किसी भी बाजार में जब उत्पादों और सेवाओं की मांग तेजी से बढ़ती है और आपूर्ति सीमित रह जाती है, तो वस्तुओं के भाव अपने आप चढ़ने लगते हैं। कर्ज की उपलब्धता भी इस मांग को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। जब बैंकों से मिलने वाला कर्ज सस्ता होता है, तो आम नागरिक और कारोबारी आसानी से बड़ी मात्रा में उधार लेते हैं। लोगों के हाथों में नकदी और खर्च करने योग्य पूंजी अधिक आने से वे बाजार में खरीदारी बढ़ाते हैं। इस व्यापक खरीदारी के कारण बाजार में समग्र मांग में तेज उछाल आता है। मांग का यह दबाव जब आपूर्ति से अधिक हो जाता है, तो आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने लगते हैं और आखिरकार खुदरा महंगाई बेकाबू होने लगती है। इसी वजह से केंद्रीय बैंक कर्ज को महंगा बनाकर इस अतिरिक्त मांग पर ब्रेक लगाने का प्रयास करता है।
रेपो रेट में बढ़ोतरी से बाजार और आपूर्ति पर प्रभाव
जब रिज़र्व बैंक रेपो रेट में इजाफा करता है, तो वाणिज्यिक बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है और वे आम ग्राहकों के लिए भी कर्ज की दरें बढ़ा देते हैं। ब्याज दरें ऊंची होने के कारण कर्ज लेने वाले लोगों और कंपनियों की संख्या में स्वाभाविक रूप से गिरावट आने लगती है। जब लोग नया कर्ज कम लेंगे और अपनी पुरानी ईएमआई पर अधिक राशि चुकाएंगे, तो उनके हाथों में अतिरिक्त खरीदारी के लिए उपलब्ध नकदी कम हो जाएगी। नकदी की कमी सीधे तौर पर बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को घटा देती है। मांग कम होने से आपूर्ति व्यवस्था पर बना दबाव हल्का होने लगता है और विक्रेताओं को कीमतें स्थिर या कम करनी पड़ती हैं। जैसे ही वस्तुओं के दाम गिरते हैं, खुदरा महंगाई धीरे-धीरे नीचे आने लगती है। एक बार जब महंगाई पूरी तरह से केंद्रीय बैंक के तय दायरे में लौट आती है, तब रिज़र्व बैंक दोबारा रेपो रेट में कटौती करके कर्ज सस्ता करने का मार्ग प्रशस्त करता है।

















